El Nino: दुनियाभर में अल नूीनो का कहर दिखना शुरू हो गया है। कहीं तूफान, कहीं भूकंप तो कहीं सूखे से स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। इसी बीच अमेरिका में इसायस तूफान का कहर दिखना शुरू हो गया है। 160 किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार से तूफान कई जगहों पर आगे बढ़ रहा है, जिसमे मैक्सिको, कैलिफोर्निया, फ्लोरिडा जैसे शहर शामिल है। प्रशासन ने अलर्ट जारी कर दिया है। 5 लाख से अधिक घरों में बिजली गायब हो चुकी है। लोग अंधेरे में रहने के लिए मजबूर हो गए है।

अंटलांटिक महासागर में तूफान ने दी दस्तक

आमतौर पर अटलांटिक में तूफानों का मौसम जून से नवंबर तक रहता है। इस बार प्रशांत महासागर में अल नीनो की स्थिति के कारण अटलांटिक में तूफान बनने की रफ्तार धीमी रही। 30 साल से ज्यादा समय में यह पहली बार है जब अंटलांटिक महासागर में तूफान आ गया है। तेज हवाएं तूफानों की बनावट बिगाड़ सकती है।

क्या El Niño की वजह से अमेरिका में आया तूफान

अल नीनो प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह के तापमान में सामान्य से अधिक बढ़ोतरी और उससे जुड़े वायुमंडलीय बदलावों की स्थिति है। इसका असर दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बारिश, तापमान और तूफानों की गतिविधियों पर पड़ सकता है।

अमेरिकी मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, अल नीनो आमतौर पर अटलांटिक क्षेत्र में तूफानों के बनने और मजबूत होने की परिस्थितियों को कमजोर करता है। इसकी वजह वायुमंडल में तेज हवाओं के अंतर यानी विंड शीयर में होने वाला बदलाव है, जो तूफानों के विकास में बाधा बन सकता है।

भारत पर क्या पड़ सकता है असर?

भारत में अल नीनो का असर खासतौर पर मानसून और तापमान के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जाता है। अल नीनो की स्थिति में भारतीय मानसून कमजोर पड़ने की संभावना बढ़ सकती है, लेकिन हर बार ऐसा हो, यह जरूरी नहीं है। हिंद महासागर की स्थिति, अन्य मौसमी प्रणालियां और क्षेत्रीय परिस्थितियां भी बारिश को प्रभावित करती हैं। अगर अल नीनो मजबूत बना रहता है, तो भारत में आने वाले महीनों के दौरान तापमान, बारिश और जल उपलब्धता पर इसके संभावित प्रभावों की निगरानी जरूरी होगी।