Russia India Rail Corridor: रूस ने हिंद महासागर और भारत तक सीधे व्यापारिक पहुंच बनाने के लिए एक महत्वाकांक्षी रेल कॉरिडोर की संभावना जताई है। इस योजना को उस वक्त नया मोड़ मिला, जब अफगानिस्तान की तालिबान सरकार ने इस रेल मार्ग का स्वागत करते हुए इसकी सुरक्षा सुनिश्चित करने का वादा किया। हालांकि, रूस की इस दूरगामी रणनीति के सामने भू-राजनीतिक, वित्तीय और तकनीकी स्तर पर कई गंभीर चुनौतियां खड़ी हैं।
रूस की रणनीति और तालिबान का रुख
पश्चिम एशिया में समुद्री तनाव और पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों को देखते हुए रूस अपने व्यापार के लिए नए और सुरक्षित ज़मीनी रास्तों की तलाश कर रहा है। रूसी उप प्रधानमंत्री मरात खुसनुलिन ने तुर्कमेनिस्तान, ईरान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान के रास्ते भारत तक कनेक्टिविटी तलाशने की बात कही है। रूस और भारत के बीच 2030 तक 100 अरब डॉलर के द्विपक्षीय व्यापार का लक्ष्य हासिल करने में यह मार्ग अहम भूमिका निभा सकता है।
तालिबान सरकार के अर्थव्यवस्था मंत्रालय के प्रवक्ता अब्दुल रहमान हबीब के अनुसार, अफगानिस्तान इस परियोजना का पूर्ण समर्थन करता है क्योंकि इससे देश में रोजगार और ट्रांसिट फीस के नए अवसर पैदा होंगे। मॉस्को और काबुल के बीच मजबूत होते कूटनीतिक और सैन्य-तकनीकी संबंधों के बीच यह बयान बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
प्रमुख चुनौतियां और TAPI जैसी आशंकाएं
हालांकि अफगानिस्तान से समर्थन मिलने के बावजूद इस प्रोजेक्ट के व्यावहारिक रूप लेने में निम्नलिखित बड़े रोड़े हैं, इस प्रस्तावित मार्ग का एक बड़ा हिस्सा पाकिस्तान से होकर गुजरना होगा। ऐतिहासिक रूप से पाकिस्तान भारत को लाभ पहुंचाने वाले किसी भी क्षेत्रीय कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट में बाधा डालता रहा है। तुर्कमेनिस्तान-अफगानिस्तान-पाकिस्तान-भारत (TAPI) गैस पाइपलाइन भी पाकिस्तान की अड़ंगेबाज़ी और सुरक्षा चिंताओं के कारण वर्षों से अधर में लटकी हुई है। कई देशों से होकर गुजरने वाली इस हजारों किलोमीटर लंबी रेल लाइन के निर्माण के लिए अरबों डॉलर के निवेश की आवश्यकता होगी। इसके अलावा, अलग-अलग देशों के कस्टम नियम, सीमा सुरक्षा, रेलवे ट्रैक गेज की भिन्नता और सुरक्षा व्यवस्था का तालमेल बिठाना एक जटिल काम है।
क्या यह प्रोजेक्ट सफल हो पाएगा?
विशेषज्ञों का मानना है कि TAPI की तुलना में इस रेल प्रोजेक्ट का पलड़ा इसलिए थोड़ा भारी है क्योंकि इसमें रूस जैसा बड़ा खिलाड़ी सीधे तौर पर शामिल है, जिसके पास संसाधन और रणनीतिक ज़रूरत दोनों हैं। इसके अलावा, ट्रांस-अफगान रेलवे जैसी अन्य क्षेत्रीय योजनाओं पर भी काम चल रहा है, जिससे मध्य एशिया में रेल नेटवर्क का आधार बन रहा है। तमाम कोशिशों के बावजूद, जब तक भारत, पाकिस्तान और क्षेत्रीय देशों के बीच कूटनीतिक सहमति और वित्तीय ढांचा तैयार नहीं होता, तब तक रूस से दिल्ली तक ट्रेन का सपना कागजी योजनाओं से निकलकर पटरी पर उतरना एक बेहद कठिन चुनौती बना रहेगा।
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Written by Shailesh Yadav