आज की दुनिया में इंसान की पहचान सिर्फ उसके घर, बैंक बैलेंस या जमीन-जायदाद तक सीमित नहीं रह गई है। हमारी जिंदगी का बड़ा हिस्सा अब डिजिटल दुनिया में बसता है। मोबाइल फोन, क्लाउड अकाउंट, सोशल मीडिया प्रोफाइल, फोटो, वीडियो, ईमेल और निजी दस्तावेज अब हमारी “डिजिटल विरासत” बन चुके हैं। ऐसे में यह सवाल बेहद अहम हो जाता है कि किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसके ऑनलाइन डेटा और डिजिटल अकाउंट्स का क्या होगा। हाल ही में गुजरात की एक अदालत ने इसी मुद्दे पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है, जिसने भारत में डिजिटल विरासत को लेकर नई कानूनी बहस शुरू कर दी है।
कैसे सामने आया मामला
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह मामला गुजरात के गांधीनगर की एक सिविल कोर्ट में पहुंचा। एक परिवार अपने दिवंगत सदस्य के लॉक्ड iPhone और iCloud अकाउंट तक पहुंच हासिल करना चाहता था। उस अकाउंट में परिवार की कई अनमोल यादें सुरक्षित थीं, जिनमें तस्वीरें, वीडियो, वॉइस नोट्स, जरूरी दस्तावेज और निजी संपर्क शामिल थे। परिवार का कहना था कि ये डेटा केवल भावनात्मक रूप से ही नहीं, बल्कि व्यावहारिक तौर पर भी बेहद महत्वपूर्ण है। सबसे पहले परिवार ने सीधे Apple से संपर्क किया, लेकिन कंपनी ने स्पष्ट किया कि अकाउंट रिकवरी केवल उसके Digital Legacy सिस्टम के तहत ही संभव है। इसके लिए अदालत का आधिकारिक आदेश और किसी कानूनी प्रतिनिधि की नियुक्ति जरूरी होगी। इसके बाद मृतक की पत्नी और बेटी ने Indian Succession Act, 1925 के तहत अदालत में याचिका दाखिल की। चूंकि मृतक ने कोई वसीयत नहीं छोड़ी थी, इसलिए परिवार ने डिजिटल संपत्ति के प्रशासनिक अधिकार मांगे।
अदालत ने बेटी को सौंपा अधिकार
मामले की सुनवाई के बाद जज हिमांशु चौधरी ने मृतक की बेटी को कानूनी प्रशासक नियुक्त किया। अदालत ने Apple को निर्देश दिया कि तकनीकी रूप से जितना संभव हो सके, परिवार को डेटा रिकवर करने में सहायता दी जाए। यह फैसला इसलिए खास माना जा रहा है क्योंकि अदालत ने पहली बार डिजिटल डेटा को व्यक्ति की कानूनी संपत्ति का हिस्सा माना।
डिजिटल डेटा भी माना गया संपत्ति
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि डिजिटल डेटा भी संपत्ति की श्रेणी में आ सकता है। परिवार की ओर से दलील दी गई थी कि भारतीय कानूनों में “चल संपत्ति” की परिभाषा काफी व्यापक है और इसमें डिजिटल एसेट्स को भी शामिल किया जा सकता है, भले ही भारत में अभी डिजिटल विरासत को लेकर कोई अलग कानून मौजूद न हो। कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए कहा कि iCloud अकाउंट में मौजूद डेटा मृतक की मूल्यवान डिजिटल संपत्ति है और इसे उसकी कानूनी विरासत का हिस्सा माना जाएगा।
अदालत ने कई भारतीय कानूनों का दिया हवाला
अपने फैसले में अदालत ने कई भारतीय कानूनों का हवाला दिया, जिनमें General Clauses Act, Bharatiya Nyaya Sanhita (BNS) और Prevention of Money Laundering Act शामिल हैं। इन सभी में संपत्ति की परिभाषा को व्यापक रूप में देखा गया है। अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि क्रिप्टोकरेंसी और NFTs जैसे डिजिटल एसेट्स को आयकर कानून के तहत Virtual Digital Assets के रूप में मान्यता मिल चुकी है। इससे संकेत मिलता है कि आने वाले समय में डिजिटल संपत्तियों का कानूनी महत्व और बढ़ सकता है।
प्राइवेसी पर भी उठे सवाल
इस मामले में निजता यानी प्राइवेसी का मुद्दा भी प्रमुख रूप से सामने आया। डिजिटल अकाउंट्स में अक्सर निजी बातचीत, व्यक्तिगत तस्वीरें और संवेदनशील जानकारियां होती हैं, जिन्हें व्यक्ति शायद दूसरों के साथ साझा नहीं करना चाहता। हालांकि अदालत ने कहा कि निजता का अधिकार व्यक्ति से जुड़ा व्यक्तिगत अधिकार है और उसकी मृत्यु के बाद समाप्त हो जाता है। कोर्ट ने “actio personalis moritur cum persona” सिद्धांत का हवाला देते हुए कहा कि केवल प्राइवेसी के आधार पर कानूनी वारिसों को डिजिटल संपत्ति तक पहुंच से वंचित नहीं किया जा सकता।
भारत में अभी कानून पूरी तरह स्पष्ट नहीं
भारत का Digital Personal Data Protection Act, 2023 लोगों को यह सुविधा देता है कि वे अपनी मृत्यु के बाद डेटा संभालने के लिए किसी व्यक्ति को नामित कर सकें। लेकिन यदि किसी व्यक्ति ने पहले से कोई नॉमिनी तय नहीं किया हो, तो ऐसी स्थिति में क्या प्रक्रिया अपनाई जाएगी, इस पर अभी स्पष्ट कानूनी ढांचा मौजूद नहीं है। गुजरात कोर्ट का यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यह भविष्य में डिजिटल विरासत से जुड़े मामलों के लिए एक मिसाल बन सकता है। आने वाले समय में यह बहस और तेज हो सकती है कि किसी व्यक्ति की ऑनलाइन पहचान, डिजिटल यादें और वर्चुअल संपत्तियों पर मृत्यु के बाद किसका अधिकार होगा।
Written By Toshi Shah