मुंबई: मतदाता सूची के Special Intensive Revision यानी SIR को लेकर चल रहे विवाद के बीच बॉम्बे हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग (ECI) से अहम सवाल पूछे हैं। कोर्ट ने वोटर लिस्ट से नाम हटाए जाने की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए पूछा कि अगर पात्र मतदाताओं के नाम ही सूची से बाहर हो जाएंगे, तो SIR का उद्देश्य क्या रह जाएगा?
मामला गोवा में मतदाता सूची के पुनरीक्षण से जुड़ा है। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने इस बात पर चिंता जताई कि SIR के दौरान पहले से मतदाता सूची में शामिल लोगों के नाम हटने की स्थिति पैदा हो सकती है। अदालत ने यह भी जानना चाहा कि ऐसे मामलों में पात्र नागरिकों को अपना नाम दोबारा मतदाता सूची में शामिल कराने के लिए क्या प्रक्रिया अपनानी होगी।
क्या है पूरा मामला?
कोर्ट के सामने एक परिवार का मामला आया, जिसके छह सदस्यों के नाम मतदाता सूची से हट गए थे। परिवार ने एक ही विधानसभा क्षेत्र के भीतर अपना आवास बदला था और नए पते पर नाम दर्ज कराने के लिए Form 8 के जरिए आवेदन किया था। याचिकाकर्ताओं की ओर से बताया गया कि प्रक्रिया में तकनीकी दिक्कत के कारण उनका आवेदन आगे नहीं बढ़ सका और पुराने पते से भी नाम हट गया।
इस स्थिति को लेकर अदालत ने चुनाव आयोग से सवाल किया कि अगर कोई व्यक्ति पहले से मतदाता है और सिर्फ अपना पता बदल रहा है, तो उसे ऐसी प्रक्रिया में क्यों फंसना पड़े, जिससे उसका नाम मतदाता सूची से ही बाहर हो जाए?
Form 8 और Form 6 पर भी सवाल
सुनवाई के दौरान Form 8 और Form 6 को लेकर भी सवाल उठा। Form 8 का इस्तेमाल मौजूदा मतदाता के पते या अन्य विवरण में बदलाव के लिए किया जाता है, जबकि Form 6 नए मतदाता के पंजीकरण से जुड़ा है। अदालत के सामने यह सवाल आया कि पहले से पंजीकृत मतदाता को किन परिस्थितियों में नए मतदाता की तरह आवेदन करने की जरूरत पड़ सकती है।
कोर्ट ने तकनीकी कारणों से आवेदन खारिज होने की स्थिति पर भी सवाल उठाए। अदालत ने जानना चाहा कि अगर सिस्टम किसी आवेदन को तकनीकी वजह से स्वीकार नहीं करता है, तो संबंधित नागरिक के पास अपनी स्थिति सुधारने का क्या प्रभावी रास्ता है।
महाराष्ट्र में भी SIR पर विवाद
SIR को लेकर महाराष्ट्र में भी मतदाता सूची से नाम हटाए जाने का मुद्दा अदालत पहुंच चुका है। याचिकाओं में दावा किया गया है कि प्रक्रिया के दौरान पात्र मतदाताओं के नाम प्रभावित हो सकते हैं। वहीं चुनाव आयोग का पक्ष है कि SIR का उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक सटीक और अपडेट करना है।
SIR के तहत मृत, स्थानांतरित, डुप्लीकेट या अपात्र मतदाताओं की पहचान कर सूची को अपडेट किया जाता है। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में सबसे बड़ा सवाल यही है कि गलत तरीके से किसी पात्र मतदाता का नाम न हटे।
क्यों अहम है हाईकोर्ट की टिप्पणी?
मतदाता सूची लोकतांत्रिक चुनाव की बुनियादी व्यवस्था है। ऐसे में नाम हटाने या जोड़ने की प्रक्रिया में छोटी सी गलती भी किसी नागरिक के मतदान के अधिकार को प्रभावित कर सकती है। बॉम्बे हाईकोर्ट की टिप्पणी इसी चिंता को सामने लाती है कि मतदाता सूची को अपडेट करते समय पात्र नागरिकों के अधिकारों की भी पूरी सुरक्षा होनी चाहिए।
अब नजर इस बात पर है कि चुनाव आयोग अदालत के सवालों पर क्या जवाब देता है और SIR के दौरान नाम हटने या तकनीकी दिक्कतों का सामना करने वाले मतदाताओं के लिए क्या व्यवस्था सामने आती है।
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