UP Assembly elections 2027: उत्तर प्रदेश की सियासत में कभी ब्राह्मण-दलित सोशल इंजीनियरिंग के जरिए सत्ता तक पहुंची बहुजन समाज पार्टी (बसपा) अब अपने पुराने समीकरण को फिर साधने की कोशिश में जुटी है। आपको बता दें कि पार्टी अध्यक्ष मायावती आगामी विधानसभा चुनाव में ब्राह्मणों को दोबारा जोड़ने की रणनीति पर काम कर रही हैं, लेकिन चुनौती यह है कि पार्टी के कई पुराने और कद्दावर ब्राह्मण नेता अब बसपा से दूर हो चुके हैं। अंटू मिश्रा का निष्कासन इसी सिलसिले की ताजा कड़ी माना जा रहा है।
2007 में चला था सोशल इंजीनियरिंग का दांव
2007 के विधानसभा चुनाव में बसपा ने 80 से अधिक ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट दिया था, जिनमें 41 विधायक चुने गए। दलित-ब्राह्मण गठजोड़ का यह प्रयोग इतना सफल रहा कि मायावती पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाने में कामयाब हुईं। इसके बाद दूसरे राजनीतिक दलों ने भी ब्राह्मण वोटरों को साधने के लिए अपनी रणनीति में बदलाव किया। हालांकि, समय के साथ बसपा के कई प्रमुख ब्राह्मण चेहरे पार्टी से अलग होते गए।
एक-एक कर दूर हुए कई बड़े नेता
ब्रजेश पाठक, जो अब भाजपा सरकार में उपमुख्यमंत्री हैं, कभी बसपा के प्रमुख ब्राह्मण चेहरों में शामिल थे। बसपा ने उन्हें राज्यसभा सांसद भी बनाया था, लेकिन बाद में उन्होंने भाजपा का रुख कर लिया। पूर्व मंत्री नकुल दुबे ने 2022 में बसपा छोड़कर कांग्रेस का दामन थाम लिया। पूर्व मंत्री रामवीर उपाध्याय, रंगनाथ मिश्रा, विनय शंकर तिवारी और उनके परिवार के कई सदस्य भी समय के साथ बसपा से दूर हो गए। पूर्व विधान परिषद सभापति गणेश शंकर पांडेय समेत कई अन्य ब्राह्मण नेता भी पार्टी छोड़कर दूसरे राजनीतिक दलों में चले गए। अंबेडकरनगर से बसपा सांसद और विधायक रहे राकेश पांडेय और उनके बेटे रितेश पांडेय भी अब पार्टी का हिस्सा नहीं हैं।
अब सतीश मिश्रा पर टिकी नजर
ब्राह्मण नेताओं के लगातार अलग होने के बीच बसपा में अब राष्ट्रीय महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा सबसे प्रमुख ब्राह्मण चेहरा माने जाते हैं। लंबे समय से वह पार्टी के ब्राह्मण सम्मेलनों और इस समुदाय को जोड़ने की मुहिम की अगुवाई करते रहे हैं। ऐसे में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले ब्राह्मणों को बसपा के साथ दोबारा जोड़ने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी सतीश मिश्रा के कंधों पर है।
खुशी दुबे मामले से लेकर ब्राह्मण सम्मेलन तक
ब्राह्मण वोट बैंक को साधने के लिए बसपा ने समय-समय पर अलग-अलग रणनीतियां अपनाई हैं। बिकरू कांड की आरोपी खुशी दुबे के मामले में भी पार्टी ने कानूनी मदद की पहल की थी। 2021 में बसपा ने ब्राह्मण सम्मेलन आयोजित किए थे। मायावती लगातार भाजपा सरकार पर ब्राह्मणों की उपेक्षा का आरोप लगाती रही हैं। आगामी चुनाव के लिए पार्टी ने ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट देने की शुरुआत भी की है। सादाबाद सीट से भी ब्राह्मण प्रत्याशी घोषित किया गया है। हालांकि, इसके बावजूद दूसरे दलों के बड़े ब्राह्मण नेताओं का बसपा की ओर रुख करना पार्टी के लिए अभी चुनौती बना हुआ है।
भाजपा कार्यालय पहुंचने पर मचा था सियासी हंगामा
अंटू मिश्रा को लेकर भी पिछले दिनों सियासी चर्चा तेज हुई थी। करीब दो साल पहले वह भाजपा प्रदेश कार्यालय पहुंचे थे। उनके साथ मार्च 2024 में भाजपा की सदस्यता लेने वाले बसपा के एक नेता भी मौजूद थे। इसके बाद अंटू मिश्रा के भाजपा में शामिल होने की अटकलें तेज हो गई थीं। हालांकि, उस समय भाजपा में उनकी औपचारिक सदस्यता नहीं हुई। बाद में दिल्ली में सदस्यता दिलाए जाने की चर्चा भी सामने आई, लेकिन यह कवायद आगे नहीं बढ़ सकी।
ऐसे में सवाल यही है कि जिन ब्राह्मण चेहरों के दम पर बसपा ने 2007 में सत्ता का मजबूत किला खड़ा किया था, उनके लगातार दूर होने के बाद क्या सतीश मिश्रा पार्टी के पुराने ब्राह्मण समीकरण को फिर से जिंदा कर पाएंगे?
Written by Shailesh Yadav