Russia India train: भारत और रूस के बीच सदियों पुरानी रणनीतिक और व्यापारिक दोस्ती अब एक नए और ऐतिहासिक मोड़ पर पहुंच सकती है। बता दें कि समुद्री मार्गों पर बढ़ती अनिश्चितताओं और भू-राजनीतिक तनावों के बीच रूस ने भारत तक एक समर्पित रेल मार्ग विकसित करने की संभावना तलाशी है। रूसी उप-प्रधानमंत्री मरात खुसनुलिन द्वारा भारतीय महासागर तक रेल कनेक्टिविटी विस्तार के इस प्रस्ताव ने वैश्विक स्तर पर नया विमर्श छेड़ दिया है। अगर यह महत्वाकांक्षी रेल नेटवर्क हकीकत में बदलता है, तो भारत और रूस के बीच माल ढुलाई और यात्रा के तौर-तरीके पूरी तरह बदल जाएंगे।
शताब्दी-राजधानी की रफ्तार से कितना समय लगेगा?
दिल्ली और मॉस्को के बीच की सीधी हवाई दूरी लगभग 4,340 किलोमीटर है। हालांकि, रेल मार्ग के लिए ट्रेन को तुर्कमेनिस्तान, ईरान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान जैसे देशों से होकर गुजरना पड़ेगा, जिससे अनुमानित रेल दूरी बढ़कर 6,000 से 7,500 किलोमीटर (औसत 7,000 किलोमीटर) तक हो सकती है। यदि इस रूट पर भारतीय रेलवे की प्रमुख ट्रेनों की रफ्तार से गणना की जाए, तो समय का गणित कुछ इस प्रकार होगा, यदि ट्रेन बिना रुके 130 से 150 किमी/घंटा की रफ्तार से चले, तो सैद्धांतिक रूप से इसे तय करने में लगभग 48 से 53 घंटे लगेंगे।
वहीं 160 किमी/घंटा की अधिकतम गति से लगातार इस रफ्तार पर चलने पर यात्रा में लगभग 44 घंटे (लगभग 2 दिन) का समय लगेगा। अंतरराष्ट्रीय सीमाओं पर सुरक्षा जांच, कस्टम क्लीयरेंस, ट्रेन स्टेशनों पर ठहराव और अलग-अलग देशों के रेल गेज (Track Gauge) बदलने में लगने वाले समय को जोड़ दिया जाए, तो व्यावहारिक रूप से इस यात्रा में 3 से 5 दिन का समय लगेगा। यही बुलेट ट्रेन (300-320 किमी/घंटा)भविष्य में इस पूरे कॉरिडोर पर हाई-स्पीड बुलेट ट्रेन चलती है, तो यह समय घटकर आधा (लगभग 24 से 30 घंटे) रह सकता है।
समुद्री जोखिमों के बीच वैकल्पिक कॉरिडोर की तलाश
रूस का यह प्रस्ताव मुख्य रूप से माल ढुलाई (Freight Transport) के लिए एक सुरक्षित और भरोसेमंद रास्ता तैयार करने के उद्देश्य से आया है। वर्तमान में अधिकांश वैश्विक व्यापार बोस्फोरस और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Hormuz Strait) जैसे संवेदनशील समुद्री जलडमरूमध्यों से होता है। अकेले होर्मुज जलडमरूमध्य से दुनिया का लगभग 25% तेल और 20% LNG व्यापार गुजरता है। क्षेत्रीय तनावों के कारण इन समुद्री रास्तों पर हमेशा जोखिम बना रहता है। प्रस्तावित रेल मार्ग स्वेज नहर वाले पारंपरिक समुद्री रास्ते की तुलना में समय और लागत दोनों की बचत कर सकता है।
प्रस्तावित मार्ग के सामने प्रमुख रुकावटें
हालांकि यह योजना रणनीतिक रूप से बेहद आकर्षक है, लेकिन इसे लागू करने में कई जटिल जमीनी और भू-राजनीतिक चुनौतियां हैं, प्रस्तावित मार्ग अफगानिस्तान और पाकिस्तान से होकर गुजरता है। इन क्षेत्रों में सुरक्षा स्थिति, राजनीतिक अस्थिरता और भारत-पाकिस्तान के कूटनीतिक संबंध सबसे बड़ी बाधा हैं। रूस, मध्य एशिया, ईरान और भारत में रेल की पटरियों की चौड़ाई (Rail Gauge) अलग-अलग है। सीमाओं पर ट्रेन के पहिए या डिब्बे बदलने में काफी समय और संसाधन खर्च होते हैं। हजारों किलोमीटर लंबे नए ट्रैक बिछाने और मौजूदा नेटवर्क को अपग्रेड करने के लिए बहुराष्ट्रीय सहयोग और भारी वित्तीय निवेश की आवश्यकता होगी।
INSTC की भूमिका
भारत, रूस और ईरान पहले से ही इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) जैसे मल्टी-मॉडल नेटवर्क पर काम कर रहे हैं, जिसमें रेल, सड़क और समुद्री रास्ते शामिल हैं। रूस और मध्य एशिया के कुछ हिस्सों में रेल इंफ्रास्ट्रक्चर पहले से सक्रिय है। फिलहाल, मॉस्को से दिल्ली तक सीधी यात्री या मालगाड़ी सेवा का यह विचार शुरुआती और काल्पनिक चरण में है। किसी भी देश की ओर से इस पर अंतिम परियोजना, बजट या समय-सीमा की आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। फिर भी, यह प्रस्ताव भारत-रूस संबंधों को नई ऊंचाई देने और मध्य व दक्षिण एशिया में ओवरलैंड कनेक्टिविटी को मजबूत करने का एक बेहद साहसिक खाका पेश करता है।
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Written by Shailesh Yadav