शेयर बाजार में बुधवार को एक बार फिर तेज गिरावट देखने को मिली। शुरुआती कारोबार में सेंसेक्स करीब 800 अंक तक फिसल गया और निफ्टी 24,000 के नीचे चला गया। हालांकि कारोबार खत्म होने तक गिरावट कुछ संभली और सेंसेक्स 373.93 अंक गिरकर 76,570.35 पर, जबकि निफ्टी 141.35 अंक टूटकर 23,914.45 पर बंद हुआ।
इस गिरावट के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है- क्या बाजार फिर उसी रास्ते पर जा रहा है, जिस पर 2008 में गया था?
2008 में आखिर हुआ क्या था?
2008 का दौर सिर्फ शेयर बाजार की गिरावट नहीं था, बल्कि पूरी वैश्विक वित्तीय व्यवस्था गहरे संकट में फंस गई थी। भारतीय बाजार पर भी इसका जबरदस्त असर पड़ा और सेंसेक्स साल की शुरुआत के करीब 20,465 के स्तर से गिरकर साल के अंत तक लगभग 9,716 पर पहुंच गया था। यानी उस समय समस्या बाजार के अंदर और वैश्विक वित्तीय सिस्टम दोनों में गहरी थी।
इस बार कहानी थोड़ी अलग क्यों है?
2026 में बाजार पर दबाव की बड़ी वजह पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में उछाल और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी है। 2 सितंबर को ब्रेंट क्रूड करीब 96 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचा, जिससे भारत के लिए महंगे आयात और महंगाई की चिंता बढ़ी। यही वजह है कि मौजूदा गिरावट को सीधे 2008 के वित्तीय संकट से जोड़ना सही नहीं होगा।
18 साल के डेटा से क्या संकेत मिलता है?
पिछले 18 वर्षों में भारतीय बाजार ने कई बड़े झटके देखे हैं। 2008 के बाद कोविड जैसे दौर में भी बाजार में बेहद तेज गिरावट आई, लेकिन बाजार ने बाद में जोरदार वापसी की। इसलिए गिरावट अपने आप में 2008 की वापसी का संकेत नहीं है। असली सवाल यह है कि क्या बाजार की कमजोरी के पीछे कोई बड़ा वित्तीय या आर्थिक संकट बन रहा है।
फिर निवेशकों को किस बात पर नजर रखनी चाहिए?
* कच्चे तेल की कीमत कितनी देर तक ऊंची रहती है
* पश्चिम एशिया का तनाव कितना बढ़ता है
* अमेरिकी ब्याज दरों और बॉन्ड यील्ड का रुख क्या रहता है
* विदेशी निवेशकों की बिकवाली कितनी बढ़ती है
* भारतीय कंपनियों की कमाई और घरेलू अर्थव्यवस्था पर कितना असर पड़ता है
यानी बाजार लाल है, लेकिन अभी सिर्फ लाल निशान देखकर 2008 की घंटी बजाना जल्दबाजी होगी। असली तस्वीर इन आर्थिक संकेतकों से साफ होगी।
यह भी पढ़ें: Apple में बड़ा बदलाव! Tim Cook के बाद John Ternus बने नए CEO, पैकेज जानकर रह जाएंगे दंग