दुनिया के सबसे अमीर तेल उत्पादक देशों में गिने जाने वाले सऊदी अरब को अब बड़े पैमाने पर कर्ज लेना पड़ रहा है। क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की महत्वाकांक्षी विजन 2030 योजनाओं और लगातार बढ़ते सरकारी खर्च के बीच देश की वित्तीय जरूरतें तेजी से बढ़ी हैं। हालांकि, इसे यह कहना सही नहीं होगा कि सऊदी अरब आर्थिक रूप से दिवालिया होने की स्थिति में है।

2026 में करीब 58 अरब डॉलर की उधारी योजना
सऊदी अरब ने 2026 के लिए करीब 217 अरब सऊदी रियाल यानी लगभग 57.9 अरब डॉलर की वित्तीय जरूरत का अनुमान लगाया है। इसमें बजट घाटे को पूरा करने के साथ-साथ पुराने कर्ज की अदायगी भी शामिल है। यानी सऊदी का नया कर्ज सिर्फ खर्च चलाने के लिए नहीं है, बल्कि मौजूदा कर्ज की कुछ देनदारियां चुकाने के लिए भी उधारी ली जा रही है।

तेल से कमाई घटी, खर्च बढ़ा
सऊदी अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत लंबे समय से तेल रहा है। लेकिन तेल की कम कीमतों या कम तेल आय के दौर में सरकार के राजस्व पर दबाव बढ़ जाता है। 2026 की पहली तिमाही में सऊदी अरब को करीब 125.7 अरब रियाल का बजट घाटा हुआ। इस दौरान तेल से मिलने वाला राजस्व सालाना आधार पर करीब 3 फीसदी घटा, जबकि सरकारी खर्च करीब 20 फीसदी बढ़ गया। यही अंतर सरकार को बाजार से पैसा जुटाने के लिए मजबूर करता है।

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असली वजह है मोहम्मद बिन सलमान का ‘विजन 2030’
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक सऊदी अरब 8 अरब डॉलर का भारी-भरकम लोन लेने की तैयारी कर रहा है.  8 अरब डॉलर को अगर रुपयों में देखें तो लगभग 7.6 खरब 7.6 खरब रुपये होते हैं। क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान सऊदी की अर्थव्यवस्था को सिर्फ तेल पर निर्भर नहीं रखना चाहते। इसी उद्देश्य से विजन 2030 के तहत पर्यटन, तकनीक, मनोरंजन, रियल एस्टेट, खेल और नई अर्थव्यवस्था में अरबों डॉलर का निवेश किया जा रहा है।

NEOM जैसे मेगा प्रोजेक्ट, नए शहर, पर्यटन परियोजनाएं और बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट इसी रणनीति का हिस्सा हैं। इन योजनाओं को पूरा करने के लिए सरकार और सऊदी के सरकारी निवेश फंड को भारी पूंजी की जरूरत है।

तो क्या सऊदी अरब कंगाल हो रहा है?
नहीं। सऊदी अरब अभी भी बड़ी संपत्ति और मजबूत वित्तीय क्षमता वाला देश है। उसका सरकारी कर्ज कई देशों की तुलना में कम स्तर पर है और उसके पास विशाल सरकारी निवेश संपत्तियां भी हैं। लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट्स, बढ़ता सरकारी खर्च और तेल से राजस्व में दबाव एक साथ आने पर कर्ज की जरूरत बढ़ रही है। इसी वजह से सऊदी अब अंतरराष्ट्रीय बॉन्ड और दूसरे वित्तीय साधनों के जरिए बड़ी रकम जुटा रहा है।