PM Modi On Muharram: मुहर्रम के पवित्र अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों, विशेषकर मुस्लिम समुदाय को संदेश देते हुए हजरत इमाम हुसैन (अ.स.) की कुर्बानी को याद किया। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट साझा करते हुए कहा कि इमाम हुसैन का बलिदान आज भी लोगों को सच्चाई, न्याय और इंसाफ़ के रास्ते पर मजबूती से डटे रहने की प्रेरणा देता है। प्रधानमंत्री ने अपने संदेश में कहा कि कर्बला की कुर्बानी हिम्मत, धैर्य और अटूट विश्वास का ऐसा उदाहरण है, जो पूरी मानवता को अन्याय के खिलाफ खड़े होने की सीख देता है।

मुहर्रम क्यों है खास?

मुहर्रम इस्लामी कैलेंडर का पहला महीना है और इसे विशेष रूप से शोक और बलिदान का महीना माना जाता है। इस महीने की 10वीं तारीख, जिसे आशूरा कहा जाता है, कर्बला की उस ऐतिहासिक घटना की याद दिलाती है, जब पैगंबर हजरत मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के नवासे हजरत इमाम हुसैन (अ.स.) और उनके साथियों ने सत्य और न्याय की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए।

यह महीना त्याग, सब्र और ईमानदारी का प्रतीक

चांद दिखाई देने के साथ ही दुनिया भर में मुस्लिम समुदाय, विशेषकर शिया मुसलमान, काले वस्त्र पहनकर मजलिसों का आयोजन करते हैं और इमाम हुसैन (अ.स.) की शहादत को याद करते हैं। यह महीना त्याग, सब्र और ईमानदारी का प्रतीक माना जाता है।

61 हिजरी की ऐतिहासिक घटना

कर्बला की घटना 61 हिजरी (680 ईस्वी) में हुई थी। उस समय यज़ीद इब्ने माविया सत्ता में था और वह चाहता था कि इमाम हुसैन (अ.स.) उसकी बैअत (निष्ठा की शपथ) स्वीकार कर लें। लेकिन इमाम हुसैन ने अन्याय और गलत शासन के सामने झुकने से साफ इनकार कर दिया उनका मानना था कि यदि सत्य का साथ छोड़ दिया गया, तो अन्याय को वैधता मिल जाएगी और आने वाली पीढ़ियों के लिए न्याय का मार्ग कठिन हो जाएगा। इसी उद्देश्य से उन्होंने हर कीमत पर सत्य का साथ देने का निर्णय लिया।

कर्बला में संघर्ष और प्यास की परीक्षा

2 मुहर्रम को इमाम हुसैन (अ.स.) अपने परिवार और साथियों के साथ कर्बला पहुंचे। उनके साथ सीमित संख्या में लोग थे, जिनमें महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग भी शामिल थे। दूसरी ओर यज़ीद की विशाल सेना मौजूद थी। 7 मुहर्रम को फरात नदी से पानी की आपूर्ति रोक दी गई। इसके बाद शिविर में मौजूद बच्चों और महिलाओं को भीषण प्यास का सामना करना पड़ा। परंपरागत वर्णनों के अनुसार, छह महीने के अली असगर सहित कई बच्चे प्यास से तड़पते रहे। कठिन परिस्थितियों के बावजूद इमाम हुसैन (अ.स.) ने अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया और अन्याय के आगे झुकने से इनकार कर दिया।

आशूरा: बलिदान की अमर मिसाल

10 मुहर्रम यानी आशूरा के दिन इमाम हुसैन (अ.स.) के साथी एक-एक कर युद्ध में शहीद होते गए। उनके परिवार के कई सदस्य और करीबी साथी भी इस संघर्ष में मारे गए। अंततः इमाम हुसैन (अ.स.) ने भी सत्य और न्याय की रक्षा करते हुए अपने प्राणों का बलिदान दिया।

कर्बला की यह घटना मानवता की रक्षा का प्रतीक 

कर्बला की यह घटना केवल एक ऐतिहासिक युद्ध नहीं, बल्कि अन्याय के विरुद्ध संघर्ष, नैतिक साहस और मानवता की रक्षा का प्रतीक मानी जाती है। यही कारण है कि सदियों बाद भी इमाम हुसैन (अ.स.) की कुर्बानी दुनिया भर के लोगों को सत्य, धैर्य और न्याय के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संदेश भी इसी सार्वभौमिक भावना को रेखांकित करता है कि कर्बला का संदेश किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं, बल्कि पूरी मानवता के लिए साहस, त्याग और इंसाफ़ का अमर संदेश है।

Written By: Geeta Sharma