भारत में मुद्रा मुख्य रूप से दो रूपों में इस्तेमाल होती है। कागजी नोट और धातु के सिक्के। दोनों की अपनी अलग उपयोगिता है। जहां नोट बड़े मूल्य के लेन-देन को आसान बनाते हैं, वहीं सिक्के छोटी खरीदारी, रोजमर्रा के भुगतान और वेंडिंग मशीन जैसी जगहों पर बेहद उपयोगी साबित होते हैं, लेकिन अगर आपने पुराने और नए भारतीय सिक्कों की तुलना की हो, तो एक बदलाव आसानी से नजर आता है। समय के साथ कई सिक्कों का आकार और वजन कम हुआ है। कुछ दशक पहले एक रुपये, 50 पैसे और दो रुपये के सिक्के आज की तुलना में काफी बड़े और भारी हुआ करते थे। इनमें तांबा, निकेल, पीतल जैसी धातुओं या उनकी मिश्रधातुओं का इस्तेमाल होता था। वहीं आज के कई सिक्के अपेक्षाकृत हल्के और कॉम्पैक्ट हैं। इसके पीछे केवल डिजाइन बदलने की वजह नहीं है, बल्कि आर्थिक लागत, धातुओं की कीमत, इस्तेमाल में सुविधा और उत्पादन से जुड़ी कई व्यावहारिक जरूरतें हैं।

धातुओं की बढ़ती कीमत बनी बड़ी वजह

सिक्के बनाने में स्टील, निकेल, तांबा, जिंक और दूसरी धातुओं का इस्तेमाल किया जाता है। इन कच्चे माल की कीमतों में समय के साथ काफी उतार-चढ़ाव आया है। अगर किसी सिक्के का वजन बहुत ज्यादा रखा जाए, तो उसे बनाने में इस्तेमाल होने वाली धातु की कीमत उसके अंकित मूल्य के करीब या उससे भी ज्यादा पहुंच सकती है। ऐसी स्थिति मुद्रा व्यवस्था के लिए नुकसानदायक हो सकती है। अगर किसी सिक्के में मौजूद धातु की बाजार कीमत उसके फेस वैल्यू से ज्यादा हो जाए, तो उसे पिघलाकर धातु के रूप में बेचने की संभावना बढ़ जाती है। इसलिए सिक्कों को इस तरह डिजाइन किया जाता है कि उनकी उत्पादन लागत नियंत्रित रहे और उनमें इस्तेमाल होने वाली धातु की मात्रा भी जरूरत से ज्यादा न हो।

महंगाई के साथ बदली सिक्कों की जरूरत

महंगाई ने भी सिक्कों के स्वरूप को प्रभावित किया है। समय बीतने के साथ वस्तुओं और सेवाओं की कीमतें बढ़ती हैं, जिससे छोटी रकम के बजाय अपेक्षाकृत बड़े मूल्य वाले सिक्कों की जरूरत बढ़ जाती है। जहां पहले एक और दो रुपये के सिक्के रोजमर्रा के लेन-देन में ज्यादा दिखाई देते थे, वहीं अब 10 और 20 रुपये के सिक्के भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अगर इन ज्यादा मूल्य वाले सिक्कों को पुराने दौर की तरह भारी और बड़े आकार में बनाया जाए, तो धातु की खपत और उत्पादन खर्च दोनों बढ़ जाएंगे। इसलिए कम वजन और छोटे आकार का डिजाइन आर्थिक रूप से ज्यादा व्यावहारिक माना जाता है।

इस्तेमाल में आसानी भी अहम

सिक्के केवल सस्ते बनाना ही जरूरी नहीं है, उनका इस्तेमाल भी सुविधाजनक होना चाहिए। बहुत भारी या बड़े सिक्कों को जेब या पर्स में रखना मुश्किल हो सकता है। छोटे और हल्के सिक्के बड़ी संख्या में साथ ले जाना अपेक्षाकृत आसान होता है। इसके अलावा वेंडिंग मशीन, पार्किंग मीटर, टोल सिस्टम और दूसरी स्वचालित भुगतान मशीनों में भी सिक्कों के आकार, वजन और अन्य मानकों में एकरूपता महत्वपूर्ण होती है। एक सुव्यवस्थित डिजाइन इन मशीनों में सिक्कों की पहचान और इस्तेमाल को आसान बनाने में मदद करता है।

उत्पादन और परिवहन में भी बचत

सिक्कों का निर्माण बड़े पैमाने पर होता है। इसलिए उनके आकार और वजन में थोड़ी कमी भी कुल उत्पादन लागत पर बड़ा असर डाल सकती है। हल्के सिक्कों को स्टोर करने, पैक करने और एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने में भी कम संसाधनों की जरूरत पड़ती है। इस तरह सिक्कों का छोटा और हल्का होना किसी एक कारण का नतीजा नहीं है। धातुओं की कीमत, उत्पादन लागत, महंगाई, लोगों की सुविधा, मशीनों के साथ अनुकूलता और परिवहन जैसे कई पहलुओं को ध्यान में रखकर सिक्कों का स्वरूप तय किया जाता है। इसलिए पुराने भारी-भरकम सिक्कों से आज के हल्के सिक्कों तक का सफर दरअसल बदलती आर्थिक और तकनीकी जरूरतों के अनुरूप मुद्रा व्यवस्था के विकास की कहानी है।

 


ये भी पढ़ें- घंटों पुरानी चाय दोबारा गर्म करके पीना पड़ सकता है भारी, जानें क्या है सेहत का खतरा

 

Written By Toshi Shah