जिनेवा में आयोजित संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) के 63वें सत्र में राजस्थान समग्र कल्याण संस्थान (RSKS इंडिया) की डायरेक्टर पूनम शर्मा ने आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों के केंद्र में गरिमा, भागीदारी और समानता को रखने की जोरदार अपील की।
आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों के संदर्भ में असमानताओं से निपटने और उन्हें बढ़ावा देने से जुड़े पैनल को संबोधित करते हुए शर्मा ने कहा कि आज असमानता केवल आय या भौतिक संसाधनों की कमी तक सीमित नहीं है। यह उन लोगों से भी जुड़ी है जो अदृश्य हैं, जिनकी आवाज नहीं सुनी जाती या जो पहले से मिले अधिकारों का लाभ नहीं उठा पाते।
उन्होंने कहा, “आज असमानता सिर्फ इस बात से नहीं है कि किसके पास कम है, बल्कि यह भी है कि कौन अदृश्य, अनसुना रह जाता है और पहले से मिले अधिकारों का दावा नहीं कर पाता।”
शर्मा ने कहा कि संघर्ष, जलवायु संकट, भेदभाव, कर्ज और तकनीकी बदलाव पहले से मौजूद असमानताओं को और बढ़ा रहे हैं तथा बहिष्कार के नए रूप पैदा कर रहे हैं।
भारत की प्राचीन अवधारणा “सर्वे भवन्तु सुखिनः” का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि अगर विकास की प्रक्रिया में कुछ लोग पीछे छूट जाते हैं तो उसे सार्थक प्रगति नहीं माना जा सकता।
उन्होंने शिक्षा, आजीविका, सामाजिक सुरक्षा, सांस्कृतिक संरक्षण और लोगों की भागीदारी के माध्यम से विकास को गरिमा से जोड़ने में भारत के अनुभव को भी सामने रखा। विशेष रूप से आदिवासी समुदायों, अल्पसंख्यकों और अन्य वंचित समूहों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि जब समुदायों को केवल लाभ नहीं बल्कि विकास के प्रतिष्ठानों के रूप में देखा जाता है, तो समावेश ज्यादा मजबूत होता है।
उनके अनुसार, जब लोग अपनी संस्कृतियों की पहचान करने, समाधान तैयार करने और योजनाओं को लागू करने में भाग लेते हैं, तो विकास अधिक प्रभावी, टिकाऊ और समावेशी बनता है।
‘इक्वलिटी बाय डिजाइन’ का दिया प्रस्ताव
पूनम शर्मा ने वैश्विक समुदाय से “इक्वलिटी बाय डिजाइन” यानी “डिजाइन के स्तर पर ही समानता” का दृष्टिकोण जागरूकता की अपील की।
उन्होंने कहा कि जनजातियों और जनजातियों को कानून, बजट, तकनीक, सार्वजनिक सेवाएं और विकास कार्यक्रमों को तैयार करते समय शुरुआत से ही समानता और समावेशन को ध्यान में रखना चाहिए।
उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने तीन व्यावहारिक प्रस्ताव रखे:
1. स्थानीय समानता ऑडिट: विकास और सार्वजनिक सेवाओं से कौन लोग वंचित रह रहे हैं, इसकी पहचान समय पर रहने के लिए स्थानीय स्तर पर समानता ऑडिट।
2. समुदाय-नेतृत्व वाले ESCR इनोवेशन लैब्स: आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों से जुड़े व्यावहारिक समाधान तैयार करने और उनके परीक्षण करने के लिए समुदायों, नागरिक समाज और समुदायों के संयुक्त मंच।
3. वैश्विक OHCHR ज्ञान मंच: विभिन्न देशों और क्षेत्रों में सफल गर्भधारण, जमीनी स्तर के नवाचारों और अनुभवों को साझा करने के लिए वैश्विक ज्ञान मंच।
OHCHR की वित्तीय फाइलों पर भी ती आवाज
शर्मा ने आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों पर OHCHR के काम को प्रभावित करने वाली वित्तीय और तरलता संबंधी फाइलों की ओर भी ध्यान केंद्रित किया।
उन्होंने कहा कि सीमित निकायों का असर मानवाधिकारों की सुरक्षा पर नहीं पड़ना चाहिए। इसके लिए देशों, संयुक्त राष्ट्र, नागरिक समाज, शैक्षणिक समुदायों और स्थानीय समुदायों के बीच मजबूत साझेदारी, क्षेत्रीय सहयोग, नवाचार और ज्ञान साझा करने की जरूरत है।
अपने संबोधन के अंत में पूनम शर्मा ने वैश्विक समुदाय के सामने सवाल रखा:
“क्या हम बहिष्कार होने से पहले हर निर्णय में समानता को शामिल कर सकते हैं?”
उन्होंने इस विचार को आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों पर वैश्विक चर्चा में भारत के एक रचनात्मक योगदान के रूप में प्रस्तुत किया।
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