Delimitation Bill: कल यानी सोमवार को मानसून सत्र शुरू होने वाले है। इससे पहले ही सर्वदलीय बैठक बुलाई गई, जिसमें डीलिमिटेशन (परिसीमन) बिल को लेकर डीएमके का रुख चर्चा का विषय बन गया। RSP सांसद एन.के. प्रेमचंद्रन का ऐसा दावा है कि डीएमके ने परिसीमन बिल का समर्थन किया है। हालांकि, डीएमके सांसद तिरुची शिवा ने सभी अटकलों के दरकिनार करते हुए कहा कि सरकार ने अभी तक कोई स्पष्ट प्रस्ताव पेश नहीं किया है। पार्टी को इस मुद्दे पर सरकार से और स्पष्टता चाहिए

महिला आरक्षण तुरंत लागू करने की मांग

डीलिमिटेशन (परिसीमन) बिल को लेकर संसद के मानसून सत्र से पहले राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। इसी बीच सर्वदलीय बैठक में डीएमके (DMK) ने अपना पक्ष रखते हुए महिला आरक्षण को लेकर अहम सुझाव दिया। सूत्रों के मुताबिक, पार्टी का कहना है कि महिला आरक्षण को मौजूदा लोकसभा सीटों की संख्या के आधार पर ही तत्काल लागू किया जाना चाहिए। डीएमके का मानना है कि महिला आरक्षण को परिसीमन प्रक्रिया से जोड़ने की कोई आवश्यकता नहीं है और इसे बिना किसी देरी के लागू किया जा सकता है।

दक्षिण भारत के हितों पर नहीं होगा समझौता

बैठक में डीएमके ने स्पष्ट किया कि परिसीमन की नई प्रक्रिया में दक्षिण भारतीय राज्यों के राजनीतिक हितों की अनदेखी स्वीकार नहीं की जाएगी। पार्टी का कहना है कि केंद्र सरकार पहले अपना विस्तृत और स्पष्ट प्रस्ताव सार्वजनिक करे, ताकि सभी पक्षों को यह समझने का अवसर मिले कि नए परिसीमन का राज्यों की संसदीय हिस्सेदारी पर क्या प्रभाव पड़ेगा।

सूत्रों के अनुसार, यदि परिसीमन के कारण दक्षिण भारतीय राज्यों की लोकसभा में प्रतिनिधित्व क्षमता घटती है, तो डीएमके परिसीमन प्रक्रिया को अगले 25 वर्षों तक स्थगित (फ्रीज) करने जैसे विकल्प पर भी विचार करने की पक्षधर है।

लोकसभा सीटों में 50% बढ़ोतरी चाहती है पार्टी

डीएमके ने बैठक में यह भी सुझाव दिया कि यदि सरकार नया परिसीमन बिल लाती है, तो उसमें लोकसभा सीटों की संख्या में 50 प्रतिशत बढ़ोतरी का स्पष्ट कानूनी प्रावधान शामिल किया जाना चाहिए। पार्टी का कहना है कि गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा में इस संबंध में मौखिक आश्वासन दिया था, लेकिन इसे विधेयक का हिस्सा बनाया जाना जरूरी है।

सूत्रों का कहना है कि यदि सरकार इस मांग को बिल में शामिल करती है, तो डीएमके इस पर सकारात्मक रुख अपना सकती है। यही कारण है कि पार्टी के रुख को मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में काफी अहम माना जा रहा है।

सरकार ने अभी तक नहीं पेश किया है विधेयक

हालांकि डीलिमिटेशन बिल को लेकर चर्चा तेज है, लेकिन केंद्र सरकार ने अभी तक इसे मानसून सत्र के विधायी एजेंडे में शामिल नहीं किया है। सरकारी सूत्रों का कहना है कि उचित समय आने पर सरकार विधेयक पेश करेगी और उसके पास इसे पारित कराने के लिए आवश्यक समर्थन जुटाने की क्षमता है।

समय के साथ बदला डीएमके का रुख

पिछले कुछ महीनों में डीलिमिटेशन बिल को लेकर डीएमके के रुख में बदलाव देखने को मिला है। शुरुआत में पार्टी इस मुद्दे पर काफी आक्रामक थी, लेकिन अब वह कुछ शर्तों के साथ बातचीत और सहमति की संभावना खुली रखने के संकेत दे रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संविधान संशोधन के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत जुटाने की कोशिश कर रहे एनडीए के लिए डीएमके का रुख महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।

कांग्रेस से दूरी, तमिलनाडु के हितों को प्राथमिकता

सूत्रों के अनुसार, तमिलनाडु की राजनीति में बदले हालात और कांग्रेस के साथ बढ़ी राजनीतिक दूरी के बीच डीएमके अब डीलिमिटेशन बिल पर अपना फैसला स्वतंत्र रूप से लेना चाहती है। पार्टी का कहना है कि उसका अंतिम रुख इस आधार पर तय होगा कि प्रस्तावित परिसीमन से तमिलनाडु और दक्षिण भारतीय राज्यों के राजनीतिक अधिकारों तथा प्रतिनिधित्व पर क्या प्रभाव पड़ता है।

यानी डीएमके ने संकेत दिया है कि वह किसी गठबंधन की राजनीतिक लाइन के बजाय राज्य के हितों को प्राथमिकता देगी। ऐसे में आने वाले दिनों में यदि सरकार डीलिमिटेशन बिल संसद में पेश करती है, तो डीएमके की भूमिका विधेयक के भविष्य को तय करने में अहम साबित हो सकती है।

Written By: Geeta Sharma