रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के एक प्रस्ताव ने अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था को लेकर नई बहस छेड़ दी है। पुतिन ने शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के सदस्य देशों के लिए एक अलग विकास बैंक बनाने का प्रस्ताव रखा है। सवाल उठता है कि आखिर SCO Bank की जरूरत क्यों पड़ी? यह बैंक करेगा क्या, इसमें पैसा कौन लगाएगा और भारत को इससे क्या फायदा होगा?

आइए आसान भाषा में समझते हैं इस प्रस्ताव से जुड़े हर बड़े सवाल का जवाब।

सबसे पहले समझिए SCO Bank क्या है?
SCO यानी शंघाई सहयोग संगठन के सदस्य देशों के बीच आर्थिक और विकास से जुड़े प्रोजेक्ट्स के लिए एक साझा वित्तीय संस्थान बनाने का विचार है। इसे आप मोटे तौर पर एक ऐसे बहुपक्षीय विकास बैंक के रूप में समझ सकते हैं, जिसमें संगठन के सदस्य देश पूंजी लगा सकते हैं और फिर उसी फंड से सदस्य देशों में सड़क, रेलवे, ऊर्जा, व्यापार, उद्योग और दूसरे बड़े प्रोजेक्ट्स को वित्तीय मदद दी जा सकती है।

हालांकि अभी यह बैंक बना नहीं है। फिलहाल यह प्रस्ताव और बातचीत के स्तर पर है।

पुतिन को ऐसे बैंक की जरूरत क्यों महसूस हुई?
इसके पीछे रूस की बदलती आर्थिक स्थिति बड़ी वजह है। रूस पर पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के बाद मॉस्को लगातार ऐसी वित्तीय व्यवस्था की वकालत कर रहा है, जिसमें उसे पश्चिमी वित्तीय संस्थानों और भुगतान प्रणालियों पर कम निर्भर रहना पड़े। SCO Bank बनने पर सदस्य देशों के बीच निवेश और विकास परियोजनाओं के लिए एक अलग वित्तीय रास्ता तैयार किया जा सकता है। यानी इसका मकसद सिर्फ बैंक खोलना नहीं, बल्कि SCO देशों के आर्थिक सहयोग को संस्थागत रूप देना भी हो सकता है।

बैंक का काम क्या होगा?
अगर प्रस्ताव आगे बढ़ता है तो बैंक कई तरह के काम कर सकता है—

* बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए कर्ज देना
* सदस्य देशों के बीच व्यापार को बढ़ावा देना
* ऊर्जा और परिवहन परियोजनाओं में निवेश
* क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को मजबूत करना
* विकास परियोजनाओं के लिए लंबी अवधि का वित्त उपलब्ध कराना
* सदस्य देशों के बीच वित्तीय सहयोग बढ़ाना

पैसा कौन लगाएगा?
यह सबसे बड़ा सवाल है और इसका अंतिम जवाब अभी सामने नहीं आया है। संभावना है कि शुरुआती पूंजी SCO के सदस्य देश मिलकर उपलब्ध कराएं। किस देश को कितनी पूंजी लगानी होगी, यह बैंक के नियम और समझौते के बाद तय होगा। इसके अलावा भविष्य में बैंक अंतरराष्ट्रीय बाजार से बॉन्ड जारी करके भी पैसा जुटा सकता है।

किस देश की कितनी हिस्सेदारी होगी?
अभी इसका भी अंतिम फॉर्मूला तय नहीं है। आमतौर पर ऐसे बहुपक्षीय बैंकों में हिस्सेदारी और वोटिंग अधिकार तय करने के लिए देश की आर्थिक क्षमता, पूंजी योगदान और सदस्यता जैसे कई पहलुओं को देखा जाता है। अगर योगदान आधारित मॉडल अपनाया गया तो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं का योगदान और प्रभाव ज्यादा हो सकता है। ऐसे में चीन, भारत और रूस जैसे बड़े सदस्य देशों की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि किसी एक देश को बैंक पर पूरा नियंत्रण मिल जाएगा। असली तस्वीर बैंक के नियम और वोटिंग सिस्टम तय होने के बाद ही साफ होगी।

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भारत को इससे क्या फायदा हो सकता है?
भारत के लिए यह बैंक कई मायनों में महत्वपूर्ण हो सकता है। अगर बैंक अस्तित्व में आता है तो भारत को SCO देशों में अपने इंफ्रास्ट्रक्चर, ऊर्जा, परिवहन और व्यापार से जुड़े प्रोजेक्ट्स के लिए एक अतिरिक्त वित्तीय स्रोत मिल सकता है। इसके अलावा भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा होगा—व्यापार और भुगतान के वैकल्पिक रास्ते। भारत पहले से ही अलग-अलग देशों के साथ स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने की कोशिश करता रहा है। SCO के स्तर पर वित्तीय सहयोग बढ़ता है तो इससे क्षेत्रीय व्यापार को और बढ़ावा मिल सकता है।

क्या इससे डॉलर को खतरा होगा?
यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि SCO Bank बनते ही डॉलर को चुनौती मिल जाएगी। हां, अगर सदस्य देश आपसी व्यापार में स्थानीय मुद्राओं और वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों का इस्तेमाल बढ़ाते हैं तो इससे डॉलर पर निर्भरता कुछ हद तक कम हो सकती है। लेकिन डॉलर को वैश्विक व्यापार और वित्त में मिली भूमिका बहुत बड़ी है। इसलिए SCO Bank को तुरंत डॉलर का विकल्प मानना सही नहीं होगा।

क्या यह चीन के बनाए AIIB जैसा होगा?
कुछ हद तक तुलना की जा सकती है क्योंकि दोनों का संबंध बहुपक्षीय विकास वित्त से है, लेकिन दोनों की संरचना और उद्देश्य अलग हो सकते हैं। AIIB एक स्थापित अंतरराष्ट्रीय विकास बैंक है, जबकि SCO Bank अभी सिर्फ प्रस्तावित संस्था है। इसलिए दोनों को एक जैसा मानना सही नहीं होगा।

क्या चीन इस बैंक पर हावी हो सकता है?
यह भी एक अहम सवाल है। चीन SCO की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है और उसकी आर्थिक क्षमता काफी बड़ी है। इसलिए बैंक बनने पर चीन की भूमिका निश्चित रूप से महत्वपूर्ण हो सकती है। लेकिन भारत के लिए असली मुद्दा होगा कि वोटिंग अधिकार, पूंजी योगदान और निर्णय लेने की प्रक्रिया किस तरह बनाई जाती है। अगर सभी बड़े फैसलों के लिए व्यापक सहमति जरूरी होती है तो किसी एक देश का प्रभाव सीमित रखा जा सकता है।

रूस को इससे क्या फायदा मिलेगा?
रूस के लिए फायदा और भी रणनीतिक हो सकता है। पश्चिमी प्रतिबंधों के बीच रूस एशिया और अन्य साझेदार देशों के साथ आर्थिक संबंध मजबूत कर रहा है। ऐसा बैंक रूस को सदस्य देशों के साथ निवेश और व्यापार के लिए एक अतिरिक्त संस्थागत मंच दे सकता है। यानी यह रूस के लिए सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि भूराजनीतिक महत्व वाला कदम भी हो सकता है।

क्या इससे SCO और मजबूत होगा?
अगर यह प्रस्ताव वास्तविक बैंक में बदलता है तो SCO का सहयोग केवल सुरक्षा और राजनीतिक मुद्दों तक सीमित नहीं रहेगा। साझा वित्तीय संस्था बनने से संगठन के सदस्य देशों के बीच व्यापार, निवेश और इंफ्रास्ट्रक्चर सहयोग बढ़ सकता है। यही इस प्रस्ताव का सबसे बड़ा संभावित असर होगा।

लेकिन सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
बैंक बनाने का ऐलान करना आसान है, लेकिन उसे जमीन पर उतारना काफी मुश्किल होगा।

सबसे पहले सदस्य देशों को इन मुद्दों पर सहमति बनानी होगी—

कितनी पूंजी होगी?

  • कौन कितना पैसा लगाएगा?
  • किसकी कितनी हिस्सेदारी होगी?
  • वोटिंग अधिकार कैसे मिलेंगे?
  • बैंक का मुख्यालय कहां होगा?
  • कर्ज किन प्रोजेक्ट्स को मिलेगा?
  • और किसी बड़े फैसले पर अंतिम अधिकार किसका होगा?

इन सवालों पर सहमति बनने के बाद ही SCO Bank का वास्तविक ढांचा तैयार हो पाएगा।

तो क्या SCO Bank बन चुका है?
नहीं। अभी इसे बना हुआ बैंक समझना सही नहीं होगा। पुतिन ने इसका प्रस्ताव रखा है और आगे सदस्य देशों के बीच बातचीत और सहमति की जरूरत होगी। अगर प्रस्ताव आगे बढ़ता है तो आने वाले समय में सबसे ज्यादा नजर भारत, चीन और रूस के योगदान, बैंक की पूंजी और वोटिंग व्यवस्था पर रहेगी।

SCO Bank का विचार सिर्फ एक नया बैंक बनाने की योजना नहीं है। इसके पीछे विकास परियोजनाओं के लिए फंड, सदस्य देशों के बीच व्यापार बढ़ाने और पश्चिमी वित्तीय ढांचे पर निर्भरता कम करने जैसे बड़े लक्ष्य हो सकते हैं। लेकिन अभी इसके बारे में सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि बैंक का अंतिम ढांचा, पूंजी और हिस्सेदारी तय नहीं हुई है। इसलिए फिलहाल इसे एक प्रस्तावित वित्तीय संस्था के रूप में ही देखना चाहिए।

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