Lolark Chhath 2026: काशी को सिर्फ मंदिरों और घाटों की नगरी नहीं, बल्कि अनगिनत धार्मिक परंपराओं की धरती भी माना जाता है। इन्हीं परंपराओं में से एक है लोलार्क छठ, जो हर साल भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाई जाती है। इस दिन वाराणसी के प्राचीन लोलार्क कुंड में स्नान और सूर्यदेव की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है।
संतान सुख की कामना लेकर देश के अलग-अलग हिस्सों से दंपती लोलार्क कुंड पहुंचते हैं। स्थानीय धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यहां विधि-विधान से स्नान और पूजा करने से संतान सुख की मनोकामना पूरी होती है। इस परंपरा में स्नान के बाद पुराने कपड़े छोड़ना भी एक खास नियम माना जाता है।
पति-पत्नी हाथ पकड़कर लगाते हैं 7 डुबकी
लोलार्क कुंड में स्नान को लेकर कई पारंपरिक नियम बताए जाते हैं। मान्यता के अनुसार, संतान की इच्छा रखने वाले पति-पत्नी को कुंड में स्नान करते समय एक-दूसरे का हाथ पकड़कर रखना चाहिए।कुंड में उतरने से पहले महिला अपने आंचल में एक फल और सुहाग से जुड़ी श्रृंगार सामग्री रखती हैं। कुंड में प्रवेश करने के बाद सूर्यदेव का ध्यान करते हुए इन वस्तुओं को जल में अर्पित करने की परंपरा है।इसके बाद पति-पत्नी एक साथ कुंड में सात बार डुबकी लगाते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दौरान सूर्यदेव का ध्यान और संतान सुख की कामना की जाती है।
स्नान के बाद पुराने कपड़े क्यों छोड़ते हैं?
लोलार्क कुंड की सबसे अलग परंपराओं में से एक स्नान के बाद पुराने कपड़ों को छोड़ना है। मान्यता के अनुसार, सात डुबकी लगाने के बाद दंपती अपने पुराने वस्त्र कुंड के तट पर छोड़ देते हैं और उन्हें वापस घर नहीं ले जाते।इसके बाद नए और स्वच्छ कपड़े पहनने की परंपरा है। धार्मिक मान्यता में पुराने वस्त्रों को छोड़ना पुराने दोषों और नकारात्मकता को पीछे छोड़ने के प्रतीक के तौर पर देखा जाता है।हालांकि, यह एक स्थानीय धार्मिक परंपरा है और इसके पीछे अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग मान्यताएं बताई जाती हैं।
लोलार्केश्वर महादेव के दर्शन जरूरी माने जाते हैं
लोलार्क कुंड में स्नान के बाद लोलार्केश्वर महादेव के दर्शन और पूजा को भी इस परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।मान्यता है कि स्नान के बाद भगवान शिव के लोलार्केश्वर स्वरूप का आशीर्वाद लेना चाहिए। श्रद्धालु सूर्यदेव और भगवान शिव से परिवार की सुख-शांति और संतान सुख की कामना करते हैं।स्थानीय धार्मिक परंपरा में केवल कुंड में स्नान करने के बजाय उसके बाद लोलार्केश्वर महादेव के दर्शन को भी पूजा का हिस्सा माना जाता है।
जिस फल का दान किया, उसे लेकर है खास मान्यता
लोलार्क कुंड की परंपरा में फल अर्पित करने से जुड़ी एक विशेष मान्यता भी बताई जाती है।कहा जाता है कि दंपती जिस फल को कुंड में अर्पित करते हैं, मनोकामना पूरी होने तक उन्हें उस फल का सेवन नहीं करना चाहिए। उदाहरण के तौर पर अगर किसी दंपती ने केला या सेब अर्पित किया है, तो मान्यता के अनुसार मन्नत पूरी होने तक उस फल को खाने से बचना चाहिए।यह नियम भी धार्मिक आस्था और स्थानीय परंपरा का हिस्सा है। इसे वैज्ञानिक नियम या प्रमाणित तथ्य के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
संतान होने के बाद दोबारा लोलार्क कुंड आने की परंपरा
लोलार्क छठ से जुड़ी मान्यता केवल मनोकामना मांगने तक सीमित नहीं है। कहा जाता है कि जब दंपती की संतान संबंधी मनोकामना पूरी हो जाए, तो उन्हें बच्चे के साथ दोबारा काशी आकर लोलार्क कुंड में हाजिरी लगानी चाहिए।इस दौरान भगवान सूर्य और लोलार्केश्वर महादेव को हलवा-पूरी का भोग लगाने की परंपरा बताई जाती है। धार्मिक विश्वास के अनुसार, ऐसा करने से संतान के स्वस्थ और दीर्घ जीवन की कामना पूरी होती है।यह भी ध्यान रखना चाहिए कि संतान की आयु या स्वास्थ्य को लेकर ऐसी बातें धार्मिक मान्यताओं पर आधारित हैं, इनका कोई चिकित्सकीय प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए।
17 सितंबर को मनाया जाएगा लोलार्क छठ
इस वर्ष लोलार्क छठ का पर्व 17 सितंबर 2026 को मनाया जाएगा। दिए गए विवरण के अनुसार, 17 सितंबर की रात करीब 2 बजे से लोलार्क कुंड में श्रद्धालुओं के स्नान का सिलसिला शुरू होने की बात कही गई है, जो पूरे दिन जारी रहेगा।पर्व के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के काशी पहुंचने की संभावना को देखते हुए प्रशासन की ओर से भी तैयारियां की गई हैं। जानकारी के अनुसार, करीब 2 किलोमीटर लंबी बैरिकेडिंग कराई गई है। श्रद्धालुओं की सुरक्षा और व्यवस्था के लिए पुलिस बल और अधिकारी भी तैनात रहेंगे।
लोलार्क छठ क्यों है खास?
लोलार्क छठ काशी की उन धार्मिक परंपराओं में शामिल है, जिसमें सूर्य उपासना, भगवान शिव की पूजा और संतान सुख की कामना एक साथ जुड़ी हुई है। देश के अलग-अलग हिस्सों से दंपती इस पर्व पर लोलार्क कुंड पहुंचते हैं और अपनी मनोकामना के लिए पूजा-पाठ करते हैं।पुराने वस्त्र छोड़ना, सात डुबकी लगाना, फल अर्पित करना और लोलार्केश्वर महादेव के दर्शन करना इस परंपरा के प्रमुख हिस्से माने जाते हैं।