नई दिल्ली: सोशल मीडिया के दौर में राजनीति की भाषा भी तेजी से बदल रही है। अब लंबे भाषणों और गंभीर राजनीतिक नारों के साथ-साथ मीम, रील और वायरल ट्रेंड भी नेताओं के संदेश का हिस्सा बन रहे हैं। इन दिनों ‘एक कचौड़ी, दो समोसा’ वाला नारा इसी बदलाव की चर्चा में है। महिला सुरक्षा को लेकर दिल्ली में हुए प्रदर्शनों से चर्चा में आया यह नारा सोशल मीडिया पर वायरल हुआ और इसके बाद समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने इसे राजनीतिक बयानबाजी में इस्तेमाल किया।
अखिलेश के बाद दूसरे नेताओं ने भी इसी वायरल फॉर्मेट को अपने संदेश के लिए इस्तेमाल किया। ऐसे में सवाल है कि आखिर इस नारे में ऐसा क्या है, जिसने प्रदर्शन से लेकर सोशल मीडिया और फिर सियासत तक जगह बना ली?
महिला सुरक्षा के प्रदर्शन से शुरू हुई कहानी
दिल्ली में महिला सुरक्षा के मुद्दे को लेकर छात्राओं के प्रदर्शन के दौरान कई ऐसे नारे सुनाई दिए, जिनकी भाषा पारंपरिक राजनीतिक नारों से अलग थी। इनमें ‘एक कचौड़ी, दो समोसा, इन मर्दों का क्या भरोसा’ भी शामिल था।
नारे में तुकबंदी और बोलचाल की भाषा का इस्तेमाल किया गया था। प्रदर्शन के वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आए तो यह लाइन भी तेजी से लोगों के बीच पहुंची। महिला सुरक्षा के गंभीर मुद्दे के बीच नारे का यह अंदाज युवाओं की डिजिटल भाषा से जुड़ा हुआ नजर आया। यहीं से यह सिर्फ प्रदर्शन स्थल पर सुनाई देने वाला नारा नहीं रहा, बल्कि सोशल मीडिया ट्रेंड का हिस्सा बन गया।
सोशल मीडिया ने कैसे बदला नारे का सफर?
आज किसी प्रदर्शन या सार्वजनिक कार्यक्रम में कही गई एक लाइन का सफर सिर्फ वहीं तक सीमित नहीं रहता। उसका वीडियो बनता है, क्लिप सोशल मीडिया पर जाती है और फिर लोग उसी लाइन को अलग-अलग संदर्भों में इस्तेमाल करने लगते हैं। ‘एक कचौड़ी, दो समोसा’ के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। इसकी तुकबंदी छोटी थी और आसानी से याद रह सकती थी। यही वजह है कि इसे अलग संदर्भ में दोहराना भी आसान रहा।
यहीं Gen Z की डिजिटल कम्युनिकेशन स्टाइल दिखाई देती है, जहां किसी लंबे संदेश की जगह कुछ शब्दों में बात कही जाती है और वायरल फॉर्मेट के जरिए उसे ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जाता है।
अखिलेश यादव ने इसे राजनीति से कैसे जोड़ा?
जब यह लाइन सोशल मीडिया पर चर्चा में थी, तब अखिलेश यादव ने इसी फॉर्मेट को राजनीतिक बयान में इस्तेमाल किया। उन्होंने ‘एक कचौड़ी, दो समोसा, बीजेपी पर नहीं भरोसा’ कहते हुए बीजेपी पर निशाना साधा। यहां मूल नारे की संरचना और तुकबंदी को बरकरार रखा गया, लेकिन संदेश को राजनीतिक संदर्भ दे दिया गया। इसके साथ अखिलेश यादव ने Gen Z का भी जिक्र किया। यानी महिला सुरक्षा के प्रदर्शन से निकला एक वायरल फॉर्मेट अब सीधे राजनीतिक बयान का हिस्सा बन चुका था।
इसके बाद दूसरे नेता भी हुए शामिल
यह ट्रेंड सिर्फ एक नेता तक सीमित नहीं रहा। असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने भी सोशल मीडिया पर ‘एक कचौड़ी, दो समोसा’ वाली लाइन का इस्तेमाल करते हुए अपना संदेश दिया। इससे एक और चीज सामने आई- सोशल मीडिया पर वायरल किसी फॉर्मेट को राजनीतिक दल या नेता अपने-अपने संदेश के मुताबिक बदल सकते हैं। मूल नारे का संदर्भ वही रहना जरूरी नहीं होता। उसकी पहचान बनाने वाले शब्द और तुकबंदी लोगों का ध्यान खींचने के लिए इस्तेमाल की जा सकती है।
Gen Z की भाषा राजनीति में क्यों पहुंच रही है?
राजनीतिक संवाद में सोशल मीडिया की भूमिका बढ़ने के साथ नेताओं के संवाद का तरीका भी बदल रहा है। युवा वर्ग तक पहुंचने के लिए अब सिर्फ पारंपरिक भाषण पर्याप्त नहीं हैं। रील, मीम, छोटे वीडियो और ट्रेंडिंग वाक्य सोशल मीडिया पर तेजी से फैलते हैं। Gen Z की ऑनलाइन भाषा में छोटे वाक्य, तुकबंदी, मीम और ट्रेंडिंग फॉर्मेट काफी अहम हैं। ऐसे में राजनीतिक संदेश जब इसी अंदाज में तैयार होता है, तो वह सोशल मीडिया पर चर्चा के लिए ज्यादा अनुकूल हो जाता है।
‘एक कचौड़ी, दो समोसा’ इसी बदलाव का एक ताजा उदाहरण है।
लेकिन क्या यह पूरी Gen Z की आवाज है?
यहां एक बात समझना जरूरी है। किसी प्रदर्शन में इस्तेमाल हुआ नारा या सोशल मीडिया पर वायरल हुआ ट्रेंड पूरी Gen Z की राजनीतिक सोच का प्रतिनिधित्व नहीं करता। Gen Z के भीतर भी राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों को लेकर अलग-अलग विचार हो सकते हैं। इसलिए इस नारे की लोकप्रियता को पूरी युवा पीढ़ी की एक जैसी राजनीतिक राय के तौर पर देखना सही नहीं होगा। यह ट्रेंड मुख्य रूप से यह दिखाता है कि युवाओं की डिजिटल भाषा और सोशल मीडिया कल्चर अब राजनीतिक संचार का हिस्सा बन चुके हैं।
नारे से राजनीति तक पहुंचने का नया रास्ता
पहले राजनीतिक नारों का सफर रैली से पोस्टर, अखबार और टीवी तक जाता था। अब इसका रास्ता बदल गया है। किसी मुद्दे पर प्रदर्शन हुआ, वहां कोई लाइन बोली गई, उसका वीडियो बना, सोशल मीडिया पर वह वायरल हुई और फिर वही लाइन राजनीतिक बयान में इस्तेमाल हो गई।
‘एक कचौड़ी, दो समोसा’ का सफर इसी बदलती राजनीतिक भाषा को दिखाता है।
महिला सुरक्षा के मुद्दे से शुरू हुआ यह नारा अब नेताओं की बयानबाजी और सोशल मीडिया पोस्ट तक पहुंच चुका है। इससे यह भी साफ होता है कि राजनीति में अब सिर्फ मुद्दे ही नहीं, बल्कि ट्रेंडिंग भाषा और डिजिटल कल्चर भी संदेश पहुंचाने का माध्यम बन रहे हैं।
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