राजस्थान में नगरीय निकाय चुनाव के बाद अब मेयर-डिप्टी मेयर, चेयरमैन-वाइस चेयरमैन के चुनाव की प्रक्रिया शुरू होने वाली है। नामांकन दाखिल करने की समय सीमा खत्म होने में कुछ ही घंटे बाकी हैं, लेकिन उससे पहले ही अधिकांश निकायों में बोर्ड गठन को लेकर सियासी गतिविधियां तेज हो गई हैं। चुनाव परिणामों में किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने के कारण कई जगह निर्दलीय पार्षद निर्णायक स्थिति में पहुंच गए हैं। खास तौर पर मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के गृह जिले भरतपुर के नगर निगम में निर्दलीय पार्षदों ने ऐसा प्रदर्शन किया है कि वे अपने दम पर मेयर और डिप्टी मेयर चुनने की स्थिति में हैं। यहां किसी बड़े दल के समर्थन के बिना भी बोर्ड गठन का रास्ता साफ है।
309 निकायों में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी
राजस्थान के 309 नगरीय निकायों में हुए चुनाव में बीजेपी सबसे अधिक सीटें जीतकर सबसे बड़े राजनीतिक दल के रूप में सामने आई है। इन चुनावों में 10 नगर निगम, 47 नगर परिषद और 252 नगरपालिकाएं शामिल थीं। हालांकि, कई निकायों में बीजेपी और कांग्रेस दोनों बहुमत के आंकड़े से दूर रह गईं। राज्य के कुल 10,245 वार्डों में से 10,235 वार्डों के परिणाम घोषित किए जा चुके हैं। घोषित परिणामों के मुताबिक बीजेपी के खाते में 4,179 वार्ड आए हैं, जबकि कांग्रेस ने 3,613 सीटों पर जीत दर्ज की है। निर्दलीय उम्मीदवारों ने भी 2,273 वार्ड अपने नाम किए हैं। इस तरह घोषित परिणामों में निर्दलीयों की हिस्सेदारी करीब 22.2 फीसदी बैठती है। सीटों के लिहाज से वे बीजेपी और कांग्रेस के बाद तीसरी बड़ी ताकत बनकर उभरे हैं।
वोट शेयर में भी निर्दलीयों की मजबूत मौजूदगी
मतदान के आंकड़ों पर नजर डालें तो करीब 1.06 करोड़ वोट डाले गए। इनमें बीजेपी को लगभग 37.35 लाख वोट मिले, जबकि कांग्रेस के खाते में करीब 36.35 लाख वोट आए। निर्दलीय उम्मीदवारों को लगभग 29.06 लाख मत प्राप्त हुए। निर्दलीयों का वोट शेयर करीब 27.38 फीसदी रहा। वहीं बीजेपी और कांग्रेस के बीच कुल वोटों का अंतर लगभग 99,615 ही रहा। ऐसे में निर्दलीय उम्मीदवारों को मिला बड़ा वोट आधार नगरीय निकायों के बोर्ड गठन के समीकरणों को प्रभावित करता दिखाई दे रहा है।
सिर्फ 131 निकायों में बीजेपी-कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत
बोर्ड गठन के लिहाज से बीजेपी को 85 निकायों में स्पष्ट बहुमत मिला है। कांग्रेस 46 निकायों में बहुमत के आंकड़े को पार कर सकी है। दोनों प्रमुख दलों को मिलाकर भी ऐसे निकायों की संख्या 131 ही है, जहां उन्हें बोर्ड बनाने के लिए दूसरे पार्षदों पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं है। बाकी करीब 178 निकायों में बोर्ड गठन के लिए जोड़-तोड़ और समर्थन का गणित महत्वपूर्ण हो गया है। इनमें निर्दलीय और दूसरे दलों से जुड़े पार्षद कई जगह निर्णायक भूमिका में हैं।
भरतपुर में निर्दलीयों के पास अपने दम पर बहुमत
भरतपुर नगर निगम का चुनाव परिणाम इस पूरे समीकरण का सबसे अहम उदाहरण है। 65 सदस्यीय निगम में बहुमत के लिए 33 पार्षदों की जरूरत है, जबकि निर्दलीय उम्मीदवारों ने 36 सीटों पर जीत दर्ज की है। बीजेपी को यहां 20 और कांग्रेस को 7 सीटें मिली हैं। इस आंकड़े के आधार पर निर्दलीय पार्षद बिना किसी राजनीतिक दल के समर्थन के अपना बोर्ड बनाने की स्थिति में हैं। ऐसे में मेयर और डिप्टी मेयर के चुनाव में उनकी भूमिका सबसे महत्वपूर्ण रहेगी।
हनुमानगढ़ में भी निर्दलीयों का दबदबा
हनुमानगढ़ नगर परिषद में भी कुछ ऐसा ही परिणाम सामने आया है। 60 सदस्यीय परिषद में बहुमत का आंकड़ा 31 है और निर्दलीयों ने 32 सीटें जीत ली हैं। यहां बीजेपी को 15 और कांग्रेस को 10 सीटें मिली हैं, जबकि सीपीएम के खाते में एक सीट गई है। यानी हनुमानगढ़ में भी निर्दलीय पार्षद अपने दम पर बोर्ड बनाने के लिए जरूरी संख्या हासिल कर चुके हैं।
पाली, दौसा और अलवर में भी समर्थन जरूरी
कई अन्य प्रमुख निकायों में भी बोर्ड गठन का फैसला निर्दलीय पार्षदों के रुख पर निर्भर करेगा। पाली में कांग्रेस के पास 29, बीजेपी के पास 21 और निर्दलीयों के पास 15 सीटें हैं। बहुमत के लिए 33 पार्षदों की जरूरत है, इसलिए कांग्रेस को बोर्ड बनाने के लिए कम से कम चार अतिरिक्त पार्षदों के समर्थन की आवश्यकता होगी। दौसा में कांग्रेस ने 24 सीटें जीती हैं, जबकि बीजेपी के खाते में 17 और निर्दलीयों के पास 14 सीटें हैं। यहां बहुमत तक पहुंचने के लिए कांग्रेस को पांच पार्षदों के समर्थन की जरूरत होगी। अलवर में बीजेपी 28 सीटों के साथ आगे है। कांग्रेस को 23 और निर्दलीयों को 14 सीटें मिली हैं। यहां भी बहुमत का आंकड़ा हासिल करने के लिए अतिरिक्त समर्थन जरूरी है।
कई निकायों में निर्दलीयों पर टिकी निगाहें
जोधपुर, अजमेर, खाटूश्यामजी, डीडवाना, पोखरण और सालूम्बर सहित कई निकायों में भी निर्दलीय पार्षदों की संख्या इतनी है कि वे बोर्ड गठन के समीकरण को प्रभावित कर सकते हैं। चुनाव परिणाम सामने आने के बाद अब राजनीतिक दलों की नजर सिर्फ अपनी सीटों पर नहीं, बल्कि निर्दलीय पार्षदों के रुख पर भी है। आने वाले समय में किस दल को कितने पार्षदों का समर्थन मिलता है, इससे मेयर, डिप्टी मेयर, चेयरमैन और वाइस चेयरमैन के चुनाव के नतीजे तय होंगे। राजस्थान के इन निकाय चुनावों का एक अहम पहलू यह रहा कि बीजेपी सबसे ज्यादा सीटें जीतने के बावजूद हर निकाय में अकेले बोर्ड बनाने की स्थिति में नहीं है। कांग्रेस की स्थिति भी कई जगह ऐसी ही है। दूसरी ओर, निर्दलीयों ने बड़ी संख्या में सीटें जीतकर कई निकायों में अपने समर्थन को निर्णायक बना दिया है। इसलिए अब निकाय चुनाव की तस्वीर सिर्फ बीजेपी बनाम कांग्रेस तक सीमित नहीं रह गई है। कई नगर निगम, नगर परिषद और नगरपालिकाओं में अगला बोर्ड किसका होगा, इसका फैसला उन पार्षदों के रुख से होगा जो किसी बड़े दल के टिकट पर चुनाव नहीं जीते हैं।