New Delhi: अरावली पर्वतमाला के संरक्षण से जुड़े महत्वपूर्ण मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित उच्चाधिकार प्राप्त समिति की जन-परामर्श प्रक्रिया पर पर्यावरण समूह People for Aravallis ने गंभीर आपत्तियां दर्ज कराई हैं। संगठन ने 4 अगस्त 2026 को समिति को भेजे गए एक विस्तृत अभ्यावेदन में कहा है कि वर्तमान सार्वजनिक परामर्श प्रक्रिया न केवल सीमित और अपर्याप्त है। बल्कि यह सर्वोच्च न्यायालय के उस स्पष्ट निर्देश की भावना के भी विपरीत है। जिसमें सभी आवश्यक हितधारकों को शामिल करते हुए निष्पक्ष,स्वतंत्र और विशेषज्ञ राय प्राप्त करने पर बल दिया गया था।

पीपुल फॉर अरावलिस का बयान

यह समिति सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुओ मोटू रिट याचिका (सिविल) संख्या 10/2025 में 25 मई 2026 को पारित आदेश के तहत गठित की गई थी। समिति ने 21 जुलाई 2026 को एक प्रेस नोट जारी कर अरावली पर्वतमाला से जुड़े मुद्दों पर आम जनता से सुझाव आमंत्रित किए थे। हालांकि, पीपुल फॉर अरावलिस का कहना है कि इस प्रक्रिया में व्यापक जनभागीदारी सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कदम नहीं उठाए गए।

ग्रामीण समुदायों तक नहीं पहुंची सूचना

संगठन की ओर से अधिवक्ता कृति भाटिया ने कहा कि प्रेस नोट अरावली क्षेत्र के उन ग्रामीण समुदायों तक पहुंचाने में पूरी तरह विफल रहा है, जो पर्यावरणीय क्षरण और अवैध खनन से सबसे अधिक प्रभावित हैं। उन्होंने बताया कि दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात और उत्तर प्रदेश के कुल 64 अरावली जिलों में अधिकांश ग्राम पंचायतों, स्थानीय जनप्रतिनिधियों और सामुदायिक संगठनों को इस प्रक्रिया की जानकारी तक नहीं है।

उन्होंने कहा कि न तो सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट और न ही पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की वेबसाइट पर इस सूचना को प्रमुखता से प्रदर्शित किया गया। इसके अलावा ग्राम पंचायतों, तहसीलों, ब्लॉक विकास कार्यालयों, वन विभाग, पुलिस थानों, जैव विविधता प्रबंधन समितियों और सरकारी अस्पतालों के सूचना पटों पर भी कोई सूचना प्रदर्शित नहीं की गई। संगठन का कहना है कि यदि वास्तव में व्यापक जनभागीदारी सुनिश्चित करनी थी, तो रेडियो, सोशल मीडिया, व्हाट्सऐप और समाचार पत्रों जैसे माध्यमों का भी प्रभावी उपयोग किया जाना चाहिए था।

केवल ऑनलाइन सुझाव व्यवस्था पर जताई आपत्ति

राजस्थान के सीकर जिले के किसान एवं संगठन से जुड़े मामराज ने समिति की ऑनलाइन सुझाव प्रणाली पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि सुझाव भेजने के लिए केवल ई-मेल या गूगल फॉर्म का विकल्प उपलब्ध कराया गया है, जो ग्रामीण भारत की वास्तविक परिस्थितियों के अनुरूप नहीं है।

उनके अनुसार, अरावली क्षेत्र के अधिकांश किसान, पशुपालक और ग्रामीण न तो नियमित रूप से ई-मेल का उपयोग करते हैं और न ही उनके पास पर्याप्त डिजिटल संसाधन उपलब्ध हैं। इससे उन समुदायों की आवाज समिति तक नहीं पहुंच पाएगी, जिनकी आजीविका, स्वास्थ्य और पर्यावरण पर खनन तथा अन्य विकास परियोजनाओं का प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ रहा है। संगठन ने डाक के माध्यम से सुझाव स्वीकार करने, व्यक्तिगत सुनवाई आयोजित करने और मौखिक बयान दर्ज करने जैसी वैकल्पिक व्यवस्थाएं शुरू करने की मांग की है।

समय सीमा और सीमित दौरे पर भी सवाल

भील आदिवासी समुदाय से आने वाली साधना मीणा ने कहा कि सुझाव देने के लिए केवल 21 दिनों की समय सीमा तय की गई है, जबकि अधिकांश ग्रामीणों तक सूचना पहुंची ही नहीं है। उन्होंने कहा कि मानसून के दौरान ग्रामीण समुदाय खेती, सामाजिक आयोजनों और अन्य गतिविधियों में व्यस्त रहता है, जिससे इतने कम समय में प्रभावी भागीदारी संभव नहीं है।

उधर, अधिवक्ता विश्वास तंवर ने मीडिया रिपोर्टों का हवाला देते हुए कहा कि समिति का प्रस्तावित दौरा केवल 10 जिलों तक सीमित है, जबकि अरावली क्षेत्र 64 जिलों में फैला हुआ है। उन्होंने कहा कि 54 जिले इस प्रक्रिया से बाहर रह जाएंगे, जिससे व्यापक और संतुलित राय प्राप्त करना संभव नहीं होगा।

पूर्व की सफल परामर्श प्रक्रियाओं का दिया उदाहरण

पीपुल फॉर अरावलिस ने अपने अभ्यावेदन में पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ पैनल और राष्ट्रीय जैव विविधता रणनीति एवं कार्य योजना (NBSAP) जैसी पूर्व की व्यापक जन-परामर्श प्रक्रियाओं का उल्लेख किया है। संगठन का कहना है कि इन प्रक्रियाओं में स्थानीय समुदायों, जनप्रतिनिधियों, विशेषज्ञों और सरकारी एजेंसियों के साथ अनेक बैठकों, क्षेत्रीय दौरों, कार्यशालाओं और सार्वजनिक चर्चाओं के माध्यम से सुझाव लिए गए थे तथा प्रारूपों में प्राप्त टिप्पणियों के आधार पर संशोधन किए गए थे।

व्यापक सार्वजनिक सहभागिता की मांग

संगठन ने मांग की है कि वर्तमान प्रेस नोट वापस लेकर नई सार्वजनिक सूचना जारी की जाए, सुझाव देने की समय सीमा बढ़ाई जाए और अरावली क्षेत्र के सभी 64 जिलों में जिला अथवा उप-जिला स्तर पर सार्वजनिक परामर्श आयोजित किए जाएं। साथ ही भविष्य के सभी दौरे पूर्व सूचना के साथ व्यापक रूप से प्रचारित किए जाएं, ताकि प्रत्येक प्रभावित व्यक्ति, ग्रामीण समुदाय, आदिवासी समूह, किसान, पर्यावरण विशेषज्ञ और अन्य हितधारक समिति के समक्ष अपनी बात प्रभावी ढंग से रख सकें।

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पीपुल फॉर अरावलिस का कहना है कि अरावली पर्वतमाला केवल एक भौगोलिक संरचना नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की जल, जैव विविधता, आजीविका और पर्यावरणीय सुरक्षा का आधार है। ऐसे में इसके भविष्य से जुड़े निर्णय व्यापक, पारदर्शी और वास्तविक जनभागीदारी के आधार पर ही लिए जाने चाहिए।

Written By: एम अतहर उद्दीन मुन्ने भारती 

Edited By: Geeta Sharma