शनिवार को नई दिल्ली में आयोजित 18वें BRICS शिखर सम्मेलन को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संगठन की संस्थागत निरंतरता मजबूत करने के लिए एक नए इम्प्लीमेंटेशन फ्रेमवर्क का प्रस्ताव रखा। उन्होंने कहा कि BRICS की अध्यक्षता भले ही हर साल बदलती हो, लेकिन इससे संगठन की नीतियों, फैसलों और दीर्घकालिक पहलों की गति प्रभावित नहीं होनी चाहिए।
'ट्रोइका' के जरिए फैसलों का फॉलो-अप
प्रधानमंत्री ने BRICS के लिए 'कंटिन्यूटी एंड इम्प्लीमेंटेशन मैकेनिज्म' बनाने का सुझाव दिया। इसके तहत पिछले, मौजूदा और अगले अध्यक्ष देश यानी ‘ट्रोइका’ मिलकर प्रमुख पहलों और फैसलों की प्रगति पर नजर रखेंगे।
मोदी ने एक सुरक्षित डिजिटल रिपॉजिटरी बनाने का भी प्रस्ताव रखा, जिसमें हर फैसले से जुड़े नोडल प्वाइंट, समयसीमा और इम्प्लीमेंटेशन स्टेटस दर्ज किया जा सके। उनके मुताबिक, इससे अध्यक्षता बदलने के बावजूद संस्थागत मोमेंटम बनाए रखने में मदद मिलेगी।
वैश्विक संस्थाओं में सुधार की मांग
प्रधानमंत्री ने BRICS के एजेंडे को संगठन की आंतरिक मजबूती से आगे ले जाते हुए वैश्विक शासन व्यवस्था में सुधार पर भी जोर दिया। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में सुधार की प्रक्रिया को अब और टालने के खिलाफ आवाज उठाई।
उन्होंने कहा कि वैश्विक वित्तीय संस्थानों में वोटिंग पावर, नेतृत्व की भूमिका और नीतिगत प्राथमिकताओं को आज की आर्थिक वास्तविकताओं के अनुरूप बनाया जाना चाहिए। उनका तर्क था कि जो देश वैश्विक आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं, उन्हें वैश्विक आर्थिक शासन को आकार देने में भी उचित प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए।
'3R' फ्रेमवर्क और ग्लोबल साउथ
मोदी ने वैश्विक शासन के भविष्य के लिए तीन प्रमुख स्तंभों Representation, Responsiveness और Rule-making पर आधारित रोडमैप का प्रस्ताव रखा। उन्होंने कहा कि ग्लोबल साउथ आज वैश्विक संकटों से सबसे अधिक प्रभावित है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय निर्णय प्रक्रिया में उसकी भागीदारी अपेक्षाकृत कम है। उन्होंने मौजूदा व्यवस्था को ‘विशेषाधिकार के पिरामिड’ से ‘साझेदारी के प्लेटफॉर्म’ में बदलने की जरूरत बताई, जहां विकासशील देशों की आवाज और हितों को पर्याप्त महत्व मिले।
BRICS में सहमति बनाने की चुनौती
2026 में भारत की अध्यक्षता वाले BRICS सम्मेलन में सदस्य देशों के बीच कई संवेदनशील भू-राजनीतिक मुद्दों पर मतभेद के बावजूद संयुक्त बयान पर सहमति बनना महत्वपूर्ण माना जा रहा है। खास तौर पर ईरान, सऊदी अरब और UAE जैसे देशों की मौजूदगी ने पश्चिम एशिया से जुड़े मुद्दों पर आम सहमति बनाना चुनौतीपूर्ण बनाया। भारत ने लगातार परामर्श और संवाद के जरिए मतभेदों को कम करने तथा संगठन के साझा एजेंडे को आगे बढ़ाने पर जोर दिया।
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तीसरे दशक में BRICS की नई दिशा
BRICS अपनी 20वीं वर्षगांठ के अवसर पर तीसरे दशक में प्रवेश कर रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने इसे संगठन के लिए परिपक्वता और नई जिम्मेदारियों के दौर की शुरुआत बताया। भारत की 2026 की अध्यक्षता का फोकस Building for Resilience, Innovation, Cooperation and Sustainability पर है।
सस्टेनेबल डेवलपमेंट, आर्थिक विकास, तकनीक, क्लाइमेट एक्शन और ग्लोबल साउथ के बीच साझेदारी को बढ़ावा देना भारत के एजेंडे के प्रमुख हिस्से हैं। ऐसे में संस्थागत निरंतरता का प्रस्ताव BRICS को केवल वार्षिक शिखर सम्मेलन तक सीमित रखने के बजाय एक अधिक प्रभावी, ट्रैकिंग-आधारित और परिणाम-केंद्रित बहुपक्षीय मंच बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।