New Delhi: जमीअत उलमा-ए-हिंद की कार्यकारी समिति ने देश की वर्तमान सामाजिक, राजनीतिक और संवैधानिक परिस्थितियों पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए एक विस्तृत प्रस्ताव पारित किया है। समिति का कहना है कि देश में बढ़ता नफरत का माहौल, सामाजिक विभाजन और अल्पसंख्यकों के बीच असुरक्षा की भावना भारत के लोकतांत्रिक और संवैधानिक भविष्य के लिए गंभीर चुनौती बनती जा रही है। इसके साथ ही संगठन ने सरकार के समक्ष छह सूत्रीय मांग-पत्र भी प्रस्तुत किया है।
जमीअत उलमा-ए-हिंद की कार्यकारी समिति ने पारित किया एक विस्तृत प्रस्ताव
यह प्रस्ताव 11 जून 2026 को नई दिल्ली में आयोजित जमीअत उलमा-ए-हिंद की कार्यकारी समिति की विशेष बैठक में सर्वसम्मति से पारित किया गया। बैठक की अध्यक्षता संगठन के अध्यक्ष मौलाना महमूद असद मदनी ने की। प्रस्ताव में कहा गया कि पिछले कुछ वर्षों में सरकारी प्राथमिकताओं और सामाजिक व्यवहार में आए बदलाव केवल किसी एक वर्ग के लिए नहीं, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक ढांचे के लिए चिंता का विषय हैं।
मदरसों को निशाना बनाए जाने की घटनाएं चिंताजनक: समिति का आरोप
समिति ने आरोप लगाया कि घृणास्पद भाषणों और धार्मिक उन्माद ने सामाजिक वातावरण को प्रभावित किया है तथा सांप्रदायिक तनाव को बढ़ावा दिया है। प्रस्ताव में कहा गया कि अल्पसंख्यकों के धार्मिक स्थलों, मदरसों और कब्रिस्तानों को निशाना बनाए जाने की घटनाएं चिंता का विषय हैं। संगठन का मानना है कि धार्मिक और सांस्कृतिक संस्थानों से जुड़े मामलों का समाधान न्याय, पारदर्शिता और विधिक प्रक्रियाओं के अनुरूप होना चाहिए।
मतदाता सूची से जुड़े हालिया घटनाक्रमों पर जाहिर की चिंता
जमीअत ने मतदान अधिकार, नागरिकता और मतदाता सूची से जुड़े हालिया घटनाक्रमों पर भी चिंता व्यक्त की। समिति का कहना है कि नागरिक पहचान और नागरिकता के नाम पर चल रही विभिन्न प्रक्रियाओं ने बड़ी संख्या में नागरिकों के बीच आशंका का वातावरण पैदा किया है। संगठन ने इस बात पर बल दिया कि लोकतंत्र की मजबूती के लिए मतदान के अधिकार और चुनावी प्रक्रियाओं पर जनता का विश्वास कायम रहना आवश्यक है।
प्रस्ताव में उठाई गई बेरोजगारी, महंगाई, किसानों की समस्याएं
प्रस्ताव में यह भी कहा गया कि देश के सामने मौजूद वास्तविक चुनौतियां—जैसे बेरोजगारी, महंगाई, किसानों की समस्याएं, शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र की चुनौतियां—राष्ट्रीय विमर्श से पीछे छूटती जा रही हैं। संगठन के अनुसार, सार्वजनिक चर्चा को बार-बार धार्मिक और सांप्रदायिक मुद्दों की ओर मोड़ा जा रहा है, जबकि राष्ट्रीय ऊर्जा का उपयोग विकास और जनकल्याण के मुद्दों के समाधान में होना चाहिए। जमीअत उलमा-ए-हिंद ने कहा कि यदि किसी एक समुदाय के अधिकारों और गरिमा को प्रभावित किया जाता है, तो भविष्य में यही प्रवृत्ति अन्य समुदायों के प्रति भी अपनाई जा सकती है। इसलिए यह केवल किसी एक वर्ग का प्रश्न नहीं, बल्कि संविधान, लोकतांत्रिक मूल्यों और कानून के शासन से जुड़ा राष्ट्रीय मुद्दा है।
बैठक में पारित एक अन्य प्रस्ताव में अवैध घुसपैठ व्यक्त की नाराजगी
बैठक में पारित एक अन्य प्रस्ताव में संगठन ने अवैध घुसपैठ और जनसांख्यिकीय परिवर्तन के नाम पर चलाए जा रहे अभियानों पर भी चिंता व्यक्त की। विशेष रूप से असम, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड का उल्लेख करते हुए कहा गया कि इन मुद्दों के माध्यम से एक विशेष धार्मिक समुदाय के प्रति भय, संदेह और अविश्वास का वातावरण बनाया जा रहा है। हालांकि जमीअत ने स्पष्ट किया कि वह किसी भी प्रकार की अवैध घुसपैठ का समर्थन नहीं करती और सीमा सुरक्षा तथा नागरिकता कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन को सरकार की जिम्मेदारी मानती है। संगठन ने कहा कि किसी भी व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई उसके धर्म, भाषा या पहचान के आधार पर नहीं बल्कि प्रमाण, निष्पक्ष सुनवाई और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर होनी चाहिए।
सरकार से संगठन ने देश की वर्तमान परिस्थितियों पर मांगी 6 प्रमुख मांगें
देश की वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए जमीअत उलमा-ए-हिंद ने सरकार के समक्ष 6 प्रमुख मांगें रखीं। इनमें घृणास्पद भाषणों और मॉब लिंचिंग की घटनाओं को रोकने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के दिशानिर्देशों का सख्ती से पालन, सांप्रदायिक हिंसा की स्थिति में प्रशासनिक जवाबदेही सुनिश्चित करना, वंचित और अल्पसंख्यक वर्गों के लिए शिक्षा एवं रोजगार के अवसर बढ़ाना तथा धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यकों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा शामिल हैं।
मानवीय सहायता के समर्थन में भारत सरकार से सक्रिय कूटनीतिक भूमिका निभाने का किया गया आग्रह
इसके अतिरिक्त संगठन ने नागरिकता और मतदाता सूची से जुड़ी प्रक्रियाओं में पारदर्शिता सुनिश्चित करने तथा किसी भी व्यक्ति को पूर्ण कानूनी प्रक्रिया अपनाए बिना विदेशी घोषित कर निष्कासित न किए जाने की मांग की। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संगठन ने फिलिस्तीनी जनता के आत्मनिर्णय के अधिकार और मानवीय सहायता के समर्थन में भारत सरकार से सक्रिय कूटनीतिक भूमिका निभाने का आग्रह भी किया। कार्यकारी समिति ने देश के राजनीतिक दलों, संसद सदस्यों, न्यायपालिका, मीडिया, बुद्धिजीवियों और नागरिक समाज से संविधान, लोकतांत्रिक मूल्यों और राष्ट्रीय एकता की रक्षा के लिए सक्रिय भूमिका निभाने की अपील की। संगठन ने कहा कि भारत की वास्तविक शक्ति उसकी लोकतांत्रिक संस्थाओं, संवैधानिक व्यवस्था, सांस्कृतिक विविधता और सभी नागरिकों के समान अधिकारों में निहित है।
बैठक में शामिल हुए कई जाने माने चेहरे
बैठक में मौलाना महमूद असद मदनी, मौलाना मोहम्मद हकीमुद्दीन कासमी, मौलाना मुफ्ती अबुल कासिम नोमानी, मौलाना रहमतुल्लाह मीर, मौलाना कारी शौकत अली, मौलाना मुफ्ती सैयद मोहम्मद सलमान मंसूरपुरी, मौलाना मुफ्ती मोहम्मद राशिद आजमी, मौलाना अब्दुल्ला मारूफ, मुफ्ती सैयद मोहम्मद अफ्फान मंसूरपुरी, मौलाना नियाज अहमद फारूकी, मौलाना कलीमुल्लाह कासमी, मुफ्ती शमसुद्दीन बिजली कासमी तथा मौलाना याह्या करीमी सहित अन्य निर्वाचित सदस्य उपस्थित रहे।
(रिपोर्ट: एम.अतहर उद्दीन मुन्ने भारती) Edited By: Geeta Sharma