आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी, खराब खानपान, तनाव और शारीरिक गतिविधियों की कमी का असर लोगों की सेहत पर पड़ रहा है। यही वजह है कि कम उम्र में भी दिल से जुड़ी बीमारियों का खतरा बढ़ रहा है। खास बात यह है कि हाई ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल जैसी समस्याएं कई बार बिना किसी लक्षण के शरीर में पनपती रहती हैं। ऐसे में 40 साल की उम्र के बाद दिल की सेहत का विशेष ध्यान रखना जरूरी हो जाता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक, नियमित जांच से हार्ट डिजीज के जोखिम को समय रहते पहचाना जा सकता है।

ब्लड प्रेशर की नियमित जांच

हाई ब्लड प्रेशर को दिल की बीमारियों का प्रमुख जोखिम कारक माना जाता है। इसे साइलेंट किलर भी कहा जाता है, क्योंकि कई बार इसके कोई स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते। लंबे समय तक बीपी बढ़ा रहने से दिल और रक्त वाहिकाओं पर दबाव पड़ता है। इसलिए 40 साल के बाद नियमित रूप से ब्लड प्रेशर की जांच करानी चाहिए। अगर बीपी सामान्य है, तो कम से कम सालाना जांच उपयोगी है। वहीं, हाई बीपी वाले लोगों को डॉक्टर की सलाह के अनुसार अधिक बार निगरानी करनी चाहिए।

लिपिड प्रोफाइल से जानें कोलेस्ट्रॉल का स्तर

लिपिड प्रोफाइल टेस्ट के जरिए शरीर में मौजूद कोलेस्ट्रॉल और फैट के स्तर की जानकारी मिलती है। इसमें टोटल कोलेस्ट्रॉल, एलडीएल, एचडीएल और ट्राइग्लिसराइड्स की जांच की जाती है। खासतौर पर एलडीएल यानी खराब कोलेस्ट्रॉल का बढ़ना चिंता का विषय हो सकता है। इसकी अधिक मात्रा धमनियों में प्लाक जमा होने और हार्ट अटैक का खतरा बढ़ा सकती है। इस जांच की जरूरत और समय व्यक्ति के स्वास्थ्य और जोखिम कारकों के आधार पर तय होता है।

ब्लड शुगर की जांच भी है जरूरी

डायबिटीज और दिल की बीमारियों के बीच गहरा संबंध है। इसलिए 40 की उम्र के बाद ब्लड शुगर की जांच कराना भी जरूरी है। इसके लिए फास्टिंग ब्लड शुगर और HbA1c टेस्ट की मदद ली जा सकती है। इनसे प्रीडायबिटीज और डायबिटीज का पता लगाने में मदद मिलती है। शुरुआती अवस्था में जानकारी मिलने पर खानपान, व्यायाम और वजन नियंत्रित करके जोखिम कम किया जा सकता है।

फैमिली हिस्ट्री और लाइफस्टाइल पर दें ध्यान

अगर परिवार में किसी को दिल की बीमारी रही है, तो अतिरिक्त सावधानी बरतें। धूम्रपान, शराब, तनाव, खराब खानपान और नींद की कमी भी दिल की सेहत को प्रभावित करते हैं। नियमित स्वास्थ्य जांच के साथ संतुलित आहार, रोजाना व्यायाम और पर्याप्त नींद अपनाएं। ध्यान रखें कि ये टेस्ट बीमारी से बचाव की गारंटी नहीं देते, लेकिन जोखिम पहचानने और समय पर सही कदम उठाने में मददगार हो सकते हैं।

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