Shravasti Encounter Case: इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने यूपी में कथित ‘हाफ एनकाउंटर’ की बढ़ती प्रवृत्ति पर बेहद तल्ख टिप्पणी करते हुए श्रावस्ती में हुई एक पुलिस मुठभेड़ की जांच सीबीआई को सौंप दी है। कोर्ट ने कहा कि अक्सर पुलिस की कहानी में अभियुक्त पुलिस टीम पर अंधाधुंध फायरिंग करता है, लेकिन पुलिसकर्मियों की वर्दी तक को एक छर्रा नहीं छूता और जवाबी कार्रवाई में पुलिस की गोली सीधे अभियुक्त के घुटने या उससे नीचे जाकर लगती है।
न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी की एकल पीठ ने कहा कि वरिष्ठ अधिकारियों को खुश करने, आउट ऑफ टर्न प्रमोशन पाने या सोशल मीडिया पर वाहवाही हासिल करने के लिए अभियुक्तों के पैरों में गोली मारने की प्रवृत्ति खतरनाक है। सजा देने का अधिकार न्यायपालिका का है, पुलिस का नहीं।
श्रावस्ती मुठभेड़ में मिलीं कई विसंगतियां
मामला 12 मई 2025 को श्रावस्ती के इकौना थाना क्षेत्र में हुई कथित मुठभेड़ से जुड़ा है। इससे पहले 9 मई को सात वर्षीय बच्ची के अपहरण के मामले में शफीक नाम के व्यक्ति और दो अज्ञात लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई थी। वादी ने शफीक को पकड़कर पुलिस के हवाले किया था। पुलिस ने बाद में छोटकऊ उर्फ अलाउद्दीन को इस मामले का मुख्य आरोपी बताते हुए मुठभेड़ में गिरफ्तार किया। पुलिस के मुताबिक, मुठभेड़ के दौरान उसके दोनों पैरों में गोली लगी। कोर्ट ने पुलिस की एफआईआर में कई गंभीर विसंगतियां पाईं और प्रथम दृष्टया माना कि थाना प्रभारी ने घटना का गलत विवरण पेश किया हो सकता है।
एक गाड़ी में 13 पुलिसकर्मी, कोर्ट ने उठाया सवाल
पुलिस की एफआईआर के मुताबिक थाना प्रभारी अश्विनी कुमार दुबे समेत पांच उपनिरीक्षक, एक मुख्य आरक्षी और छह आरक्षी यानी कुल 13 पुलिसकर्मी एक ही सरकारी वाहन से गश्त पर थे। इस पर कोर्ट ने सवाल उठाया कि अगर वह वाहन कोई मिनी बस नहीं था तो जीप या एसयूवी में 13 पुलिसकर्मियों का बैठना कैसे संभव था। पुलिस ने यह भी बताया कि सूचना मिलने के बाद स्वाट टीम के 10 अन्य सदस्य भी आरोपी को घेरने पहुंचे थे। कोर्ट ने सवाल किया कि जब एक देसी कट्टे और दो कारतूस से लैस व्यक्ति को इतने पुलिसकर्मी घेर चुके थे, तब ऐसी स्थिति क्यों बनी कि पुलिस को गोली चलानी पड़ी।
15 मीटर दूर से दोनों पैरों में लगीं गोलियां
थानाध्यक्ष अश्विनी कुमार दुबे कोर्ट के आदेश पर पेश हुए। उन्होंने बताया कि करीब 15 मीटर की दूरी से उन्होंने 9 एमएम सर्विस पिस्टल से दो गोलियां चलाईं और दोनों गोलियां आरोपी के पैरों में लगीं। मेडिकल रिपोर्ट और गोली के आकार को लेकर थानाध्यक्ष की सफाई को कोर्ट ने हास्यास्पद और भ्रामक माना। अब सीबीआई को यह भी जांच करनी होगी कि क्या थानाध्यक्ष रात के समय करीब 15 मीटर की दूरी से केवल हथियार लोड किए जाने की आवाज सुनकर 9 एमएम पिस्टल से इतना सटीक निशाना लगा सकते थे।
पहले भी मौत की सजा पा चुका था आरोपी, सुप्रीम कोर्ट ने किया था बरी
कोर्ट के सामने यह तथ्य भी आया कि छोटकऊ उर्फ अलाउद्दीन को पहले छह साल की बच्ची की हत्या और दुष्कर्म के मामले में ट्रायल कोर्ट ने मौत की सजा सुनाई थी। हाईकोर्ट ने भी उसकी दोषसिद्धि बरकरार रखी थी। हालांकि, वर्ष 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने उसे बरी कर दिया था। हाईकोर्ट ने आशंका जताई कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले से नाराज होकर पुलिस ने उसके खिलाफ यह कहानी गढ़ी हो सकती है।
कोर्ट ने इस बात पर भी आश्चर्य जताया कि कथित मुठभेड़ के बाद सभी 23 पुलिसकर्मियों को उत्कृष्ट कार्य के लिए पुरस्कृत कर दिया गया था।
तीन महीने में जांच रिपोर्ट देगी CBI
हाईकोर्ट ने मामले की जांच सीबीआई को सौंपते हुए निर्देश दिया है कि जांच पूरी कर रिपोर्ट यथासंभव तीन महीने के भीतर पेश की जाए। सीबीआई को मुठभेड़ की परिस्थितियों के साथ-साथ थानाध्यक्ष की निशानेबाजी क्षमता और पुलिस की पूरी कहानी की भी जांच करनी होगी।
‘अदालती आदेशों को मनमाने ढंग से नहीं निपटा सकते अधिकारी’
इसी दौरान हाईकोर्ट की एक अन्य पीठ ने सरकारी अधिकारियों द्वारा अदालती आदेशों के अनुपालन और अपील दाखिल करने में की गई देरी पर भी कड़ी नाराजगी जताई। मुख्य न्यायमूर्ति अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति जसप्रीत सिंह की पीठ ने 124 दिन की देरी से दाखिल राज्य सरकार की विशेष अपील को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि सरकारी अधिकारी और विधि अधिकारी परिसीमा की अवधि से परिचित होने के बावजूद मामलों को ऐसे निपटाते हैं, जैसे उनके पास असीमित समय हो।
मामला सेवानिवृत्त सहायक निरीक्षक सिविल पुलिस सोमराज सिंह से जुड़ा था। एकल पीठ ने 19 सितंबर 2024 को उनसे वसूली गई 83,562 रुपये की राशि वापस करने का आदेश दिया था। राज्य सरकार ने अपील दाखिल करने में हुई देरी के लिए प्रशासनिक और कानूनी प्रक्रिया का हवाला दिया, लेकिन हाईकोर्ट ने इसे संतोषजनक नहीं माना। कोर्ट ने साफ कहा कि सरकारी तंत्र की लापरवाही के कारण हुई देरी को हर बार माफ नहीं किया जा सकता।
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Written by Shailesh Yadav