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1920 की नींव से क्रांति के गुप्त अड्डे तक… मेरठ के गांधी आश्रम की वो कहानी, जिसे वक्त ने भुला दिया!
मेरठ का क्षेत्रीय श्री गांधी आश्रम सिर्फ खादी और चरखे की पहचान नहीं, बल्कि भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का भी अहम केंद्र रहा है। वर्ष 1920 में जेबी कृपलानी द्वारा स्थापित इस आश्रम में आजादी की रणनीतियां बनाई जाती थीं और क्रांतिकारियों की बैठकें होती थीं। आइए जानते हैं इसके इतिहास के बारे में...
Meerut Gandhi Ashram History: जब भी हम 'गांधी आश्रम' का नाम सुनते हैं, तो हमारे दिमाग में खादी के कपड़ों का थान, चरखे की धीमी सरसराहट और एक अजीब सा सुकून तैर जाता है। लेकिन क्रांतिधरा मेरठ के क्षेत्रीय श्री गांधी आश्रम की दीवारें सिर्फ खादी के धागे बुनने की गवाह नहीं रही हैं, बल्कि इन्होंने भारत की आजादी के सबसे खतरनाक और ऐतिहासिक तूफानों को उठते देखा है।
यह सिर्फ सूत कातने का केंद्र नहीं, बल्कि ब्रिटिश हुकूमत की जड़ें हिलाने वाले सूरमाओं का अभेद्य किला था।
आचार्य कृपलानी ने बोया था आजादी का बीज
बात साल 1920 की है। आजादी के पुरोधा जेबी कृपलानी (आचार्य कृपलानी) ने मेरठ में इस गांधी आश्रम की नींव रखी थी। उन्हें क्या पता था कि खादी को बढ़ावा देने के उद्देश्य से शुरू हुआ यह केंद्र आगे चलकर अंग्रेजी सल्तनत के लिए सबसे बड़ी सिरदर्दी बन जाएगा, धीरे-धीरे यह आश्रम आजादी के दीवानों का गुप्त ठिकाना बन गया। दिन के उजाले में जहाँ चरखे चलते थे, वहीं रात के अंधेरे में जलती मोमबत्तियों के बीच अंग्रेजी हुकूमत को उखाड़ फेंकने की रणनीतियाँ बनती थीं।
नेहरू, शास्त्री और नेताजी की गूंजती थीं आवाजें
क्षेत्रीय श्री गांधी आश्रम के मंत्री पृथ्वी सिंह रावत बताते हैं कि इस आश्रम का इतिहास बेहद गौरवशाली रहा है। इतिहासकारों के अनुसार, पंडित जवाहरलाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री और नेताजी सुभाष चंद्र बोस जैसी महान हस्तियों का भी इस आश्रम से गहरा जुड़ाव रहा। यह आश्रम उस दौर के बड़े नेताओं की बैठकों का मुख्य केंद्र हुआ करता था।
आजादी की वेदी पर दी गई शहादत
1942 में जब महात्मा गांधी ने 'भारत छोड़ो आंदोलन' का नारा दिया, तो इस आश्रम के कर्मचारियों ने भी अपने औजार छोड़ मैदान-ए-जंग में छलांग लगा दी। आश्रम से जुड़े कई कर्मचारियों को अंग्रेजों ने गिरफ्तार कर जेलों में ठूँस दिया, पर उनके हौसले नहीं डिगे। मंत्री पृथ्वी सिंह रावत एक रोंगटे खड़े कर देने वाला किस्सा साझा करते हुए बताते हैं कि मेरठ के भामोरी गांव में गांधी आश्रम का ही एक जांबाज कर्मचारी क्रांतिकारियों के साथ गुप्त बैठक कर रहा था। अंग्रेजी पुलिस को इसकी भनक लग गई और फिरंगियों ने उन्हें मौके पर ही गोली मार दी। उनकी शहादत ने यह साबित कर दिया कि आश्रम के लोग सिर्फ सूत कातना नहीं, बल्कि देश के लिए खून बहाना भी जानते थे।
जब कर्मचारियों को मिली 'स्वतंत्रता संग्राम सेनानी' की पेंशन
देश की आजादी के बाद सरकार ने गांधी आश्रम के कर्मचारियों के इस अतुलनीय योगदान को सलाम किया। आश्रम से जुड़े जिन कर्मचारियों ने स्वतंत्रता संग्राम में जेल काटी और यातनाएं सहीं, उन्हें प्रदेश सरकार द्वारा 'आजादी की पेंशन' (स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पेंशन) देकर सम्मानित किया गया।
आज भी जीवंत है क्रांति की महक
समय बदला, दौर बदला... लेकिन आज भी मेरठ का क्षेत्रीय श्री गांधी आश्रम खादी और चरखे की परंपरा को सीने से लगाए खड़ा है। इसकी ईंट-ईंट में आज भी उन क्रांतिकारियों के कदमों की आहट और 'भारत माता की जय' के नारे गूँजते महसूस होते हैं। यह आश्रम केवल एक दुकान या दफ्तर नहीं है, यह मेरठ की क्रांतिकारी आत्मा का वो जीवित दस्तावेज है, जिसे हर भारतीय को गर्व से याद रखना चाहिए।
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Written By Shailesh Yadav
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