Vishwa Adivasi Diwas: दुनियाभर में आदिवासी समुदाय अपनी विशिष्ट जीवनशैली, खानपान, भाषा, पहनावा और धार्मिक परंपराओं के लिए जाना जाता है। प्रकृति के सबसे करीब रहने वाले इस समुदाय ने पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में अतुलनीय योगदान दिया है। हालांकि, मुख्यधारा से दूर रहने और आधुनिकता के बढ़ते दबाव के कारण आदिवासी समाज लंबे समय से सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक चुनौतियों से जूझ रहा है। इन्हीं समस्याओं की ओर वैश्विक ध्यान आकर्षित करने और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए प्रतिवर्ष 9 अगस्त को अंतर्राष्ट्रीय आदिवासी दिवस (International Day of the World's Indigenous Peoples) मनाया जाता है।

9 अगस्त और संयुक्त राष्ट्र की भूमिका
विश्व स्तर पर आदिवासी समुदायों के अधिकारों को मान्यता देने की दिशा में संयुक्त राष्ट्र (UN) की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने वर्ष 1994 को 'अंतर्राष्ट्रीय आदिवासी वर्ष' घोषित किया था। दुनिया भर के लगभग 22 प्रतिशत भूभाग पर निवास करने वाले आदिवासी समुदायों की कई भाषाएं और परंपराएं आज विलुप्ति के कगार पर हैं।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, वर्ष 2016 तक लगभग 2,680 जनजातीय भाषाएं लुप्त होने की स्थिति में पहुंच गई थीं। भाषाओं और सांस्कृतिक धरोहर के इसी संकट को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र ने 2019 में आदिवासी भाषाओं को बचाने और उनके संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए विशेष अभियान चलाए।

कोलंबस दिवस से जुड़ा विरोध और इतिहास
आदिवासी दिवस के इतिहास की जड़ें अमेरिका में मनाए जाने वाले 'कोलंबस दिवस' (12 अक्टूबर) के विरोध से भी जुड़ी हैं। अमेरिका के मूल निवासी समुदायों का मानना था कि कोलंबस के आगमन के बाद स्थापित हुई उपनिवेशवादी व्यवस्था ने उनके इतिहास, अधिकारों और अस्तित्व को भारी नुकसान पहुंचाया। इसके विरोध में मूल निवासियों ने कोलंबस दिवस के स्थान पर 'आदिवासी दिवस' मनाने की मांग रखी। इसी संदर्भ में वर्ष 1977 में जिनेवा में एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया, जिसमें आदिवासी अधिकारों और पहचान से जुड़े मुद्दों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रमुखता से उठाया गया। इसके बाद के दशकों में इस आंदोलन ने वैश्विक रूप लिया।

भारत में आदिवासी समुदाय और उनका फैलाव
भारत में जनजातीय आबादी का एक बड़ा हिस्सा निवास करता है। देश के विभिन्न राज्यों में कई समृद्ध और विविधतापूर्ण आदिवासी समुदाय रहते हैं।
झारखंड: संथाल, मुंडा, उरांव, हो, खड़िया, बिरहोर और पहाड़िया।
मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़: गोंड, भील, बैगा, सहरिया और कोरकू।
अन्य राज्य: गोंड समुदाय मध्य प्रदेश के अलावा महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, बिहार, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और उत्तर प्रदेश में भी फैला है। इसके अलावा चेरो, खोंड, लोहरा और बंजारा जैसी जनजातियां अपनी परंपराओं को सहेजे हुए हैं।

दिवस मनाने का मुख्य उद्देश्य
अधिकारों की रक्षा: शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और प्राकृतिक संसाधनों (जल, जंगल, जमीन) पर आदिवासियों के अधिकारों के प्रति सरकारों और समाज को जागरूक करना।
संस्कृति और भाषा संरक्षण: विलुप्त होती जनजातीय भाषाओं, लोक कलाओं और धार्मिक मान्यताओं का संवर्धन करना।
पर्यावरण एवं सतत विकास: यह संदेश देना कि समावेशी विकास के साथ-साथ प्रकृति के सच्चे रक्षकों की पहचान और परंपराओं को सुरक्षित रखना बेहद अनिवार्य है। 

Written by Shailesh Yadav