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'मुसलमान आतंकवादी नहीं हैं,बल्कि...', स्वतंत्रता दिवस समारोह में मौलाना अरशद मदनी का बड़ा बयान
New Delhi: दारुल उलूम देवबंद में आयोजित स्वतंत्रता दिवस समारोह को संबोधित करते हुए जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने देश की आजादी, लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता को भारत की महत्वपूर्ण उपलब्धियां बताते हुए सांप्रदायिकता और नफरत की राजनीति पर चिंता जताई।
New Delhi: दारुल उलूम देवबंद में आयोजित स्वतंत्रता दिवस समारोह को संबोधित करते हुए जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने देश की आजादी, लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता को भारत की महत्वपूर्ण उपलब्धियां बताते हुए सांप्रदायिकता और नफरत की राजनीति पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि मुसलमानों को आतंकवादी बताना न केवल गलत है, बल्कि इससे समाज में विभाजन और वैमनस्य बढ़ता है।
आजादी में उलेमा और मुसलमानों की भूमिका
मौलाना मदनी ने कहा कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास दारुल उलूम देवबंद, उलेमा, मदरसों और मुसलमानों की कुर्बानियों के उल्लेख के बिना अधूरा रहेगा। उन्होंने कहा कि 1857 के विद्रोह के बाद 1866 में दारुल उलूम देवबंद की स्थापना ऐसे लोगों को तैयार करने के उद्देश्य से हुई, जो अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष करें।
उन्होंने रेशमी रूमाल आंदोलन और माल्टा की कैद को स्वतंत्रता आंदोलन की महत्वपूर्ण घटनाएं बताते हुए शेखुल हिंद मौलाना महमूद हसन देवबंदी और मौलाना हुसैन अहमद मदनी सहित स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान को याद किया।
सांप्रदायिकता पर तीखा हमला
मदनी ने कहा कि आज कुछ ताकतों द्वारा मुसलमानों और मदरसों से देशभक्ति का प्रमाण मांगा जाता है, जबकि स्वतंत्रता आंदोलन में उनके योगदान को इतिहास का हिस्सा माना जाना चाहिए। उन्होंने सांप्रदायिक शक्तियों से अपने वैचारिक अतीत को इतिहास के आईने में देखने की अपील की।
उन्होंने कहा कि पहले भी मुसलमान सामाजिक, शैक्षिक और राजनीतिक नुकसान तथा सांप्रदायिक दंगों का सामना करते रहे हैं, लेकिन वर्तमान दौर में उनके अनुसार अंतर यह है कि अब इस्लाम को भी निशाना बनाया जा रहा है।
धर्मनिरपेक्षता को बचाने की अपील
मौलाना मदनी ने कहा कि भारत की पहचान उसकी विविधता और धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक व्यवस्था से है। उन्होंने काबुल की निर्वासित सरकार में हिंदू राजा महेंद्र प्रताप को राष्ट्रपति बनाए जाने का उदाहरण देते हुए कहा कि स्वतंत्रता से पहले ही भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े लोगों ने सांप्रदायिक सद्भाव का संदेश दिया था। उन्होंने संविधान से 'सेक्युलर' शब्द हटाने की मांगों पर भी चिंता जताई।
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अंत में उन्होंने कहा कि कठिन परिस्थितियों के बावजूद इस्लाम और मुसलमानों का अस्तित्व कायम रहा है। उन्होंने मशहूर पंक्तियों के साथ अपनी बात समाप्त की 'कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी, सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-जमाना हमारा।'
Written By: एम अतहर उद्दीन मुन्ने भारती
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