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रिश्ते में आने के बाद क्यों बढ़ जाती है पार्टनर को लेकर पजेसिवनेस? जानिए इसके पीछे की वजह

रिश्ते में पार्टनर के लिए पजेसिव होने के पीछे प्यार, ऑक्सीटोसिन हार्मोन, भावनात्मक जुड़ाव और पुराने अनुभव बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।

रिश्ते में आने के बाद क्यों बढ़ जाती है पार्टनर को लेकर पजेसिवनेस? जानिए इसके पीछे की वजह
Relationship Possessiveness

रिश्ते में आने के बाद पार्टनर को लेकर ज्यादा पजेसिव होना काफी आम बात है। दिलचस्प बात यह है कि यह व्यवहार सिर्फ महिलाओं में ही देखने को नहीं मिलता, पुरुष भी अपने पार्टनर को लेकर इसी तरह की भावनाएं महसूस कर सकते हैं। हालांकि कई बार महिलाएं अपनी भावनाओं को ज्यादा खुलकर जाहिर करती हैं, इसलिए उनमें पजेसिवनेस अधिक नजर आती है।

प्यार के साथ क्यों बढ़ने लगता है पार्टनर को खोने का डर?

दरअसल, किसी रिश्ते में भावनात्मक रूप से गहराई से जुड़ने के बाद इंसान का दिमाग उस व्यक्ति को अपनी जिंदगी का अहम हिस्सा मानने लगता है। इसके साथ शरीर में होने वाले कुछ हार्मोनल बदलाव और व्यक्ति के पुराने अनुभव भी उसके व्यवहार को प्रभावित करते हैं। यही वजह है कि प्यार के साथ-साथ पार्टनर को खोने का डर भी पैदा हो सकता है। आइए समझते हैं कि इसके पीछे आखिर कौन-से मनोवैज्ञानिक और जैविक कारण काम करते हैं।

ऑक्सीटोसिन बढ़ाता है भावनात्मक जुड़ाव

पार्टनर के साथ नजदीकी बढ़ने पर शरीर में ऑक्सीटोसिन जैसे हार्मोन की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। इसे आमतौर पर ‘लव हार्मोन’ के नाम से जाना जाता है। यह भावनात्मक जुड़ाव, भरोसे और अपनापन महसूस करने में योगदान देता है। यही कारण है कि पार्टनर का गले लगाना, हाथ पकड़ना या उसके साथ समय बिताना व्यक्ति को भावनात्मक रूप से सुरक्षित और जुड़ा हुआ महसूस करा सकता है। जैसे-जैसे लगाव मजबूत होता है, वैसे-वैसे दिमाग उस रिश्ते को महत्वपूर्ण मानने लगता है। ऐसे में पार्टनर से जुड़ी छोटी-छोटी चीजों पर भी ध्यान जाने लगता है और उसे खोने की आशंका मन में जगह बना सकती है। कई मामलों में यही डर धीरे-धीरे पजेसिव व्यवहार में बदल जाता है। व्यक्ति पार्टनर की गतिविधियों को लेकर ज्यादा सवाल करने लगता है या उसके दूसरे लोगों के साथ रिश्तों को लेकर असहज महसूस कर सकता है।

भावनात्मक निवेश भी बढ़ा सकता है पजेसिवनेस

किसी रिश्ते में जितना ज्यादा भावनात्मक निवेश होता है, उससे जुड़ी उम्मीदें और उसे बनाए रखने की इच्छा भी उतनी ही मजबूत हो सकती है। जब कोई व्यक्ति अपने पार्टनर के साथ समय, भावनाएं, भरोसा और भविष्य की उम्मीदें साझा करता है, तो रिश्ता उसके लिए ज्यादा महत्वपूर्ण बन जाता है। ऐसे में उसे खोने का डर भी बढ़ सकता है। पिछले रिश्तों के अनुभव भी इस व्यवहार को प्रभावित करते हैं। अगर किसी व्यक्ति को पहले धोखा, ब्रेकअप या भावनात्मक चोट का सामना करना पड़ा है, तो वह नए रिश्ते में भी ज्यादा सतर्क रह सकता है। छोटी-सी बात भी उसे पुराने अनुभवों की याद दिला सकती है और उसके भीतर असुरक्षा पैदा कर सकती है। इसके अलावा परिवार, समाज और आसपास के रिश्तों से मिली सीख भी इस बात पर असर डालती है कि कोई व्यक्ति प्यार और रिश्ते को किस नजरिए से देखता है।

कब पजेसिवनेस बन जाती है समस्या?

रिश्ते में पार्टनर की परवाह करना या कभी-कभार उसे लेकर असुरक्षित महसूस करना अपने आप में असामान्य नहीं है, लेकिन समस्या तब शुरू होती है, जब यही भावना नियंत्रण, लगातार शक या रोक-टोक का रूप लेने लगे। अगर कोई व्यक्ति अपने पार्टनर की हर गतिविधि पर नजर रखने लगे, उसके दोस्तों या परिवार से मिलने पर आपत्ति करे या लगातार उसके प्यार को लेकर आश्वासन मांगता रहे, तो यह स्वस्थ पजेसिवनेस नहीं मानी जाएगी। एक मजबूत रिश्ते में प्यार के साथ भरोसा और व्यक्तिगत आजादी भी जरूरी होती है। इसलिए पार्टनर को लेकर चिंता या लगाव महसूस करना स्वाभाविक हो सकता है, लेकिन स्वस्थ रिश्ते की पहचान यही है कि दोनों लोग एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान करते हुए भरोसे और स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाए रखें।

 

 

 Written By Toshi Shah  

Rajeev Singh

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