इम्तियाज अली की फिल्मों की एक खास पहचान रही है। वे प्रेम को सिर्फ रिश्तों के रूप में नहीं, बल्कि एक भाव, एक तलाश और एक अधूरेपन की तरह दिखाते हैं। अक्सर उनकी फिल्मों को रिलीज़ के समय उतना प्यार नहीं मिलता जितना सालों बाद मिलता है। लेकिन उनकी नई फिल्म ऐसी है जिसे समझने के लिए शायद वक्त का इंतजार नहीं करना पड़ेगा। यह कहानी प्रेम के उस रूप को सामने लाती है जो उम्र, दूरी और सरहदों से कहीं बड़ा है।
क्या है कहानी
फिल्म का केंद्र एक 95 वर्षीय बुज़ुर्ग हैं, जिनका किरदार नसीरुद्दीन शाह ने निभाया है। गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं और याददाश्त की उलझनों के बीच उनकी एक ही इच्छा है पाकिस्तान के सरगोधा पहुंचना। उनकी बातें परिवार के लोगों को समझ नहीं आतीं, लेकिन उनके भीतर कोई ऐसी अधूरी कहानी है जो उन्हें चैन से जीने भी नहीं दे रही और जाने भी नहीं दे रही। उनका पोता, जिसका किरदार दिलजीत दोसांझ ने निभाया है, विदेश से लौटकर दादा की इस बेचैनी की वजह तलाशने की कोशिश करता है। इसी सफर के दौरान एक ऐसी कहानी सामने आती है जो अतीत, बंटवारे और प्रेम के गहरे रिश्ते को जोड़ती है। फिल्म का असली रहस्य और भावनात्मक असर जानने के लिए इसे बड़े पर्दे पर देखना बेहतर होगा।
कैसी है फिल्म?
यह पूरी तरह इम्तियाज अली की शैली की फिल्म है। यहां प्रेम को किसी युवा जोड़े की कहानी के रूप में नहीं, बल्कि जीवन के अंतिम पड़ाव पर खड़े एक इंसान की नजर से देखा गया है। यही बात इसे अलग और यादगार बनाती है। फिल्म धीरे-धीरे अपनी परतें खोलती है। यह तेज रफ्तार मनोरंजन नहीं, बल्कि एक भावनात्मक यात्रा है। कहानी वर्तमान और अतीत के बीच सहजता से चलती है और कई दृश्य बेहद खूबसूरती से दोनों समय रेखाओं को जोड़ते हैं। बंटवारे का दर्द भी फिल्म का महत्वपूर्ण हिस्सा है। कई दृश्य ऐसे हैं जो दिल को भारी कर देते हैं। वहीं अंतिम हिस्से में प्रेम का जो रूप सामने आता है, वह लंबे समय तक याद रह जाता है। हालांकि फिल्म की गति काफी धीमी है और इसका रनटाइम भी लगभग ढाई घंटे से ज्यादा है। ऐसे में हर दर्शक इससे जुड़ पाए, यह जरूरी नहीं। लेकिन जिन लोगों को किरदारों और भावनाओं के साथ समय बिताना पसंद है, उनके लिए यही इसकी सबसे बड़ी खूबी साबित हो सकती है।
अभिनय के बारे में
नसीरुद्दीन शाह फिल्म की आत्मा हैं। उन्होंने अपने किरदार में ऐसी गहराई और सच्चाई भरी है कि कई दृश्य सिर्फ उनकी मौजूदगी से असरदार बन जाते हैं। उनकी आंखों का दर्द और संवादों की प्रस्तुति लंबे समय तक याद रहती है। दिलजीत दोसांझ ने भी बेहद संतुलित अभिनय किया है। उनका किरदार एक ऐसे पोते का है जो परिवार की व्यावहारिक सोच और अपने दादा की भावनात्मक इच्छा के बीच फंसा हुआ है। उन्होंने इस द्वंद्व को प्रभावशाली ढंग से निभाया है। शरवरी अपने हिस्से में प्रभाव छोड़ती हैं और उनके किरदार में परिपक्वता दिखाई देती है। वैदांग रैना ने भी अपनी भूमिका को गंभीरता और ईमानदारी के साथ निभाया है। दानिश पंडोर, रजत कपूर और बनिता संधू अपने-अपने किरदारों में फिट बैठते हैं। अंजना सुखानी का छोटा लेकिन प्रभावशाली रोल दर्शकों के भीतर कई भावनाएं पैदा करता है। कुल मिलाकर फिल्म की कास्टिंग इसकी सबसे बड़ी ताकतों में से एक है।
लेखन और निर्देशन के बारे में
इम्तियाज अली और नयनिका महतानी की लिखी यह कहानी पारंपरिक प्रेम कहानियों से अलग रास्ता अपनाती है। फिल्म कई जगह प्रयोग करती है, लेकिन अपनी भावनात्मक सच्चाई नहीं खोती। निर्देशक के तौर पर इम्तियाज अली ने एक बार फिर साबित किया है कि वे मुख्यधारा के बीच रहकर भी अपनी अलग सिनेमाई पहचान बनाए रखने का साहस रखते हैं। फिल्म की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि यह प्रेम को एक नए दृष्टिकोण से देखने का मौका देती है।
संगीत के बारे में
फिल्म का संगीत भले अभी चार्टबस्टर न बना हो, लेकिन कहानी के साथ इसका प्रभाव काफी गहरा है। A. R. Rahman का संगीत दृश्यों की भावनाओं को और मजबूत बनाता है और कई जगह बिना ज्यादा शोर किए दिल को छू जाता है।
Written By Toshi Shah