Bernie Sanders on Elon Musk: अमेरिका में मध्यावधि चुनावों को लेकर सियासी घमासान तेज होता दिख रहा है। अमेरिकी सीनेटर बर्नी सैंडर्स ने अरबपति कारोबारी और स्पेसएक्स के सीईओ एलन मस्क पर रिपब्लिकन पार्टी को समर्थन देने के लिए भारी रकम खर्च करने का आरोप लगाते हुए निशाना साधा है। सैंडर्स ने सवाल उठाया कि क्या अमेरिका की राजनीति में आम लोगों की आवाज से ज्यादा ताकत अब अरबपतियों के पैसे की हो गई है? उन्होंने मस्क के राजनीतिक खर्च को लेकर ‘कुलीनतंत्र’ यानी अमीरों के हाथों में सत्ता के केंद्रीकरण के खिलाफ आवाज उठाई।

ट्रंप की जीत के बाद मस्क की दौलत बढ़ी
बर्नी सैंडर्स ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर दावा किया कि डोनाल्ड ट्रंप को चुनाव जिताने के लिए एलन मस्क ने 290 मिलियन डॉलर खर्च किए थे। उनके मुताबिक, ट्रंप की जीत के बाद मस्क की संपत्ति में भारी उछाल आया और अब वह अमेरिकी कांग्रेस में रिपब्लिकन पार्टी का नियंत्रण बनाए रखने के लिए कथित तौर पर 366 मिलियन डॉलर खर्च कर रहे हैं। सैंडर्स ने अपनी पोस्ट में लिखा, 'मस्क को रोको, कुलीनतंत्र को रोको।' उन्होंने अरबपतियों की बढ़ती राजनीतिक ताकत पर सवाल उठाते हुए कहा कि लोकतंत्र में किसी एक धनी व्यक्ति का प्रभाव इतना अधिक नहीं होना चाहिए कि वह चुनावी राजनीति की दिशा को प्रभावित कर सके।

हालांकि, मस्क के 366 मिलियन डॉलर खर्च करने का आंकड़ा सैंडर्स के दावे के तौर पर सामने आया है। द न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, मस्क ने जुलाई से अब तक 276 मिलियन डॉलर खर्च किए हैं, जिनमें रिपब्लिकन सीनेट उम्मीदवारों का समर्थन करने वाले एक सुपर PAC को दिए गए 158 मिलियन डॉलर भी शामिल हैं।

रिपब्लिकन पार्टी ने क्या कहा?
मस्क के राजनीतिक खर्च का बचाव करते हुए America PAC के प्रवक्ता एंड्रयू रोमियो ने द न्यूयॉर्क टाइम्स से कहा कि इन निवेशों से रिपब्लिकन पार्टी को अपना संदेश मतदाताओं तक पहुंचाने में मदद मिली है। उनके मुताबिक, इससे रिपब्लिकन उम्मीदवारों को चुनाव में बेहतर मुकाबला करने का अवसर मिलेगा। इस पूरे विवाद के केंद्र में यह सवाल है कि अमेरिकी चुनावों में बड़े दानदाताओं की आर्थिक ताकत उम्मीदवारों और राजनीतिक दलों की रणनीति को किस हद तक प्रभावित कर सकती है।

भारत में भी मस्क ने लगाया था ‘अमीरों के दबदबे’ का आरोप
एलन मस्क ने भारत में अपनी सैटेलाइट इंटरनेट सेवा स्टारलिंक की एंट्री को लेकर भी प्रभावशाली कारोबारी हितों पर सवाल उठाए थे। X पर एक चर्चा का जवाब देते हुए उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ ताकतवर कारोबारी अपने बाजार पर दबदबा बनाए रखने के लिए स्टारलिंक के रास्ते में बाधा डाल रहे हैं। मस्क ने इसे भारतीय लोगों के हितों के खिलाफ बताते हुए बाजार में एकाधिकार कायम रखने की कोशिश करार दिया। हालांकि, उन्होंने अपने बयान में संबंधित कारोबारी समूहों के नाम स्पष्ट रूप से नहीं बताए।

भारत सरकार का क्या है रुख?
भारत के संचार मंत्रालय ने कहा है कि सैटेलाइट संचार सेवाओं समेत दूरसंचार सेवाओं के लिए देश में निष्पक्ष और गैर-भेदभावपूर्ण प्राधिकरण व्यवस्था लागू है। मंत्रालय के अनुसार, सभी लाइसेंसधारकों को सुरक्षा से जुड़ी निर्धारित शर्तों का पालन करना होगा।

सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि गैर-भूस्थिर उपग्रह कक्षा (NGSO) तकनीक पर आधारित मोबाइल सैटेलाइट संचार सेवाओं के तीन वैश्विक ऑपरेटरों को लाइसेंस दिए गए हैं और उनकी सुरक्षा संबंधी जांच जारी है। आवश्यक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही स्पेक्ट्रम आवंटन की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है।

मस्क के बयानों और राजनीतिक खर्च पर क्यों उठ रहे सवाल?
अमेरिका में मस्क के चुनावी खर्च और भारत में उनके कारोबारी आरोपों ने आर्थिक ताकत तथा राजनीतिक और बाजार संबंधी प्रभाव को लेकर बहस को जन्म दिया है। सैंडर्स का तर्क है कि जब किसी अरबपति के पास चुनावों में सैकड़ों मिलियन डॉलर खर्च करने की क्षमता होती है, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था में आम नागरिकों के प्रभाव को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।

दूसरी ओर, मस्क के समर्थक राजनीतिक योगदान को अपनी पसंद के उम्मीदवारों और नीतियों का समर्थन करने का माध्यम मानते हैं। ऐसे में बहस केवल मस्क तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भी है कि लोकतंत्र में बड़े आर्थिक हितों और आम मतदाताओं की आवाज के बीच संतुलन कैसे कायम रखा जाए। 

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