धान की कटाई का दौर शुरू होते ही पंजाब में पराली प्रबंधन को लेकर चुनौतियां बढ़ने लगी हैं। हालांकि, बीते कुछ वर्षों में प्रशासन की सख्ती, निगरानी और किसानों को जागरूक करने के प्रयासों से पराली जलाने की घटनाओं में कमी दर्ज की गई है। इसके बावजूद कटाई का काम तेज होने के साथ राज्य के कुछ जिलों में खेतों में आग लगाने के मामले सामने आ रहे हैं। वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) और सैटेलाइट निगरानी के आंकड़ों के आधार पर इन क्षेत्रों पर विशेष नजर रखी जा रही है।
अमृतसर और तरनतारन में पराली जलाने की चुनौती
पंजाब में पराली जलाने की शुरुआती घटनाओं के मामले में अमृतसर और तरनतारन प्रमुख जिलों के रूप में सामने आए हैं। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, अमृतसर में सबसे अधिक सक्रिय आग की घटनाएं दर्ज की गई हैं। नियमों का उल्लंघन करने वाले कुछ किसानों पर जुर्माना लगाने की कार्रवाई भी की गई है। वहीं, तरनतारन और फिरोजपुर जैसे सीमावर्ती जिलों में भी पराली प्रबंधन को लेकर सतर्कता बरती जा रही है। पराली जलाने से निकलने वाला धुआं वायु प्रदूषण बढ़ाता है। इसका असर लोगों के स्वास्थ्य के साथ-साथ पर्यावरण और मिट्टी की गुणवत्ता पर भी पड़ सकता है। ऐसे में फसल अवशेषों का उचित प्रबंधन करना जरूरी है।
सुपर सीडर और हैप्पी सीडर से खेत में ही करें पराली का प्रबंधन
पराली की समस्या का एक प्रभावी समाधान इन-सीटू मैनेजमेंट यानी खेत के भीतर ही फसल अवशेषों का निपटारा करना है। इसके लिए किसान सुपर सीडर और हैप्पी सीडर जैसी कृषि मशीनों की मदद ले सकते हैं। ये मशीनें धान के अवशेषों को खेत में मिलाने और गेहूं की बुवाई करने में सहायक होती हैं। इससे पराली जलाने की जरूरत कम हो सकती है और खेत की तैयारी में लगने वाला समय भी बचाया जा सकता है।
इसके अलावा, स्ट्रॉ मैनेजमेंट सिस्टम (SMS) से लैस कंबाइन हार्वेस्टर धान की कटाई के दौरान बचे अवशेषों को खेत में समान रूप से फैलाने में मदद करता है। इससे पराली को आगे संभालना और उसका प्रबंधन करना आसान हो जाता है। किसान इन मशीनों की उपलब्धता और सरकारी सब्सिडी से जुड़ी जानकारी स्थानीय कृषि विभाग से प्राप्त कर सकते हैं।
पूसा बायो-डीकंपोजर से पराली बनेगी जैविक खाद
पराली को जलाने के बजाय प्राकृतिक तरीके से सड़ाकर खाद में बदलने के लिए पूसा बायो-डीकंपोजर का इस्तेमाल किया जा सकता है। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) द्वारा विकसित यह तकनीक फसल अवशेषों को गलाने में मदद करती है। इसमें जैविक सूक्ष्मजीवों पर आधारित घोल का निर्धारित तरीके से छिड़काव किया जाता है, जिससे पराली के विघटन की प्रक्रिया तेज होती है। अनुकूल परिस्थितियों और सही इस्तेमाल के साथ फसल अवशेषों को खाद में बदलने में मदद मिल सकती है। इससे खेत में जैविकपदार्थ बढ़ाने और मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने में भी लाभ हो सकता है। हालांकि, पराली को पूरी तरह गलने में लगने वाला समय मौसम, नमी और अन्य परिस्थितियों पर निर्भर करता है।
पराली बेचकर किसान बढ़ा सकते हैं अपनी कमाई
जिन किसानों के लिए खेत में ही पराली का प्रबंधन करना मुश्किल है, उनके पास एक्स-सीटू मैनेजमेंट यानी फसल अवशेषों को खेत से बाहर निकालकर इस्तेमाल करने का विकल्प भी मौजूद है। इसके तहत बेलर मशीन की मदद से पराली को इकट्ठा करके बड़े बंडलों में बदला जा सकता है।
इन बंडलों का इस्तेमाल बायोमास आधारित ऊर्जा संयंत्रों, कुछ थर्मल पावर प्लांटों, बायोगैस इकाइयों और गत्ता बनाने वाले उद्योगों में किया जा सकता है। स्थानीय मांग और गुणवत्ता के अनुसार पराली की बिक्री से किसानों को अतिरिक्त आय भी मिल सकती है। कुछ परिस्थितियों में इसका उपयोग पशुओं के बिछावन या अन्य कृषि संबंधी जरूरतों के लिए भी किया जाता है।
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पराली जलाने के बजाय अपनाएं वैज्ञानिक तरीके
पंजाब में पराली जलाने की घटनाओं को कम करने के लिए किसानों, प्रशासन और कृषि विशेषज्ञों के बीच समन्वय जरूरी है। सुपर सीडर और हैप्पी सीडर से खेत में अवशेषों का प्रबंधन, बायो-डीकंपोजर का इस्तेमाल और पराली को उद्योगों तक पहुंचाना इसके प्रमुख विकल्प हैं। सही तकनीक और स्थानीय सुविधाओं के आधार पर किसान पराली को समस्या के बजाय उपयोगी संसाधन में बदल सकते हैं। इससे वायु प्रदूषण कम करने के प्रयासों को मजबूती मिलेगी और किसानों के लिए अतिरिक्त आर्थिक अवसर भी पैदा हो सकते हैं।