नई दिल्ली: भारतीय रुपये पर एक बार फिर दबाव देखने को मिला है। मंगलवार को शुरुआती कारोबार में रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले कमजोर होकर करीब 94.68 रुपये प्रति डॉलर तक पहुंच गया। रुपये में आई इस कमजोरी के पीछे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और पश्चिम एशिया में जारी तनाव को बड़ी वजह माना जा रहा है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, रुपये को सहारा देने के लिए सरकारी बैंकों को करीब 94.70 रुपये प्रति डॉलर के स्तर पर डॉलर बेचते हुए देखा गया। बाजार के जानकारों का मानना है कि यह भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की ओर से रुपये में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने के लिए किया गया हस्तक्षेप हो सकता है।

विदेशी मुद्रा की रिकॉर्ड आवक ने बदली तस्वीर
रुपये को सबसे बड़ा सहारा भारत में आई भारी विदेशी मुद्रा से मिला है। आरबीआई की विशेष योजनाओं के जरिए 31 अगस्त तक करीब 136.4 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा भारत में आई। इसमें अकेले एफसीएनआर (बी) जमा के जरिए करीब 127.23 अरब डॉलर जुटाए गए। विदेशी मुद्रा कारोबारियों ने बताया कि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की लगातार डॉलर बिकवाली और विशेष योजनाओं के तहत विदेशी मुद्रा का मजबूत प्रवाह बाहरी दबावों के बावजूद रुपये को एक सीमित दायरे में बनाए रखने में मदद कर रहा है।

महंगा कच्चा तेल बना बड़ी चिंता
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी ने भारत की चिंता बढ़ा दी है। मंगलवार को ब्रेंट क्रूड करीब 97.5 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण तेल की वैश्विक आपूर्ति को लेकर आशंकाएं बढ़ी हैं। भारत अपनी तेल जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात करता है। ऐसे में कच्चे तेल की कीमत बढ़ने पर देश को तेल खरीदने के लिए अधिक डॉलर खर्च करने पड़ते हैं। इससे डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपये पर दबाव पड़ सकता है।

RBI लगातार रख रहा है नजर
पिछले कुछ दिनों से RBI विदेशी मुद्रा बाजार में सक्रिय नजर आ रहा है। इससे पहले भी सरकारी बैंकों के माध्यम से डॉलर की बिक्री किए जाने की खबरें सामने आई थीं। केंद्रीय बैंक का मुख्य उद्देश्य रुपये में अचानक होने वाली तेज गिरावट और अत्यधिक अस्थिरता को नियंत्रित करना है। हालांकि RBI किसी निश्चित स्तर को बनाए रखने की नीति की घोषणा नहीं करता, लेकिन बाजार में जरूरत पड़ने पर उसका हस्तक्षेप रुपये को सहारा दे सकता है।

आम लोगों पर क्या असर पड़ेगा?
अगर रुपये की कमजोरी लंबे समय तक जारी रहती है और कच्चा तेल भी महंगा बना रहता है, तो आयात की लागत बढ़ सकती है। इसका असर पेट्रोल-डीजल, परिवहन और विदेश से आयात होने वाली कई वस्तुओं की कीमतों पर अप्रत्यक्ष रूप से पड़ सकता है।

फिलहाल बाजार की नजर RBI के अगले कदम, कच्चे तेल की कीमतों और पश्चिम एशिया के हालात पर बनी हुई है।

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