Bihar lakhisarai Temple Accident: सावन का तीसरा सोमवार व नागपंचमी का दिन, बिहार के अशोक धाम मंदिर में दर्शन के लिए लाखों के संख्या में भीड़ उमड़ी थी,आचानक से बिजली के खंभे के गिरने की खबर और करेंट उतरने के अफवाह में पल भर में सबकुछ तबाह कर दिया। इस हादसे ने कई परिवारों को ऐसा दर्द दिया है, जिसकी भरपाई किसी मुआवजे से नहीं हो सकती। शुरुआती रिपोर्टों के मुताबिक हादसे में लगभग सात श्रद्धालुओं की मौत हुई और कई लोग घायल हुए।घटना की पूरी वजह जांच के बाद ही स्पष्ट होगी। लेकिन हादसे के बाद उठ रहे सवालों को जांच रिपोर्ट आने तक टाला नहीं जा सकता।क्योंकि यह पहली बार नहीं है जब किसी धार्मिक आयोजन में भारी भीड़ जानलेवा साबित हुई हो।

लखीसराय के अशोक धाम मंदिर में हुआ हादसा कोई पहली बार हुआ हादसा नहीं था,इसके पहले भी देशभर के तमाम धार्मिक आयोजनों में भीड़ बेकाबु हुई है नतीजन लोगों को अपनी जान भी गवानी पड़ी है। इसी तरह अगस्त 2024 में बिहार के जहानाबाद स्थित बाबा सिद्धेश्वर नाथ मंदिर में भी बड़ी भीड़ के बीच भगदड़ जैसी स्थिति बनी थी। उस घटना में भी सात लोगों की मौत की खबर सामने आई थी।दो साल भी पूरे नहीं हुए और अब लखीसराय में एक और बड़ा हादसा हो गया।सवाल इसलिए गंभीर है क्योंकि दोनों ही मामलों में मंदिरों में भीड़ आने की संभावना पहले से थी। सावन में धार्मिक स्थलों पर श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ना कोई अनपेक्षित घटना नहीं है। प्रशासन को पता होता है कि किस दिन कितनी भीड़ आने की उम्मीद है, कहां दबाव बढ़ सकता है और किन रास्तों पर अतिरिक्त सुरक्षा की जरूरत पड़ेगी।फिर भी जब हादसा होता है तो सबसे पहले यही कहा जाता है कि भीड़ अचानक बढ़ गई।क्या भीड़ वास्तव में अचानक बढ़ती है या उसका अनुमान लगाने और उसे नियंत्रित करने की तैयारी कमजोर रहती है?

हादसे अलग-अलग, कहानी लगभग एक जैसी

पिछले कुछ वर्षों में देश के अलग-अलग धार्मिक स्थलों पर भीड़ से जुड़े कई बड़े हादसे हुए हैं।जनवरी 2022 में माता वैष्णो देवी मंदिर में भगदड़ से 12 श्रद्धालुओं की मौत हुई। मार्च 2023 में इंदौर के बेलेश्वर महादेव मंदिर में बावड़ी की छत धंसने से 36 लोगों की जान चली गई। जुलाई 2024 में हाथरस में सत्संग के बाद भगदड़ में 121 लोगों की मौत हुई।फिर 2025 में तिरुपति में छह लोगों की मौत वाला हादसा सामने आया। प्रयागराज के महाकुंभ में भी भगदड़ ने देश को झकझोर दिया। हरिद्वार के मनसा देवी मंदिर और दूसरे धार्मिक आयोजनों में भी भीड़ से जुड़े हादसे हुए।इन घटनाओं की परिस्थितियां एक जैसी नहीं थीं। कहीं भगदड़ थी, कहीं ढांचा धंसा, कहीं प्रवेश व्यवस्था पर सवाल उठे। लेकिन एक चीज लगभग हर घटना के बाद सामने आई-भीड़ का अनुमान, प्रवेश-निकास, बैरिकेडिंग, आपातकालीन रास्ते और प्रशासनिक समन्वय।

मुआवजा, जांच और आश्वासन

किसी हादसे के बाद सरकार तुरंत सक्रिय होती है। मृतकों के परिवारों के लिए मुआवजे की घोषणा होती है। घायलों के इलाज की व्यवस्था की जाती है। जांच के आदेश दिए जाते हैं।लेकिन असली परीक्षा इससे पहले होती है।जब लाखों या हजारों लोग एक ही स्थान पर पहुंचने वाले हों, तब प्रशासन की जिम्मेदारी सिर्फ पुलिस तैनात कर देना नहीं है। यह देखना भी जरूरी है कि भीड़ किस दिशा में चलेगी, एक जगह कितने लोगों को रोका जा सकता है, आपात स्थिति में एंबुलेंस कितनी जल्दी पहुंच सकती है और भगदड़ की स्थिति में लोगों को सुरक्षित निकालने का रास्ता क्या होगा।क्या इन सवालों की तैयारी कागज पर होती है या जमीन पर भी?मुआवजा परिवार का दर्द कम कर सकता है, लेकिन अगली मौत रोकने के लिए व्यवस्था बदलनी होगी।लखीसराय में जिन परिवारों ने अपने लोगों को खोया है, उनके लिए आज सबसे बड़ा सवाल यही है कि उनके अपनों की मौत के बाद क्या बदलेगा।

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Written By: Shivashakti Narayan Singh