भारत में चावल कई तरह के होते हैं, जिनका स्वाद, आकार और पकाने का तरीका अलग-अलग होता है। बासमती, सोना मसूरी, अरवा और ब्राउन राइस जैसी वैरायटी से तो ज्यादातर लोग परिचित हैं, लेकिन क्या आपने कभी ऐसे चावल के बारे में सुना है जिसे पकाने के लिए आग की जरूरत ही नहीं पड़ती? असम की एक पारंपरिक चावल की किस्म ऐसी ही अनोखी खूबी के लिए जानी जाती है। इसे केवल पानी में भिगोकर खाने योग्य बनाया जा सकता है।
पानी में भिगोते ही नरम हो जाता है ये खास चावल
असम में इसे बोका शाऊल, कोमल चावल और एगोनिबोरा जैसे नामों से जाना जाता है। इसकी सबसे खास बात इसकी बनावट है। इसमें एमिलोज की मात्रा सामान्य चावल की तुलना में काफी कम होती है। इसी कारण पानी के संपर्क में आने पर इसके दाने फूलने लगते हैं और धीरे-धीरे नरम हो जाते हैं।
ठंडे पानी में एक घंटे तक
इस चावल को तैयार करना बेहद आसान है। पहले इसे अच्छी तरह साफ करके धोया जाता है और फिर पानी में भिगो दिया जाता है। गर्म पानी का इस्तेमाल करने पर यह करीब 15 से 20 मिनट में नरम हो सकता है। वहीं ठंडे पानी में इसे तैयार होने में लगभग 30 से 60 मिनट लग सकते हैं। इसके बाद अतिरिक्त पानी निकालकर इसे दाल, सब्जी या दूसरे व्यंजनों के साथ खाया जा सकता है।
मीठे पकवानों में भी होता है इस्तेमाल
कुछ जगहों पर इसका इस्तेमाल मीठे पकवान बनाने में भी किया जाता है। हालांकि इसका स्वाद और बनावट सामान्य तरीके से पकाए गए चावल से अलग होती है।
अहोम सैनिकों से जुड़ी है इसकी कहानी
इस चावल का संबंध असम के पुराने इतिहास से भी बताया जाता है। मान्यता है कि अहोम साम्राज्य के सैनिक अपने अभियानों के दौरान इसे साथ लेकर चलते थे। दुर्गम इलाकों या जंगलों में खाना तैयार करने के लिए आग जलाना हमेशा आसान नहीं होता था। ऐसे में इस चावल को पानी में भिगोकर आसानी से खाया जा सकता था।
असम से निकलकर अब दूसरे राज्यों में भी पहुंची इसकी खेती
आज भी असम के कई हिस्सों में इसकी खेती की जाती है। पश्चिमी असम और माजुली के आसपास के इलाकों में यह खास तौर पर लोकप्रिय है। अब इसकी खेती असम की सीमाओं से बाहर भी पहुंच रही है। बिहार, केरल, तेलंगाना और उत्तर प्रदेश के कुछ किसानों ने भी इसकी खेती का प्रयोग किया है।
ईंधन की बचत इसकी बड़ी खासियत
बिना आग के तैयार होने की वजह से यह चावल उन परिस्थितियों में बेहद उपयोगी साबित हो सकता है, जहां गैस, बिजली या लकड़ी आसानी से उपलब्ध न हो। ग्रामीण क्षेत्रों के अलावा बाढ़, भूकंप या अन्य आपदा की स्थिति में भी इसे आसानी से इस्तेमाल किया जा सकता है। खाना पकाने में ईंधन की जरूरत नहीं पड़ने से ऊर्जा की बचत होती है और पर्यावरण पर भी इसका सकारात्मक असर पड़ सकता है।
फाइबर और प्रोटीन से भरपूर
पोषण की बात करें तो इसमें फाइबर और प्रोटीन मौजूद होते हैं। इसकी पोषण संरचना सामान्य चावल से अलग मानी जाती है। हालांकि स्वास्थ्य से जुड़े किसी भी दावे को वैज्ञानिक पोषण आंकड़ों के आधार पर ही समझना चाहिए।
100 से 150 दिन में होती है खेती
इसकी खेती में क्षेत्र और परिस्थितियों के अनुसार करीब 100 से 150 दिन लग सकते हैं। बढ़ती मांग की वजह से किसानों की इसमें दिलचस्पी भी बढ़ रही है।
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सीधे नहीं आ सकते ये चावल
ध्यान देने वाली बात यह है कि इसे कच्चे चावल की तरह सीधे नहीं खाया जाता। पानी में भिगोने के बाद इसके दाने नरम होकर खाने योग्य बनते हैं। सामान्य उबले चावल जैसा टेक्सचर भले न मिले, लेकिन बिना गैस या चूल्हे के तैयार होने की इसकी खासियत इसे बेहद अनोखी चावल की किस्म बनाती है।