लोकसभा के मानसून सत्र से पहले संसद में दो ऐसे राजनीतिक घटनाक्रम सामने आए हैं, जिन्होंने एक बार फिर दल-बदल कानून और लोकसभा अध्यक्ष की भूमिका पर बहस तेज कर दी है। एक ओर लोकसभा अध्यक्ष ने उद्धव ठाकरे गुट के 6 सांसदों के एकनाथ शिंदे की शिवसेना में विलय को मंजूरी दे दी, जबकि दूसरी ओर टीएमसी के 20 बागी सांसदों को सदन में अलग बैठने की अनुमति तो मिल गई, लेकिन उनके प्रस्तावित विलय पर अभी अंतिम फैसला नहीं हुआ है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या दोनों मामलों में कानून अलग है या परिस्थितियां? और क्या बागी सांसद अपनी मूल पार्टी की 'व्हिप' के खिलाफ मतदान कर सकते हैं?

शिवसेना और टीएमसी के मामलों में क्या है अंतर?

पहली नजर में दोनों मामलों में समानता दिखाई देती है, क्योंकि दोनों में सांसदों ने अपनी मूल पार्टी से अलग होकर दूसरी राजनीतिक पहचान का दावा किया है। हालांकि, संसदीय प्रक्रिया और कानूनी स्थिति के लिहाज से दोनों मामलों में महत्वपूर्ण अंतर है। शिवसेना (यूबीटी) के छह सांसदों ने दावा किया कि वे संविधान की दसवीं अनुसूची में दिए गए दो-तिहाई सदस्यों वाले प्रावधान को पूरा करते हैं।

इसी आधार पर उन्होंने एकनाथ शिंदे की शिवसेना में विलय की मांग की, जिसे लोकसभा अध्यक्ष ने स्वीकार कर लिया। इसके बाद लोकसभा में शिंदे गुट के सांसदों की संख्या बढ़कर 13 हो गई, जबकि उद्धव ठाकरे गुट के पास केवल तीन सांसद रह गए। दूसरी ओर, टीएमसी के 20 बागी सांसदों ने नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में विलय का दावा किया है। हालांकि, उन्हें सदन में अलग बैठने की अनुमति मिल चुकी है, लेकिन उनके विलय को अभी तक आधिकारिक मंजूरी नहीं मिली है। इसका मतलब है कि उनकी कानूनी स्थिति फिलहाल अधूरी मानी जाएगी।

स्पीकर की मंजूरी क्यों अहम है?

संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत दल-बदल से जुड़े मामलों में अंतिम फैसला लोकसभा अध्यक्ष के अधिकार क्षेत्र में आता है। स्पीकर यह तय करते हैं कि किसी सांसद या सांसदों के समूह का विलय कानूनी रूप से वैध है या नहीं।

शिवसेना के मामले में स्पीकर ने सांसदों के दावे को स्वीकार करते हुए संसदीय रिकॉर्ड में बदलाव कर दिया। वहीं टीएमसी के मामले में प्रक्रिया अभी जारी है। इसलिए दोनों मामलों का परिणाम अलग दिखाई दे रहा है। हालांकि, शिवसेना (यूबीटी) इस फैसले का विरोध कर रही है। पार्टी का कहना है कि केवल सांसदों का दूसरी पार्टी में जाना विलय नहीं माना जा सकता। उनके अनुसार, संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत पहले मूल राजनीतिक दल का विलय होना जरूरी है। इसी आधार पर यूबीटी ने स्पीकर के फैसले को चुनौती देने की बात कही है।

क्या पार्टी लाइन से अलग वोट दे सकते हैं सांसद?

यही इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। यदि किसी सांसद का विलय स्पीकर द्वारा आधिकारिक रूप से मान्य कर लिया जाता है, तो वह नई पार्टी का सदस्य माना जाता है और उसे उसी पार्टी के व्हिप का पालन करना होता है। लेकिन जिन सांसदों के विलय को अभी मंजूरी नहीं मिली है, उनकी स्थिति अलग होती है। ऐसे सांसद यदि अपनी मूल पार्टी की व्हिप के खिलाफ मतदान करते हैं या मतदान से अनुपस्थित रहते हैं, तो उनके खिलाफ दल-बदल कानून के तहत कार्रवाई की मांग की जा सकती है। ऐसी स्थिति में उनकी सदस्यता पर खतरा भी पैदा हो सकता है।

इसलिए टीएमसी के बागी सांसदों के लिए स्पीकर का अंतिम फैसला बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। जब तक आधिकारिक आदेश नहीं आता, तब तक उन पर मूल पार्टी की व्हिप लागू रहने की संभावना बनी रहेगी।

एंटी-डिफेक्शन कानून क्या कहता है?

संविधान की दसवीं अनुसूची, जिसे आम तौर पर एंटी-डिफेक्शन कानून कहा जाता है, 1985 में लागू की गई थी। इसका उद्देश्य निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा बार-बार दल बदलने की प्रवृत्ति पर रोक लगाना था।

इस कानून के अनुसार यदि कोई सांसद स्वेच्छा से अपनी पार्टी छोड़ देता है या पार्टी के व्हिप के खिलाफ मतदान करता है, तो उसे अयोग्य ठहराया जा सकता है। हालांकि, कानून में यह भी प्रावधान है कि यदि किसी विधायी दल के कम से कम दो-तिहाई सदस्य किसी अन्य दल में विलय का फैसला करते हैं और उस विलय को कानूनी मान्यता मिल जाती है, तो उन्हें दल-बदल के आधार पर अयोग्य नहीं ठहराया जाएगा।

आगे क्या होगा?

टीएमसी के बागी सांसदों का भविष्य अब पूरी तरह लोकसभा अध्यक्ष के अंतिम फैसले पर निर्भर करेगा। यदि उनके विलय को मंजूरी मिल जाती है, तो उनकी संसदीय पहचान बदल जाएगी और वे नई पार्टी के व्हिप के तहत काम करेंगे। लेकिन यदि मंजूरी नहीं मिलती, तो उन्हें मूल पार्टी के निर्देशों का पालन करना होगा और उल्लंघन की स्थिति में दल-बदल कानून के तहत कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है।

ऐसे में संसद के आगामी सत्र के दौरान होने वाली महत्वपूर्ण वोटिंग में इन सांसदों की भूमिका और स्पीकर का निर्णय दोनों ही राजनीतिक और कानूनी दृष्टि से बेहद अहम साबित हो सकते हैं। यह मामला केवल दो राजनीतिक दलों का विवाद नहीं, बल्कि संविधान की दसवीं अनुसूची की व्याख्या, स्पीकर के विवेकाधिकार और संसदीय लोकतंत्र की कार्यप्रणाली से जुड़ा एक महत्वपूर्ण परीक्षण भी बन गया है।

 

Written By: Geeta Sharma