सुप्रीम कोर्ट ने गैर-कानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत गिरफ्तार 2 आरोपियों मोहम्मद साकिब अंसारी और वकार अजहर को जमानत दे दी है। अदालत ने कहा कि दोनों आरोपी लगभग 12 वर्षों से न्यायिक हिरासत में हैं और मामले की सुनवाई पूरी होने की फिलहाल कोई वास्तविक संभावना नजर नहीं आती। ऐसे में उन्हें लगातार जेल में रखना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का गंभीर उल्लंघन है।
दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को दी थी चुनौती
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल द्वारा दर्ज मामले में दोनों आरोपियों की अपील पर सुनवाई की। आरोपियों ने दिल्ली हाई कोर्ट के 24 अप्रैल 2026 के उस फैसले को चुनौती दी थी। जिसमें ट्रायल कोर्ट के आदेश को बरकरार रखते हुए उनकी जमानत याचिकाएं खारिज कर दी गई थीं। हाई कोर्ट ने UAPA की धारा 43D(5) का हवाला देते हुए जमानत देने से इनकार किया था।
ट्रायल की धीमी रफ्तार पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल की बेहद धीमी प्रगति पर गंभीर चिंता जताई। ई-कोर्ट पोर्टल पर उपलब्ध रिकॉर्ड का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष ने कुल 197 गवाहों की सूची पेश की है, लेकिन अब तक केवल 68 गवाहों की ही गवाही दर्ज हो सकी है। इतना ही नहीं, जनवरी 2025 के बाद से केवल दो गवाहों से पूछताछ हुई है, जिनमें से एक की गवाही अभी भी अधूरी है। अदालत ने कहा कि इस गति से मुकदमे का जल्द समाप्त होना संभव नहीं दिखता, जिससे आरोपियों को अनिश्चितकाल तक जेल में रखना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।
मामले में 25 आरोपी, जल्द फैसला आने की उम्मीद नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि इस मामले में कुल 25 आरोपी हैं। इतने अधिक आरोपियों और धीमी न्यायिक प्रक्रिया को देखते हुए निकट भविष्य में ट्रायल पूरा होने की संभावना बेहद कम है। अदालत ने कहा कि लंबे समय तक मुकदमे के लंबित रहने का खामियाजा आरोपियों को उनकी स्वतंत्रता से वंचित करके नहीं भुगतना चाहिए।
अन्य मामलों में भी मिल चुकी है राहत
पीठ ने यह भी गौर किया कि दिल्ली के इस मामले के अलावा राजस्थान में दर्ज 2 अन्य मामलों में मोहम्मद साकिब अंसारी और वकार अजहर को पहले ही जमानत मिल चुकी है या उनकी सजा पर रोक लगाई जा चुकी है। इसके अलावा,इसी दिल्ली मामले में सह-आरोपी मोहम्मद मारूफ को भी पहले ही जमानत मिल चुकी है। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए अदालत ने माना कि दोनों आरोपियों को निरंतर हिरासत में रखना उचित नहीं है।
अनुच्छेद 21 की रक्षा सर्वोपरि
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि किसी भी आरोपी को अनिश्चितकाल तक जेल में रखना, जबकि मुकदमे के जल्द पूरा होने की कोई संभावना न हो, संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है। अदालत ने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया में देरी का बोझ आरोपियों पर नहीं डाला जा सकता।
इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मोहम्मद साकिब अंसारी और वकार अजहर को उचित शर्तों के साथ जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया। यह फैसला उन मामलों में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जहां UAPA जैसे कठोर कानूनों के तहत लंबे समय तक मुकदमे लंबित रहते हैं और आरोपी वर्षों तक जेल में रहते हैं।
Written By: Geeta Sharma