नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन शुक्रवार को नई दिल्ली में मुलाकात करने वाले हैं। यह बैठक BRICS शिखर सम्मेलन से पहले हो रही है। दोनों नेताओं की बातचीत में व्यापार और आर्थिक सहयोग अहम मुद्दों में शामिल रह सकते हैं। हालांकि, सुर्खियों में दिखने वाले बड़े व्यापारिक आंकड़ों के पीछे एक जटिल चुनौती भी है-भारत और रूस के बीच व्यापार को रूसी तेल पर निर्भरता से निकालकर ज्यादा व्यापक और संतुलित आर्थिक साझेदारी में बदलना।
इस मुलाकात का महत्व काफी ज्यादा है। भारत और रूस के बीच द्विपक्षीय व्यापार पारंपरिक स्तरों से बढ़कर अरबों डॉलर तक पहुंच चुका है, लेकिन यह अभी भी रूस के पक्ष में काफी ज्यादा झुका हुआ है। दूसरी ओर, दोनों देशों ने वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था भी तैयार की है, जिससे पश्चिमी वित्तीय प्रतिबंधों के बावजूद उनका बड़ा व्यापार प्रभावित नहीं हुआ है।
65.7 अरब डॉलर से 100 अरब डॉलर के लक्ष्य तक
विदेश मंत्रालय के अनुसार, वित्त वर्ष 2023-24 में भारत-रूस वस्तु व्यापार रिकॉर्ड 65.70 अरब डॉलर तक पहुंच गया। लेकिन इस आंकड़े में बड़ा असंतुलन दिखाई देता है। रूस को भारत का निर्यात केवल 4.26 अरब डॉलर रहा, जबकि रूस से भारत का आयात 61.44 अरब डॉलर था।
यूक्रेन युद्ध के बाद भारतीय रिफाइनरियों द्वारा रूसी कच्चे तेल की बड़े पैमाने पर खरीद के कारण यह अंतर और बढ़ गया।
ORF के एक विश्लेषण के अनुसार, वित्त वर्ष 2024-25 में दोनों देशों के बीच व्यापार कारोबार 68.7 अरब डॉलर तक पहुंच गया। इसमें रूस से भारत के आयात का करीब 80 फीसदी हिस्सा कच्चे तेल का था।
रूस भारत के लिए ऊर्जा का महत्वपूर्ण स्रोत बन गया है, वहीं पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के बीच भारत रूस के लिए एक बड़ा और महत्वपूर्ण बाजार बन चुका है।
हालांकि दोनों देश कई बार कह चुके हैं कि यह संबंध सिर्फ तेल आधारित नहीं रह सकता। 2024 में भारत-रूस वार्षिक शिखर बैठक के दौरान प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति पुतिन ने 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 100 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य तय किया था।
अब सवाल यह है कि इस अतिरिक्त 30 अरब डॉलर से ज्यादा के व्यापार को किस तरह हासिल किया जाएगा।
दोनों देशों के रोडमैप में टैरिफ और गैर-टैरिफ बाधाओं को कम करना, लॉजिस्टिक्स की समस्याएं दूर करना, कनेक्टिविटी बेहतर करना, भुगतान व्यवस्था आसान बनाना और बीमा व पुनर्बीमा से जुड़ी दिक्कतों का समाधान करना शामिल है।
सिर्फ व्यापार बढ़ाना ही काफी नहीं
भारत-रूस व्यापार के केंद्र में एक बुनियादी विरोधाभास है। दोनों देश व्यापार को काफी ज्यादा बढ़ाना चाहते हैं, लेकिन इसे टिकाऊ बनाने के लिए भारत को रूस को ज्यादा सामान और सेवाएं बेचनी होंगी।
भारत रूस को मुख्य रूप से फार्मास्यूटिकल्स, ऑर्गेनिक केमिकल्स, इलेक्ट्रिकल मशीनरी, मैकेनिकल उपकरण, लोहा और स्टील का निर्यात करता है।
वहीं रूस भारत को कच्चा तेल और पेट्रोलियम उत्पाद, उर्वरक, खनिज, कीमती पत्थर और धातुएं समेत कई अन्य वस्तुएं भेजता है।
नतीजा यह है कि भारत रूस से जितना खरीदता है, उसके मुकाबले काफी कम निर्यात करता है। इस व्यापार असंतुलन ने भुगतान व्यवस्था से जुड़ी एक बड़ी समस्या भी पैदा की है-रूस को भारत से मिलने वाली रुपये की रकम का इस्तेमाल कैसे किया जाए?
इसी वजह से दोनों देशों ने पिछले कुछ वर्षों में ऐसे भुगतान तंत्र विकसित किए हैं, जो डॉलर आधारित पारंपरिक बैंकिंग व्यवस्था पर निर्भरता कम करते हैं।
रुपये-रूबल भुगतान व्यवस्था
रूस का कहना है कि भारत-रूस के बीच होने वाले 96 फीसदी वाणिज्यिक लेनदेन अब राष्ट्रीय मुद्राओं में किए जा रहे हैं।
दिसंबर 2025 में भारत दौरे के दौरान राष्ट्रपति पुतिन ने भी कहा था कि कारोबारी सौदों में राष्ट्रीय मुद्राओं की हिस्सेदारी 96 फीसदी तक पहुंच गई है।
यह आंकड़ा बताता है कि दोनों देश डॉलर आधारित पारंपरिक वित्तीय प्रणाली से अपनी व्यापारिक गतिविधियों को अलग रखने की दिशा में काफी आगे बढ़ चुके हैं।
हाल ही में Sberbank के भारत प्रमुख इवान नोसोव ने Reuters को बताया कि भारत और रूस के बीच वित्तीय भुगतान में अब कोई बड़ी समस्या नहीं है। Reuters के अनुसार, करीब 22 रूसी और 17 भारतीय बैंक इस द्विपक्षीय भुगतान व्यवस्था में शामिल हैं और लगभग 90 फीसदी लेनदेन 10 मिनट के भीतर पूरे हो जाते हैं।
हालांकि मॉस्को इसे सीधे तौर पर डॉलर विरोधी अभियान के रूप में पेश करने से बच रहा है। BRICS शिखर सम्मेलन से पहले क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने कहा कि रूस 'डी-डॉलराइजेशन' की कोशिश नहीं कर रहा है और अलग-अलग स्वीकार्य भुगतान माध्यमों के लिए खुला है।
भारत के लिए भी उद्देश्य डॉलर को पूरी तरह छोड़ना नहीं है। असली लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि रूस और पश्चिम के बीच भू-राजनीतिक तनाव के कारण भारत का वैध व्यापार प्रभावित न हो।
रूस को भारत क्या ज्यादा बेच सकता है?
अगर भारत-रूस व्यापार को 2030 तक 100 अरब डॉलर के पार ले जाना है और साथ ही कच्चे तेल पर निर्भरता नहीं बढ़ानी है, तो भारत को रूसी बाजार में अपनी पहुंच काफी बढ़ानी होगी।
फार्मास्यूटिकल्स इसका एक बड़ा क्षेत्र हो सकता है। इसके अलावा कृषि उत्पाद, इंजीनियरिंग सामान, मशीनरी, केमिकल्स, इलेक्ट्रॉनिक्स और अन्य विनिर्मित उत्पादों के निर्यात की संभावनाएं भी हैं।
दोनों देशों के बीच संयुक्त उपक्रमों और लंबी अवधि के उर्वरक समझौतों पर भी चर्चा हुई है।
आर्थिक रोडमैप में कनेक्टिविटी और भुगतान व्यवस्था को बेहतर बनाने के साथ-साथ दोनों देशों की राष्ट्रीय भुगतान और वित्तीय संदेश प्रणालियों के बीच संपर्क बढ़ाने पर भी जोर दिया गया है।
अगला बड़ा अवसर निवेश हो सकता है
भारत-रूस आर्थिक संबंधों का अगला चरण सिर्फ खरीद-बिक्री तक सीमित नहीं रह सकता। निवेश और संयुक्त उत्पादन इसमें बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। रूसी कंपनियों की भारत में तेल-गैस, पेट्रोकेमिकल्स, बैंकिंग, रेलवे और स्टील जैसे क्षेत्रों में महत्वपूर्ण मौजूदगी है।
वहीं भारतीय कंपनियों ने रूस के तेल-गैस और फार्मास्यूटिकल्स क्षेत्रों में निवेश किया है। इसलिए अगला चरण खरीदार और विक्रेता के संबंध से आगे बढ़कर उत्पादन, निवेश और तकनीकी साझेदारी का हो सकता है।
BRICS के लिहाज से भी अहम मुलाकात
मोदी-पुतिन मुलाकात ऐसे समय हो रही है जब भारत नई दिल्ली में 2026 BRICS शिखर सम्मेलन की मेजबानी कर रहा है।
भारत और रूस के बीच चर्चा किए जा रहे आर्थिक मुद्दे BRICS के व्यापक एजेंडे से भी जुड़े हैं। इनमें वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था, आर्थिक सहयोग, निवेश, कनेक्टिविटी और वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में उभरती अर्थव्यवस्थाओं की बड़ी भूमिका जैसे मुद्दे शामिल हैं।
BRICS अब अपने शुरुआती पांच सदस्यों से काफी आगे बढ़ चुका है। इसमें मिस्र, इथियोपिया, ईरान, इंडोनेशिया, सऊदी अरब और UAE जैसे देश शामिल हो चुके हैं।
हालांकि भारत के लिए BRICS का मतलब केवल पश्चिम को चुनौती देना नहीं है। BRICS का आधिकारिक ढांचा राजनीति एवं सुरक्षा, अर्थव्यवस्था एवं वित्त और सांस्कृतिक व जन-से-जन संपर्क जैसे तीन व्यापक क्षेत्रों में सहयोग पर जोर देता है।
रूस भी BRICS को भारत के साथ अपने आर्थिक संबंधों को आगे बढ़ाने के एक अतिरिक्त मंच के रूप में देखता है।
पुतिन पहले भी लॉजिस्टिक्स, वित्तपोषण और लेनदेन प्रक्रिया को भारत-रूस व्यापार की बड़ी बाधाओं में शामिल कर चुके हैं। उन्होंने व्यापार असंतुलन दूर करने और आर्थिक संबंधों को विस्तार देने के लिए BRICS के माध्यम से संभावनाएं तलाशने की जरूरत पर जोर दिया है।
अगले 30 अरब डॉलर का सवाल
भारत और रूस ने प्रतिबंधों और पारंपरिक भुगतान चैनलों पर दबाव के बावजूद व्यापार जारी रखने की तत्काल चुनौती काफी हद तक हल कर ली है। अब इससे भी बड़ा सवाल है-अगले 30 अरब डॉलर से ज्यादा का व्यापार आखिर किस रूप में होगा?
रक्षा सहयोग, परमाणु ऊर्जा, उर्वरक, फार्मास्यूटिकल्स, तकनीक, महत्वपूर्ण खनिज, निवेश और कनेक्टिविटी इस नए व्यापार मॉडल का हिस्सा बन सकते हैं।
मोदी-पुतिन वार्ता में Su-57 पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान कार्यक्रम और नागरिक परमाणु परियोजनाओं जैसे रणनीतिक मुद्दों पर भी चर्चा होने की उम्मीद है।
रूस के लिए भारत एक विशाल उपभोक्ता बाजार, निवेश का स्रोत और पश्चिमी देशों से बाहर एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार है। वहीं भारत के लिए रूस ऊर्जा, रक्षा उपकरण, परमाणु तकनीक और कई महत्वपूर्ण वस्तुओं का अहम स्रोत बना हुआ है।
लेकिन दोनों देशों का रिश्ता बदल रहा है
पुराना भारत-रूस व्यापार मॉडल हथियारों, तेल और सरकार-से-सरकार समझौतों पर आधारित था। अब नए मॉडल में मैन्युफैक्चरिंग, निवेश, तकनीक, वित्तीय कनेक्टिविटी और निजी क्षेत्र की भागीदारी महत्वपूर्ण होगी।
अगर प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति पुतिन दिल्ली में इस बदलाव को आगे बढ़ाने में सफल रहते हैं, तो 2030 तक 100 अरब डॉलर का व्यापार लक्ष्य महज कूटनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं, बल्कि वास्तविक आर्थिक रोडमैप बन सकता है।
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