नई दिल्ली। देश में हर साल 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाता है। सरकारी स्तर पर किसी भाषा को लेकर इतना बड़ा उत्सव शायद ही मनाया जाता हो। लेकिन सरकारी स्तर पर इतने दावे के बाद भी हिंदी की दशा और दिशा लगातार बिगड़ती जा रही है। आज भी देश में अंग्रेजी का बोलबाला है। भाषा के रूप में हिंदी का प्रचार-प्रसार भले ही बढ़ा हो, लेकिन साहित्य और ज्ञान की भाषा के रूप में हिंदी लगातार पिछड़ती जा रही है।
साठ के दशक में चला था अंग्रेजी हटाओ आंदोलन
साठ के दशक में देश के विश्वविद्यालयों में अंग्रेजी हटाओ और हिंदी लाओ के नारे लगते थे। उस समय युवाओं का सपना था कि अपनी भाषा में ज्ञान का द्वार खुलेगा, तो हर कोई बराबर तरक्की करेगा। लेकिन आज के दौर में उच्च शिक्षा की कौन कहे, लगभग अधिकांश राज्यों में प्राथमिक कक्षाओं से अंग्रेजी को लागू किया जा रहा है। अपने ही भाषा और साहित्य के साथ इस तरह के बर्ताव की यह अनोखी घटना है। आज भी हिंदी के साथ देश में दोयम दर्जे का वयवहार किया जा रहा है।
देश में हिंदी बोलने वाले कितने?
हिन्दी संवैधानिक रूप से भारत की प्रथम राजभाषा और देश की सबसे अधिक बोली और समझी जानेवाली भाषा है। जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक, हिंदी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है। 2011 की जनगणना में 121 करोड़ की आबादी में से 52.83 करोड़ से ज्यादा लोग हिंदी बोलने वाले थे। इसका मतलब हुआ कि भारत की 43.6 प्रतिशत आबादी की भाषा हिंदी है। चीनी भाषा के बाद यह विश्व में तीसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा भी है।
भारत सहित कई देशों में 6० करोड़ से अधिक लोग हिन्दी बोलते, पढ़ते और लिखते हैं। फ़िजी, मॉरिशस, गयाना, सूरीनाम की अधिकतर और नेपाल की कुछ जनता हिन्दी बोलती है। उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, उत्तरांचल, हिमाचल प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, हरियाणा, और दिल्ली राज्यों की यह राजभाषा है। हिन्दी के राष्ट्रभाषा, राजभाषा, सम्पर्क भाषा, जनभाषा के सोपानों को पार कर विश्वभाषा बनने के दावे किए जाते हैं। लेकिन देश के अंदर और विश्वस्तर पर हिंदी को जो गौरव मिलना चाहिए था। वह नहीं मिल सका है।
हिंदी माध्यम के स्कूलों की दशा ठीक नहीं
देश में हिंदी माध्यम के स्कूलों की दशा ठीक नहीं है। ऐसे स्कूल या तो बंद हो गए हैं या कोई अपना बच्चा वहां भेजना नहीं चाहता है। अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों और अंग्रेजी बोलने वालों की तरफ से हिंदी के प्रति अरुचि पैदा की जा रही है। आजादी के बाद एक सपना था कि हिंदी ज्ञान-विज्ञान की भाषा बनेगी। हिंदी में मेडिकल, इंजीनियरिंग और प्रौद्योगिकी की पढ़ाई होगी। लेकिन इस दिशा में कोई ठोस प्रयास नहीं हुआ। तकनीकि शिक्षा के लिए जिस शब्दावली का विकास होना चाहिए था। उसका विकास हिंदी में नहीं किया गया। हिंदी फिल्मों और गानों की लोकप्रियता का आधार बना कर कुछ लोग दावा करते हैं कि हिंदी दिनोंदिन बढ़ रही है। यह देश के भौगोलिक सीमा के पार जा रही है। लेकिन यह मात्र छलावा है। ज्ञान के भाषा के रूप में हिंदी का विकास नहीं हो पाया।
फिल्मों के शीर्षक भी आधी हिंदी और आधी अंग्रेजी में
हिंदी की सामाजिक स्थिति भी ठीक नहीं है। आज भी हिंदी पढ़े लिखे लोगों को उतना सम्मान नहीं हासिल है जितना की अंग्रेजी पढ़े-लिखें को मिलता है। हिंदी को अभी उच्च कोटि की भाषा के रूप में स्वीकार्यता नहीं मिली है। विश्व के किसी भी देश में जाइए वहां के लोग अपनी मातृभाषा में बात करते हैं। लेकिन हमारे देश के लोग अपने ही लोगों से अंग्रेजी में बात करते हैं।
ढेर सारे विदेशी देश यह समझते हैं कि भारत की भाषा अंग्रेजी है। जब वे हिंदुस्तान आते हैं तब जाकर उन्हें हिंदी के बारे में पता चलता है। हमारे सारे दूतावास अपना काम अंग्रेजी में करते हैं। लोकप्रियता के रूप में हिंदी गाने रिकार्ड बना सकते है। लेकिन अब तो फिल्मों के शीर्षक भी आधी हिंदी और आधी अंग्रेजी में होने लगे हैं। सत्ता के गलियारों और नौकरशाही में जाकर अंग्रेजी में बात करिए तो काम हो जाएगा। लेकिन हिंदी में बात करिए तो नहीं होगा।
हिंदी उत्थान की संस्थाएं कर रही कानूनी नियमों का निष्प्राण निर्वाह
देश में हिंदी के उत्थान में लगे सरकारी पक्ष की तरफ से देखें तो जाहिर है कि सरकार कुछ नहीं कर रही है। जो कुछ कर रही है वह कानूनी, संवैधानिक नियमों का निष्प्राण निर्वाह है। सरकारी काम काज के रूप में जिस हिंदी का प्रयोग हो रहा है। वह किसी काम की नहीं है। सरकार पहले हर काम अंग्रेजी में कराती है। फिर हिंदी में उसका अनुवाद कराया जाता है। राजभाषा में लिखी गयी रिपोर्ट को पढ़ना मुश्किल होता है। राजभाषा के रूप में इस्तेमाल होने वाली हिंदी हास्यास्पद बन गयी है।
अकादमिक स्तर पर, ज्ञान की भाषा के रूप हिंदी आगे नहीं बढ़ रही है। विज्ञान और गणित के जटिल से जटिल सवालों को हल करने में हिंदी मेधा भले ही सक्षम हो लेकिन इसके लिए हिंदी के पास शब्द का अभाव है। हिंदी अभी ऐसी भाषा नहीं बन पायी है कि अकादमिक संस्थानों में इसका उपयोग हो सके।
हिंदी के विकास की भी संभावनाएं बनी हुई हैं
विज्ञान, चिकित्सा और प्रौद्योगिकी की शिक्षा अभी हिंदी में नहीं दी जा रही है। क्योंकि उसके लिए जरूरी शब्दावली का विकास इस भाषा में नहीं हो सका है। हिंदी के विकास की भी संभावनाएं बनी हुई हैं। हिंदी के साथ एक समस्या यह भी है कि अंग्रेजी के शब्द तो हिंदी में आ रहे हैं। लेकिन दूसरी भारतीय भाषाओं के शब्द हिंदी में नहीं आ रहे हैं। अगर भारतीय भाषाओं का एक दूसरे में शब्दों का आदान प्रदान होता रहे तो सारी भारतीय भाषाओं का विकास होता और आपसी संबंध मजबूत होता।
विश्व साहित्य में हिंदी साहित्य की स्थिति संतोषजनक नहीं
विश्व साहित्य में हिंदी साहित्य की स्थिति भी संतोषजनक नहीं है। हिंदी विश्व की तीसरी सबसे बड़ी भाषा है। भारत में यह सबसे अधिक लोगों द्वारा बोली जाती है। इस कारण इसे जो सम्मान मिलना चाहिए था। वह नहीं मिला है। हिंदी में लिखी किताबों का अनुवाद कम होता है।