मध्य प्रदेश: मध्य प्रदेश के मंदसौर का लच्छा आज देशभर में अपनी अलग पहचान बना चुका है। करीब 200 साल पुरानी यह परंपरा अब सिर्फ धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि सैकड़ों लोगों की आजीविका का साधन भी बनी हुई है। मंदसौर के खानपुरा इलाके में मुस्लिम परिवार पीढ़ी दर पीढ़ी लच्छा बनाने का काम कर रहे हैं। खास बात यह है कि यहां तैयार होने वाला लच्छा देश के कई प्रसिद्ध मंदिरों और दरगाहों तक पहुंचता है।

500 से अधिक लोगों को मिल रहा रोजगार

खानपुरा क्षेत्र में करीब 100 से अधिक परिवार इस पारंपरिक व्यवसाय से जुड़े हैं। इनके 500 से ज्यादा लोगों को प्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिल रहा है। परिवारों के सदस्य सुबह से शाम तक लच्छा बनाने में जुटे रहते हैं। इस काम में महिलाओं और पुरुषों की भागीदारी भी रहती है। पीढ़ियों से चला आ रहा यह हुनर आज इन परिवारों की पहचान बन चुका है।

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तिरुपति बालाजी से अजमेर शरीफ तक पहुंच रहा लच्छा

मंदसौर में तैयार होने वाले लच्छे की मांग देश के अलग-अलग राज्यों में है। गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, आंध्र प्रदेश और पंजाब सहित कई राज्यों में इसकी आपूर्ति की जाती है। तिरुपति बालाजी मंदिर, शिर्डी साईं बाबा मंदिर और अजमेर शरीफ दरगाह जैसे प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों तक भी मंदसौर का लच्छा पहुंचता है। त्योहारों और धार्मिक आयोजनों के दौरान इसकी मांग और बढ़ जाती है।

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मेहनत और हुनर से तैयार होता है पवित्र लच्छा

लच्छा बनाने की प्रक्रिया में काफी मेहनत लगती है। सबसे पहले कच्चे सूत को रातभर पानी में भिगोया जाता है। इसके बाद उसकी रंगाई की जाती है और फिर लकड़ी के पारंपरिक हथौड़ों की मदद से उसे तैयार किया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में कारीगरों के अनुभव और हुनर की अहम भूमिका होती है।

कौमी एकता की मिसाल बनी 200 साल पुरानी परंपरा

मंदसौर का लच्छा सिर्फ एक पारंपरिक उत्पाद नहीं, बल्कि आपसी भाईचारे और सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल भी है। मुस्लिम परिवारों के हाथों से तैयार यह पवित्र रक्षासूत्र देश के मंदिरों और दरगाहों तक पहुंचता है। करीब दो सदियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी लोगों को रोजगार देने के साथ मंदसौर की पहचान को देशभर में कायम रखे हुए है।

रिपोर्ट: प्रकाश शर्मा

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