आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI आज पूरी दुनिया में तेजी से विकसित हो रहा है। इसकी मदद से कंपनियां ऐसे आधुनिक रोबोट तैयार कर रही हैं, जो इंसानों के कई कामों को आसान बना सकते हैं, लेकिन जैसे-जैसे ये मशीनें ज्यादा एडवांस होती जा रही हैं, वैसे-वैसे एक बड़ा सवाल भी सामने आ रहा है कि क्या रोबोट सिर्फ इंसानों की तरह बातचीत कर सकते हैं या वास्तव में उनकी भावनाओं को भी समझ सकते हैं। वैज्ञानिक अब इसी सवाल का जवाब खोजने में जुटे हैं कि भविष्य में रोबोट इंसानी भावनाओं को पहचानने और उनके अनुसार सही फैसले लेने में सक्षम हो पाएंगे या नहीं।

क्यों जरूरी है मानवीय भावनाओं को समझना

ChatGPT जैसे AI टूल्स ने साबित कर दिया है कि मशीनें इंसानों के साथ सामान्य तरीके से बातचीत कर सकती हैं और सवालों के जवाब दे सकती हैं। हालांकि, सही जवाब देना और किसी व्यक्ति की भावनात्मक स्थिति को समझना दोनों अलग-अलग चीजें हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर आने वाले समय में रोबोट घरों, अस्पतालों या अन्य संवेदनशील जगहों पर इंसानों के साथ काम करेंगे, तो उनमें मानवीय भावनाओं और परिस्थितियों को समझने की क्षमता होना बेहद जरूरी होगा। इससे रोबोट ऐसे फैसले लेने से बच सकेंगे, जिनसे किसी इंसान को नुकसान पहुंच सकता है।

रोबोट इंसानों को कैसे समझते हैं

AI सिस्टम को इंसानों के व्यवहार और प्रतिक्रियाओं के उदाहरणों से ट्रेन किया जाता है। मशीनों को अलग-अलग परिस्थितियां दिखाई जाती हैं और बताया जाता है कि ऐसी स्थिति में इंसान आमतौर पर किस तरह प्रतिक्रिया देते हैं। इसके अलावा AI सिस्टम में कुछ नियम और निर्देश भी जोड़े जाते हैं, जिससे वह सही और गलत के बीच अंतर कर सके। लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि इस प्रक्रिया में सहानुभूति यानी किसी की भावनाओं को गहराई से समझने की क्षमता की कमी रह जाती है।

रोबोट में सहानुभूति विकसित करने की नई कोशिश

इसी समस्या को हल करने के लिए वैज्ञानिक एक नए तरीके पर काम कर रहे हैं। कई विश्वविद्यालयों के शोधकर्ता रोबोट में ऐसी क्षमता विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे वे अपने काम के परिणामों को समझ सकें। शोधकर्ताओं के अनुसार, रोबोट को यह सिखाने की जरूरत है कि उसके फैसलों का सकारात्मक या नकारात्मक असर हो सकता है। इसके लिए मशीनों में ऐसे अनुभव और परिस्थितियां तैयार की जाती हैं, जिनसे वे सीख सकें कि किसी गलत कदम से नुकसान हो सकता है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि रोबोट को असली दर्द महसूस कराया जाएगा। बल्कि उनके सिस्टम में ऐसे अनुभव डाले जाते हैं, जिनसे वे बेहतर निर्णय लेना सीख सकें।

सिर्फ इंसानों की नकल करना काफी नहीं

अगर किसी रोबोट को ऐसा वीडियो दिखाया जाए जिसमें कोई व्यक्ति गिरकर घायल हो जाता है, तो वह उस व्यक्ति के चेहरे के भाव और प्रतिक्रिया को पहचान सकता है। देखने में ऐसा लग सकता है कि रोबोट उस दर्द को समझ रहा है, लेकिन वास्तव में रोबोट ने दर्द महसूस नहीं किया होता। वह सिर्फ पहले से सीखे गए पैटर्न के आधार पर प्रतिक्रिया देता है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, इसे असली सहानुभूति नहीं कहा जा सकता।

क्या रोबोट सच में भावनाएं महसूस कर पाएंगे?

वैज्ञानिकों का कहना है कि इस शोध का उद्देश्य रोबोट को इंसानों की तरह भावनाएं देना नहीं है। इसका मकसद उन्हें इतना सक्षम बनाना है कि वे अपने फैसलों के प्रभाव को समझ सकें और गलत कदम उठाने से बच सकें। भविष्य के रोबोट को ज्यादा सुरक्षित और जिम्मेदार बनाने के लिए उनकी निर्णय लेने की क्षमता को बेहतर करना ही इस तकनीक का मुख्य लक्ष्य है। फिलहाल रोबोट इंसानों की तरह भावनाएं महसूस नहीं कर सकते, लेकिन AI के क्षेत्र में हो रही प्रगति से आने वाले समय में मशीनें इंसानी व्यवहार और भावनाओं को पहले से बेहतर तरीके से समझने में सक्षम हो सकती हैं।