नई दिल्ली: सोना और चांदी की कीमतों में तेजी के बीच अब कॉपर यानी तांबे ने भी बाजार में तहलका मचा दिया है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कॉपर की कीमत रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गई है। मंगलवार को लंदन मेटल एक्सचेंज (LME) पर कॉपर ने करीब 14,617 डॉलर प्रति टन का नया रिकॉर्ड बनाया। इससे पहले सोमवार को यह 14,533 डॉलर प्रति टन तक पहुंचा था।

कॉपर की कीमतों में इस साल अब तक 17 फीसदी से ज्यादा की तेजी आ चुकी है। बाजार में इसकी मांग बढ़ने और सप्लाई को लेकर चिंता के कारण लाल धातु लगातार मजबूत हो रही है।

आखिर क्यों महंगा हो रहा है कॉपर?
कॉपर की कीमत बढ़ने के पीछे सबसे बड़ी वजह सप्लाई की चिंता है। दुनिया की कई प्रमुख कॉपर खदानों में उत्पादन प्रभावित हुआ है। 2026 की पहली छमाही में वैश्विक कॉपर-माइन उत्पादन में करीब 1.1 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई, जबकि कॉपर कंसंट्रेट का उत्पादन 2.6 फीसदी घटा।

चिली, इंडोनेशिया और कांगो जैसे बड़े उत्पादक देशों में उत्पादन संबंधी परेशानियों ने बाजार में सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ाई है। वहीं नई कॉपर खदानें विकसित करने में कई साल लगते हैं, इसलिए अचानक बढ़ी मांग को पूरा करना आसान नहीं है।

AI और डेटा सेंटर ने बढ़ाई मांग
कॉपर की मौजूदा तेजी सिर्फ सप्लाई की कहानी नहीं है। AI, डेटा सेंटर, इलेक्ट्रिक वाहन, पावर ग्रिड और रिन्यूएबल एनर्जी जैसे सेक्टरों में तेजी से बढ़ता निवेश कॉपर की मांग को मजबूत कर रहा है। AI डेटा सेंटर को भारी मात्रा में बिजली और मजबूत इलेक्ट्रिकल इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत होती है। बिजली के तारों, ग्रिड, ट्रांसफॉर्मर और इलेक्ट्रिकल सिस्टम में कॉपर का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है।

अमेरिका की टैरिफ नीति भी बड़ा कारण
कॉपर की कीमतों में तेजी के पीछे अमेरिका की संभावित टैरिफ नीति भी एक अहम वजह है। संभावित शुल्क से पहले अमेरिका की ओर कॉपर की सप्लाई बढ़ने से दुनिया के दूसरे बाजारों में उपलब्धता को लेकर चिंता पैदा हुई है। इससे LME पर कीमतों को अतिरिक्त सपोर्ट मिला।

कमजोर डॉलर ने भी दिया सहारा
अमेरिकी डॉलर में कमजोरी ने भी कॉपर समेत कई कमोडिटी की कीमतों को सहारा दिया है। डॉलर में कारोबार होने वाली धातुएं दूसरी मुद्राओं में खरीदने वालों के लिए अपेक्षाकृत आकर्षक हो जाती हैं, जिससे मांग बढ़ सकती है।

भारत में भी दिख रहा असर
वैश्विक बाजार में कॉपर की तेजी का असर भारतीय बाजार पर भी पड़ रहा है। MCX पर कॉपर वायदा में मंगलवार को 1 फीसदी से ज्यादा की तेजी देखने को मिली। कॉपर की कीमत बढ़ने से केबल, वायर, इलेक्ट्रिकल उपकरण और अन्य कॉपर आधारित उद्योगों की लागत पर असर पड़ सकता है।

क्या कॉपर आगे 15 हजार डॉलर तक जाएगा?
रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंचने के बाद अब बाजार की नजर इस बात पर है कि कॉपर की तेजी कितनी दूर तक जाती है। कुछ बाजार जानकारों का मानना है कि अगर सप्लाई की समस्या बनी रहती है और AI, बिजली तथा इलेक्ट्रिफिकेशन से मांग मजबूत रहती है, तो कॉपर 15,000 डॉलर प्रति टन के स्तर की ओर बढ़ सकता है। हालांकि इतनी ऊंची कीमतों पर मुनाफावसूली और मांग में कमजोरी का जोखिम भी बना हुआ है।

यानी अभी तक सोना और चांदी निवेशकों की पसंद रहे हैं, लेकिन AI और इलेक्ट्रिफिकेशन के दौर में कॉपर की अहमियत तेजी से बढ़ रही है। रिकॉर्ड कीमत इस बात का संकेत है कि आने वाले समय में यह लाल धातु वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए और भी महत्वपूर्ण हो सकती है।

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