BRICS Summit 2026: दिल्ली में आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में दुनिया के 21 देशों ने एक मंच पर आकर आतंकवाद, वैश्विक व्यापार, समुद्री सुरक्षा, जलवायु संकट और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में सुधार जैसे मुद्दों पर चर्चा की। सम्मेलन के अंत में 45 पन्नों का साझा घोषणा-पत्र जारी किया गया, जिसमें 140 बिंदुओं पर सदस्य देशों की सहमति का दावा किया गया है।
इस सम्मेलन को ग्लोबल साउथ यानी विकासशील देशों की बढ़ती भूमिका के लिहाज से अहम माना जा रहा है। बैठक में बहुपक्षवाद पर जोर दिया गया। इसका मतलब है कि वैश्विक फैसले किसी एक देश या सीमित समूह के बजाय सभी देशों की भागीदारी और सहमति से लिए जाएं।आइए जानते हैं ब्रिक्स सम्मेलन में कौन से पांच बड़े फैसले सामने आए और भारत को इससे क्या हासिल हुआ।
1. आतंकवाद और टेरर फंडिंग के खिलाफ सख्त रुख
ब्रिक्स देशों ने आतंकवाद के सभी रूपों की निंदा करते हुए आतंकियों को मिलने वाली आर्थिक मदद पर रोक लगाने की जरूरत पर जोर दिया। साझा घोषणा-पत्र में पहलगाम आतंकी हमले का भी जिक्र किया गया है।बैठक में सीमा पार आतंकवाद, आतंकियों के नेटवर्क और उनकी फंडिंग को रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाने की बात कही गई। भारत के लिए यह मुद्दा खास महत्व रखता है, क्योंकि वह लंबे समय से आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक स्तर पर एकजुट कार्रवाई की मांग करता रहा है।
2. समुद्री व्यापारिक रास्तों की सुरक्षा पर सहमति
दुनिया के कई हिस्सों में जारी संघर्ष और तनाव का असर समुद्री व्यापार पर भी पड़ रहा है। कई क्षेत्रों में कारोबारी जहाजों को हमलों और सुरक्षा संबंधी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।ब्रिक्स सम्मेलन में समुद्री व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करने पर जोर दिया गया। देशों ने समुद्री विवादों को सैन्य टकराव के बजाय बातचीत और कूटनीतिक तरीकों से सुलझाने की आवश्यकता बताई।समुद्री रास्तों की सुरक्षा भारत के लिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि देश का बड़ा हिस्सा अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार पर निर्भर है।
3. टैरिफ और व्यापार को आसान बनाने पर जोर
ब्रिक्स देशों ने व्यापार में मनमाने और अचानक लगाए जाने वाले भारी टैरिफ को लेकर चिंता जताई। बैठक में अंतरराष्ट्रीय व्यापार को अधिक स्थिर, पारदर्शी और आसान बनाने की जरूरत पर सहमति दिखाई गई।इसके अलावा 2026 से 2030 के बीच सदस्य देशों के बीच व्यापारिक सहयोग बढ़ाने और एक-दूसरे के बाजारों तक पहुंच आसान बनाने की दिशा में काम करने की बात कही गई।यदि इन प्रस्तावों को प्रभावी तरीके से लागू किया जाता है, तो इससे भारत के निर्यातकों, कारोबारियों और उद्योगों को नए बाजार मिल सकते हैं।
4. सैटेलाइट नेटवर्क से मौसम और आपदाओं पर नजर
जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए ब्रिक्स देशों ने अंतरिक्ष और सैटेलाइट तकनीक के सहयोग को बढ़ाने पर जोर दिया। इसके तहत बाढ़, सूखा, चक्रवात और मौसम में होने वाले बदलावों की निगरानी के लिए साझा सैटेलाइट नेटवर्क की दिशा में सहमति बनने की बात कही गई।इस तरह का नेटवर्क आपदा से पहले चेतावनी देने, मौसम संबंधी आंकड़े साझा करने और राहत-बचाव की तैयारी को बेहतर बनाने में मदद कर सकता है।भारत के लिए यह सहयोग खास तौर पर उपयोगी हो सकता है, क्योंकि देश हर साल बाढ़, सूखा, चक्रवात और भूस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाओं का सामना करता है।
5. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग
ब्रिक्स सम्मेलन में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद यानी UNSC में सुधार की जरूरत पर भी जोर दिया गया। बैठक में विकासशील देशों को वैश्विक निर्णय लेने वाली संस्थाओं में अधिक प्रतिनिधित्व देने की मांग उठाई गई।भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता की मांग करता रहा है। ब्रिक्स जैसे मंच पर इस मुद्दे का समर्थन भारत की कूटनीतिक कोशिशों को मजबूती दे सकता है।हालांकि, सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता का अंतिम फैसला संयुक्त राष्ट्र की व्यापक प्रक्रिया और सदस्य देशों की सहमति पर निर्भर करेगा।
भारत को क्या मिला? 5 बड़े कूटनीतिक और रणनीतिक फायदे
1. आतंकवाद के मुद्दे पर कूटनीतिक बढ़त
भारत के लिए सबसे अहम बात यह रही कि ब्रिक्स के साझा दस्तावेज में पहलगाम हमले का उल्लेख और आतंकवाद की निंदा सामने आई। इससे भारत को आतंकवाद के खिलाफ अपने रुख को व्यापक अंतरराष्ट्रीय मंच पर रखने का अवसर मिला।हालांकि, किसी देश के आतंकवाद पर सामान्य रुख को किसी खास मामले में उसके नीतिगत बदलाव के रूप में देखना जल्दबाजी हो सकती है। फिर भी भारत के लिए यह कूटनीतिक रूप से महत्वपूर्ण संदेश माना जा सकता है।
2. UNSC में स्थायी सदस्यता की मांग को समर्थन
ब्रिक्स मंच पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार और विकासशील देशों को उचित प्रतिनिधित्व देने की मांग भारत के पक्ष में जाती है। इससे भारत अपनी स्थायी सदस्यता की दावेदारी को और मजबूती से उठा सकता है।
3. चीन के साथ संवाद की संभावना
सम्मेलन के दौरान भारत और चीन के शीर्ष नेतृत्व के बीच बातचीत को भी अहम माना गया। सीमा विवाद और लंबे समय से चले आ रहे तनाव के बीच उच्चस्तरीय संवाद से रिश्तों में सुधार की उम्मीद बन सकती है।हालांकि, केवल बातचीत को दोनों देशों के बीच सभी विवादों के समाधान के रूप में नहीं देखा जा सकता। सीमा से जुड़े मुद्दों पर आगे की वार्ता और ठोस कदम महत्वपूर्ण होंगे।
4. व्यापार और आर्थिक सहयोग के नए अवसर
ब्रिक्स देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने की चर्चा भारत के कारोबारियों के लिए उपयोगी हो सकती है। इससे कुछ परिस्थितियों में डॉलर पर निर्भरता कम करने और भुगतान व्यवस्था को आसान बनाने के विकल्प मिल सकते हैं।रूस की ओर से भारत को तेज रफ्तार ‘इवोल्गा ट्रेन’ देने की पेशकश की बात भी सामने आई है। यदि इस दिशा में कोई औपचारिक समझौता होता है, तो इससे भारत के परिवहन और तकनीकी सहयोग को लाभ मिल सकता है।
5. ग्लोबल साउथ में भारत की भूमिका मजबूत
दिल्ली में 21 देशों की मौजूदगी और साझा घोषणा-पत्र जारी होना भारत के लिए कूटनीतिक उपलब्धि के रूप में देखा जा सकता है। भारत ने विकासशील देशों की चिंताओं-जैसे व्यापार, सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन और वैश्विक संस्थाओं में सुधार को एक मंच पर रखने की कोशिश की।रूस, ईरान और अन्य देशों के साथ संवाद का मंच उपलब्ध कराना भारत की संतुलित विदेश नीति और वैश्विक कूटनीतिक भूमिका को भी दर्शाता है।