Saiyadraja Vidhan Sabha Seat 2027: चंदौली की सैयदराजा विधानसभा सीट पर 2027 के चुनाव को लेकर माहौल धीरे-धीरे गर्म होने लगा है,पूर्वांचल की राजनीति में अपनी अलग पहचान रखने वाली इस सीट पर इस बार भी जनता के मुद्दे ही चुनाव की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

यूपी की कुल 403 असेंबली सीटों में से एक सैयदराजा विधामसभा 2012 में परिसीमन के बाद अस्तित्व में आई।इसके पहले इस सीट का नाम हुआ करता था-चंदौली सदर। एक समय पर यहां से यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री कमलापति त्रिपाठी विधायक रहे थे। फिलहाल यहां से पूर्वांचल के चर्चित भाजपा नेता सुशील कुमार सिंह बीजेपी से लगातार 2017 से विधायक हैं और तीसरी बार पूरे दमखम के साथ ताल ठोकने के तैयारी में हैं

बाहुबलियों का गढ़

2012 में अस्तित्व आने के बाद से ही सैयदराजा विधानसभा सभा सीट बाहुबलियों के टक्कर की गवाह रही। इस सीट पर पहला दिलचस्प मुकाबला माफिया डॉन बृजेश सिंह और निर्दलीय प्रत्याशी मनोज कुमार सिंह उर्फ डब्लू के बीच हुआ था। जानकार बताते हैं कि इस चुनाव ने पूरे क्षेत्र की आबो-हवा बदल दी थी।गतिशील मानव समाज पार्टी के झंडे तले चुनाव लड़ रहे बाहुबली बृजेश सिंह ने जेल में रहते हुए भी पूरी तकात के साथ अपना जलवा दिखाया था वहीं निर्दलीय प्रत्याशी मनोज कुमार सिंह उर्फ डब्लू ने भी जमकर प्रचार-प्रसार किया था और जनता का समर्थन पाने में कामयाब भी रहे। मनोज कुमार सिंह उर्फ डब्लू ने कुल 51,499 मत प्राप्त करते हुए बृजेश सिंह को लगभग 2,016 वोटों के अंतर से हराया था।

2017 से सुशील कुमार सिंह विधायक

पूर्वांचल के चंदौली जिले में स्थित इस विधानसभा का एक बड़ा हिस्सा बिहार सीमा से सटा हुआ है, बाहुबल और राजनीतिक वर्चस्व की गवाह रही इस सीट से फिलहाल पूर्वांचल के चर्चित चेहरे ब्रजेश सिंह के भतीजे और बीजेपी नेता सुशील कुमार सिंह विधायक हैं। उन्होंने 2017 में चन्दौली,बनारस समेत पूरे प्रदेश में अपनी एक अलग हनक रखने वाले बसपा के प्रत्याशी श्याम नारायण सिंह उर्फ विनीत सिंह को 14,494 वोटों से पटखनी दी थी। 2022 के चुनाव में जनता का आशीर्वाद फिर से सुशील कुमार सिंह को मिला इस बार उन्होनें सपा के उम्मीदवार मनोज कुमार सिंह उर्फ डब्लू को 10,917 वोट के अंतर से हराया।

किसी को दिखा विकास, किसी ने कहा- अभी बहुत कुछ बाकी

अब बात कर लेतें हैं इस विधानसभा में हुए विकास के बारे में तो,जब हमने यहां के अलग-अलग इलाके के लोगों से बातचीत किया कि पिछले करीब पांच साल में उन्हें क्या बदला नजर आया, तो जवाब एक जैसा नहीं मिला।किसी ने सड़क, बिजली और राशन जैसी सुविधाओं में सुधार की बात कही तो किसी ने साफ कहा कि जिस विकास की चर्चा होती है, वह उनके इलाके तक नहीं पहुंचा। रोजगार, स्वास्थ्य, शिक्षा, सफाई और किसानों की समस्याएं भी बातचीत में बार-बार सामने आईं। कुछ लोगों के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में सड़क, बिजली, सफाई और शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाओं में सुधार देखने को मिला है।उन्होंने स्थानीय विधायक के कामकाज को भी संतोषजनक बताया।

एक वर्ग का दावा- विकास कागज पर ज्यादा, जमीन पर कम

दूसरी तरफ कुछ लोगों का कहना था कि जिन परियोजनाओं को विकास के तौर पर बताया जाता है, उनका असर हर इलाके में नजर नहीं आता।उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ चुनिंदा जगहों पर ही काम दिखाई देता है, जबकि कई इलाकों की पुरानी समस्याएं अब भी बनी हुई हैं। इलाके में बड़े उद्योग या कारखाने की जरूरत है, ताकि स्थानीय युवाओं को अपने ही क्षेत्र में रोजगार मिल सके।यानी विकास के कामों से संतुष्टि होने के बावजूद रोजगार को लेकर उम्मीद अभी बाकी है।

राशन और कानून व्यवस्था से कुछ लोग संतुष्ट

हर मतदाता सरकार के काम से नाराज हो, ऐसा भी नहीं है।बहुत सारे लोगों का कहना था कि गरीब परिवारों को राशन मिल रहा है और कानून व्यवस्था में पहले की तुलना में सुधार महसूस होता है। व्यापारियों के लिहाज से भी उन्होंने सुरक्षा के माहौल को बेहतर बताया।हालांकि, उनके पास भी स्थानीय स्तर की शिकायत है। उनका कहना है कि नई विकसित हो रही कॉलोनियों में सड़क और दूसरी बुनियादी सुविधाएं अभी पर्याप्त नहीं हैं। ऐसे इलाकों पर स्थानीय जनप्रतिनिधियों को ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है।

सैयदराजा में इस बार चुनावी मुद्दे क्या बनेंगे?

अभी की बातचीत से सैयदराजा का मूड किसी एक दिशा में जाता हुआ नहीं दिखता। एक तरफ ऐसे लोग हैं जिन्हें सड़क, बिजली, राशन और कानून व्यवस्था में सुधार नजर आता है। दूसरी तरफ कुछ मतदाता रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सफाई, जलभराव और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों को लेकर सवाल उठा रहे हैं।इन बातचीत से फिलहाल किसी पार्टी या उम्मीदवार के पक्ष में चुनावी रुझान तय करना जल्दबाजी होगी। लेकिन इतना जरूर साफ है कि रोजगार और स्थानीय सुविधाएं 2027 के चुनाव में चर्चा के बड़े मुद्दे बन सकती हैं।सैयदराजा की राजनीति में बाहुबल और पुराने चुनावी समीकरण भले ही चर्चा में रहते हों, लेकिन जमीन पर मतदाता जिन सवालों को उठा रहे हैं, वे काफी हद तक रोजमर्रा की जरूरतों से जुड़े हैं। चुनाव नजदीक आने के साथ यह देखना दिलचस्प होगा कि राजनीतिक दल इन मुद्दों को अपने एजेंडे में किस तरह जगह देते हैं।