बिहार में वोटर लिस्ट के ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) को लेकर दायर याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट आज बुधवार को अपना अहम फैसला सुनाएगा। इन याचिकाओं में चुनाव आयोग द्वारा बड़े पैमाने पर कराई गई इस प्रक्रिया की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि संविधान के अनुच्छेद 326 और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के तहत चुनाव आयोग को इतनी व्यापक स्तर पर SIR कराने का अधिकार नहीं दिया गया है।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता में होगी सुनवाई

इस मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने की थी। अदालत ने 29 जनवरी को लंबी बहस पूरी होने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था। याचिकाकर्ताओं में चर्चित संस्था Association for Democratic Reforms (ADR) भी शामिल है। बिहार में SIR प्रक्रिया का पहला चरण पहले ही पूरा किया जा चुका है।

पिछले वर्ष 12 अगस्त को हुई थी अंतिम सुनवाई

मामले में अंतिम बहस पिछले वर्ष 12 अगस्त को हुई थी। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि मतदाता सूची में नाम जोड़ना या हटाना चुनाव आयोग के संवैधानिक अधिकार क्षेत्र का हिस्सा है। इसी बीच चुनाव आयोग ने उन लगभग 65 लाख लोगों की सूची भी जारी की थी, जिनके नाम बाद में प्रकाशित ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से हटा दिए गए थे।

SIR प्रक्रिया मे कही गई थी ये बात

SIR प्रक्रिया के तहत ऐसे मतदाताओं को अतिरिक्त दस्तावेज देने को कहा गया था, जिनके नाम 2002 या 2003 की मतदाता सूची में दर्ज नहीं थे। उन्हें उस अवधि की सूची में शामिल किसी व्यक्ति से अपना पारिवारिक या पुश्तैनी संबंध साबित करना था। चुनाव आयोग का तर्क था कि आधार कार्ड और वोटर आईडी नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं माने जा सकते।

याचिकाकर्ताओं ने इस पूरी प्रक्रिया को “NRC” बताते हुए आरोप लगाया

याचिकाकर्ताओं ने इस पूरी प्रक्रिया को “NRC जैसी कवायद” बताते हुए आरोप लगाया कि चुनाव आयोग अप्रत्यक्ष रूप से नागरिकता की जांच कर रहा है, जबकि यह अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास है। ADR की ओर से वरिष्ठ वकील Prashant Bhushan ने प्रक्रिया की समयसीमा पर भी सवाल उठाए। उन्होंने उन लाखों मतदाताओं के आंकड़ों पर भी संदेह जताया जिन्हें मृत, प्रवासी या अन्य निर्वाचन क्षेत्रों में पंजीकृत बताया गया था।

Written By Toshi Shah