MMDR Amendment Bill 2026: : झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने गुरुवार को सोशल मीडिया पर पोस्ट कर कहा कि अगर केंद्र सरकार ने इस कानून को वापस नहीं लिया तो झारखंड ऐसा आंदोलन करेगा, जिसे पूरा देश देखेगा। मुख्यमंत्री ने अपने बयान में राज्य के खनिज और जमीन के अधिकार का मुद्दा उठाते हुए पूछा कि जब खनिज झारखंड का है और जमीन भी झारखंड की है, तो इससे जुड़े अधिकारों का फैसला दिल्ली क्यों करेगी?
मुख्यमंत्री ने नए कानून को झारखंड और यहां के लोगों के हितों के खिलाफ बताया है। उनका आरोप है कि इस कानून के जरिए राज्य के आर्थिक अधिकारों को कमजोर करने की कोशिश की गई है।
आखिर नए खनिज बिल में क्या बदला गया है?
विवाद की सबसे बड़ी वजह खनिज अधिकारों पर टैक्स, सेस और दूसरे शुल्क लगाने से जुड़ा प्रावधान है। नए संशोधन में राज्यों को खनिज अधिकारों पर अपनी तरफ से टैक्स, सेस या इसी तरह का कोई अन्य शुल्क लगाने से रोकने का प्रावधान किया गया है।केंद्र सरकार की दलील है कि अलग-अलग राज्यों में खनिज अधिकारों और खनिज वाली जमीन पर लगाए जाने वाले शुल्क की कोई स्पष्ट सीमा नहीं होने से माइनिंग सेक्टर में अनिश्चितता बढ़ रही थी। सरकार का कहना है कि नए प्रावधान से इस व्यवस्था में एकरूपता आएगी और खनन क्षेत्र में निवेश का माहौल बेहतर होगा।लेकिन झारखंड सरकार की चिंता दूसरी है। राज्य की अर्थव्यवस्था में खनन और खनिज संसाधनों की बड़ी भूमिका है। ऐसे में राज्य सरकार का मानना है कि खनिज से जुड़े शुल्कों पर रोक लगने का असर उसके राजस्व पर पड़ सकता है।
खनिज वाली जमीन पर भी केंद्र की भूमिका बढ़ेगी?
बिल में केवल टैक्स और सेस से जुड़ी व्यवस्था ही नहीं है। कुछ खनिज वाली जमीनों के नियमन से संबंधित मामलों में केंद्र सरकार को अधिक अधिकार देने का भी प्रावधान किया गया है।यही मुद्दा झारखंड सरकार की नाराजगी को और बढ़ा रहा है। राज्य सरकार इसे अपने अधिकार क्षेत्र में केंद्र के बढ़ते दखल के तौर पर देख रही है।प्रस्तावित व्यवस्था के तहत खनिज की मात्रा, उसकी कीमत या रॉयल्टी जैसे आधारों पर लगाए जाने वाले कुछ शुल्क भी नई पाबंदियों के दायरे में आ सकते हैं। हालांकि केंद्र सरकार की ओर से तय शर्तों और नियमों के तहत लगाए गए शुल्कों को कुछ परिस्थितियों में इस रोक से अलग रखा गया है।
पहले जमा हो चुका पैसा वापस नहीं होगा
संशोधन में पहले से जमा या वसूले जा चुके टैक्स और शुल्क को लेकर भी स्थिति स्पष्ट की गई है। कानून लागू होने से पहले अगर किसी शुल्क की रकम राज्य सरकार के पास जमा हो चुकी है या उसे वसूल लिया गया है, तो उसे वापस नहीं किया जाएगा।नई व्यवस्था का असर मुख्य रूप से भविष्य में लगाए जाने वाले ऐसे शुल्कों पर पड़ेगा, जिन्हें कानून के लागू होने के बाद राज्य सरकार लगाने की कोशिश करेगी।
हेमंत सोरेन ने क्यों खोला केंद्र के खिलाफ मोर्चा?
हेमंत सोरेन का कहना है कि झारखंड अपने प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े अधिकारों से पीछे नहीं हटेगा। मुख्यमंत्री ने इसे राज्य के अधिकारों और भविष्य से जुड़ा मामला बताया है।उन्होंने कहा कि झारखंड मुक्ति मोर्चा इस कानून का मजबूती से विरोध करेगा। अगर केंद्र सरकार ने अपना फैसला वापस नहीं लिया तो विरोध को पूरे राज्य में फैलाया जाएगा।मुख्यमंत्री ने जिला, प्रखंड, पंचायत और शहर स्तर तक विरोध की बात कही है। इससे संकेत मिल रहा है कि आने वाले दिनों में खनिज अधिकारों का मुद्दा झारखंड की राजनीति में बड़ा आंदोलन खड़ा कर सकता है।
केंद्र की दलील और झारखंड की आपत्ति अलग-अलग
एक तरफ केंद्र सरकार नए कानून को खनन क्षेत्र में स्पष्टता और स्थिरता लाने वाला कदम बता रही है। दूसरी तरफ झारखंड सरकार इसे राज्य के राजस्व और अधिकारों से जोड़कर देख रही है।झारखंड देश के प्रमुख खनिज उत्पादक राज्यों में शामिल है। कोयला और लौह अयस्क जैसे संसाधनों के कारण यहां खनन का सीधा संबंध राज्य की अर्थव्यवस्था से है। इसलिए नए कानून के बाद राज्य और केंद्र के बीच अधिकारों को लेकर खींचतान बढ़ना तय माना जा रहा है।
Written By: Shivashakti Narayan Singh