नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 में क्या मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हैट्रिक लगाएंगे या समाजवादी पार्टी को विजय मिलेगी? विधान परिषद की 11 सीटों के चुनाव परिणाम ने यह बता दिया कि राज्य की राजनीति किस दिशा में जा रही है। यह सही है कि इस बार यूपी विधानसभा चुनाव -2027 में दलित औऱ मुस्लिम समाज के मतदाता बड़ी भूमिका निभाने जा रहे हैं। यूपी ही नहीं देश भर में मुसलमान बीजेपी के पक्ष में मतदान नहीं करता है। लेकिन यह बात दलितों पर लागू नहीं होती। इस बार प्रदेश की राजनीति में दलित मतदाता सबसे अहम भूमिका निभाने जा रहा है। कभी मायावती की BSP का मजबूत आधार रहा दलित समाज अब BJP, समाजवादी पार्टी और आजाद समाज पार्टी के बीच बंटता नजर आ रहा है। 2027 के विधानसभा चुनाव में गैर-जाटव दलित निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।

विधानसभा चुनाव में किसके साथ जाएंगे दलित मतदाता?

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियां शुरू होने के साथ ही राजनीतिक दलों ने दलित वोट बैंक पर अपनी नजरें जमा दी हैं। राज्य की आबादी में अनुसूचित जाति (SC) समुदाय की हिस्सेदारी करीब 21 फीसदी है। यानी हर पांच में से एक मतदाता दलित समुदाय से आता है। ऐसे में यह वोट बैंक सत्ता की तस्वीर बदलने की ताकत रखता है।

एक समय था जब उत्तर प्रदेश में दलित राजनीति का मतलब बहुजन समाज पार्टी (BSP) और मायावती हुआ करता था। लेकिन पिछले कुछ चुनावों में समीकरण तेजी से बदले हैं। अब भारतीय जनता पार्टी (BJP), समाजवादी पार्टी (SP)-कांग्रेस गठबंधन और चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी (ASP) दलित मतदाताओं को अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रही हैं।

148 विधानसभा सीटों पर दलित वोट का बड़ा प्रभाव

उत्तर प्रदेश में दलित आबादी की रिहाइश सभी जिलों और विधानसभा क्षेत्रों में एक जैसा नहीं है। कौशांबी, सीतापुर, हरदोई, रायबरेली और उन्नाव जैसे जिलों में अनुसूचित जाति की आबादी 30 फीसदी से अधिक है। वहीं शामली, बागपत, मुरादाबाद, बरेली और बलरामपुर में यह आंकड़ा करीब 11 से 13 फीसदी के बीच है।

राज्य की आठ विधानसभा सीटों पर दलित आबादी 40 फीसदी से अधिक है, जबकि 144 सीटों पर यह हिस्सेदारी 10 फीसदी से कम है। सबसे महत्वपूर्ण वे 122 सीटें हैं, जहां दलित आबादी 20 से 30 फीसदी के बीच है।

कुल 403 विधानसभा सीटों में से 148 सीटें ऐसी हैं, जहां दलित आबादी का अनुपात राज्य के औसत से अधिक है। इन सीटों पर दलित मतदाताओं का रुख चुनाव परिणामों को सीधे प्रभावित कर सकता है।

जाटव और गैर-जाटव: दलित वोट बैंक के दो बड़े हिस्से

दलित समुदाय को एक ही राजनीतिक समूह मानना सही नहीं होगा। उत्तर प्रदेश में जाटव और गैर-जाटव अनुसूचित जातियों के बीच राजनीतिक पसंद में बड़ा अंतर रहा है। जाटव समुदाय करीब 12 फीसदी मतदाताओं का प्रतिनिधित्व करता है और लंबे समय तक BSP का सबसे मजबूत आधार रहा है।

दूसरी ओर, गैर-जाटव अनुसूचित जातियों की हिस्सेदारी करीब 9 फीसदी है। इस वर्ग में वाल्मीकि, पासी और अन्य समुदाय शामिल हैं। BSP को जाटवों का लंबे समय तक 60 से 87 फीसदी तक समर्थन मिलता रहा। इसके मुकाबले गैर-जाटव समुदाय में पार्टी का समर्थन अपेक्षाकृत कम और बंटा हुआ था।

गैर-जाटव दलितों ने सबसे पहले बदला राजनीतिक रुख

BJP की उत्तर प्रदेश में बड़ी चुनावी सफलता के पीछे गैर-जाटव दलितों का समर्थन महत्वपूर्ण रहा है। आंकड़ों के मुताबिक, गैर-जाटव दलितों में BJP का समर्थन 2012 के मुकाबले 2017 में 7 फीसदी से बढ़कर 33 फीसदी पहुंच गया। 2022 के विधानसभा चुनाव में यह बढ़कर 40 फीसदी हो गया।

इस बदलाव ने BJP को सवर्णों, गैर-यादव पिछड़ी जातियों और गैर-जाटव दलितों का व्यापक सामाजिक गठबंधन बनाने में मदद की। दूसरी तरफ, गैर-जाटव समुदाय में BSP का समर्थन लगातार घटा। 2022 में यह 27 फीसदी और 2024 के लोकसभा चुनाव में महज 15 फीसदी रह गया।

2024 के लोकसभा चुनाव में बदला दलित वोट का गणित

2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की दलित राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिला। गैर-जाटव दलितों का समर्थन BJP से खिसककर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के INDIA गठबंधन की तरफ चला गया।

गैर-जाटव दलितों में SP का समर्थन 2022 के 23 फीसदी से बढ़कर 2024 में 56 फीसदी हो गया। वहीं BJP का समर्थन 40 फीसदी से घटकर 29 फीसदी रह गया। इस बदलाव के पीछे संविधान और आरक्षण को लेकर विपक्ष का प्रचार भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा रहा।

जाटव समुदाय में भी बदलाव दिखाई दिया। SP का समर्थन 9 फीसदी से बढ़कर 25 फीसदी हो गया। यह आंकड़ा BJP के बराबर पहुंच गया। यानी पहली बार जाटव समुदाय में SP ने BJP को कड़ी चुनौती दी। BSP से दूर हुए गैर-जाटव मतदाताओं का बड़ा हिस्सा SP के साथ गया, जबकि जाटव मतदाताओं का समर्थन SP और BJP के बीच बंटा।

दलित बहुल 148 सीटों पर कैसे बदला चुनावी समीकरण?

दलित आबादी वाली 148 विधानसभा सीटों के चुनावी नतीजे राजनीतिक बदलाव की कहानी बयां करते हैं।

2012: समाजवादी पार्टी ने 91 सीटें जीतीं। BSP को 34 और BJP को सिर्फ 8 सीटें मिलीं।
2017: BJP ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 118 सीटों पर जीत दर्ज की। SP को सिर्फ 14 सीटें मिलीं।
2022: BJP ने 93 सीटों पर कब्जा बनाए रखा, जबकि SP ने वापसी करते हुए 43 सीटें जीतीं। BSP को इन सीटों पर एक भी जीत नहीं मिली।
2024: लोकसभा चुनाव के विधानसभा क्षेत्रवार रुझानों में SP करीब 94 सीटों पर आगे रहा, जबकि BJP लगभग 44 सीटों पर बढ़त बना सका।

इन आंकड़ों से साफ है कि दलित बहुल सीटों पर BSP का पारंपरिक प्रभाव कमजोर हुआ है और उसका राजनीतिक लाभ मुख्य रूप से SP को मिलता दिखाई दिया है।

मायावती के कमजोर होते प्रभाव के बीच चंद्रशेखर आजाद की चुनौती

BSP की गिरती लोकप्रियता ने मायावती के सामने नेतृत्व और राजनीतिक विश्वसनीयता की चुनौती खड़ी कर दी है। पार्टी के कमजोर प्रदर्शन के साथ ही मायावती की सक्रियता को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं।

इसके अलावा BSP पर BJP की मदद करने और विपक्षी वोटों को बांटने के आरोप भी लगते रहे हैं। इस राजनीतिक धारणा ने पार्टी के लिए नई मुश्किलें पैदा की हैं।

इसी खाली जगह को भरने की कोशिश चंद्रशेखर आजाद कर रहे हैं। आजाद समाज पार्टी के प्रमुख चंद्रशेखर आजाद ने 2024 के लोकसभा चुनाव में नगीना सीट से जीत हासिल कर अपनी राजनीतिक ताकत दिखाई।

खासकर दलित युवाओं के बीच उनकी लोकप्रियता बढ़ी है। हालांकि, अभी उनकी पार्टी का प्रभाव BSP, BJP या SP के मुकाबले सीमित है।

आकाश आनंद के सहारे BSP की वापसी की कोशिश

मायावती के भतीजे आकाश आनंद को BSP एक नए चेहरे और युवा नेतृत्व के रूप में आगे बढ़ा रही है। 10 सितंबर को पार्टी से निष्कासित किए जाने के महज 25 दिन बाद 5 अक्टूबर को उन्हें दोबारा राष्ट्रीय समन्वयक की जिम्मेदारी सौंपी गई।

28 अक्टूबर को बुलंदशहर में बहाली के बाद अपनी पहली सार्वजनिक रैली में आकाश आनंद ने मायावती के प्रति अपनी निष्ठा जताई और पार्टी कार्यकर्ताओं से 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुटने की अपील की। BSP की कोशिश है कि आकाश आनंद के जरिए दलित युवाओं को फिर से पार्टी से जोड़ा जाए और जाटव वोट बैंक पर पकड़ मजबूत की जाए।

दलित वोट हासिल करने के लिए BJP और SP की रणनीति

समाजवादी पार्टी की रणनीति: SP दलित समुदाय को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने की कोशिश कर रही है। पार्टी सामान्य यानी अनारक्षित सीटों पर भी अनुसूचित जाति के उम्मीदवार उतारने की रणनीति पर काम कर रही है। 2024 में फैजाबाद (अयोध्या) लोकसभा सीट पर दलित उम्मीदवार की जीत को पार्टी इस रणनीति की सफलता के उदाहरण के रूप में देखती है।

इसके अलावा समाजवादी छात्र सभा के छात्र कार्यकर्ताओं की ड्रेस में नीले रंग को शामिल करने की चर्चा भी है। नीला रंग दलित पहचान और आंबेडकरवादी राजनीति से जुड़ा माना जाता है।

BJP के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने पुराने गैर-जाटव दलित वोट बैंक को वापस हासिल करने की है। पार्टी सरकारी कल्याणकारी योजनाओं के जरिए गैर-जाटव समुदाय का समर्थन बनाए रखना चाहती है। वहीं जाटव समुदाय में राजनीतिक प्रतिनिधित्व बढ़ाकर अपनी पहुंच मजबूत करने की कोशिश कर सकती है।

BSP अपनी पारंपरिक जाटव समर्थक आबादी को बचाने के साथ गैर-जाटव दलितों में भी दोबारा जनाधार तैयार करना चाहती है। आकाश आनंद को आगे बढ़ाना इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।

2027 में किसे होगा BSP की गिरावट का सबसे ज्यादा फायदा?

पिछले चुनावों के आंकड़े बताते हैं कि BSP की गिरावट का फायदा अब तक BJP के मुकाबले समाजवादी पार्टी को ज्यादा मिला है। 2022 और 2024 के चुनावों में BSP से दूर हुए मतदाताओं का बड़ा हिस्सा SP के साथ गया। अगर 2027 में भी जाटव समुदाय का एक हिस्सा SP की तरफ जाता है और गैर-जाटव दलितों का समर्थन बरकरार रहता है, तो BJP की चुनावी मुश्किलें बढ़ सकती हैं।

हालांकि BJP के लिए वापसी का रास्ता भी खुला है। अगर पार्टी गैर-जाटव दलितों के बीच अपना पुराना समर्थन दोबारा हासिल करने में सफल होती है, तो मुकाबला काफी दिलचस्प हो सकता है।

यूपी की सत्ता का रास्ता दलित वोट से होकर गुजरेगा

उत्तर प्रदेश में दलित राजनीति अब BSP के एकाधिकार से निकलकर बहुकोणीय मुकाबले में बदल चुकी है। गैर-जाटव दलित फिलहाल सबसे बड़ा स्विंग वोट बैंक बनकर उभरे हैं, जबकि जाटव समुदाय का समर्थन हासिल करना सभी दलों के लिए बड़ी चुनौती है।

2027 के विधानसभा चुनाव में असली मुकाबला इस बात पर होगा कि SP 2024 में मिले दलित समर्थन को कितना बचा पाती है, BJP अपने पुराने सामाजिक समीकरण को कितना मजबूत करती है और मायावती की BSP अपने पारंपरिक वोट बैंक को वापस पाने में कितनी सफल होती है।

एक बात साफ है-उत्तर प्रदेश की सत्ता का रास्ता इस बार भी दलित वोटों के समीकरण से होकर गुजर सकता है।

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