Kriti Sanon Rakhi Advertisement Controversy: रक्षाबंधन से पहले एक ज्वैलरी ब्रांड का विज्ञापन सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना हुआ है। विज्ञापन में बॉलीवुड अभिनेत्री कृति सेनन एक कुत्ते को राखी बांधती नजर आती हैं। विज्ञापन सामने आने के बाद जहां कुछ लोगों ने इसे पशुओं के प्रति प्रेम और अपनापन जताने का आधुनिक तरीका बताया, वहीं कुछ लोगों ने इसे रक्षाबंधन की धार्मिक परंपरा से जोड़कर आपत्ति जताई है। काशी के कुछ विद्वानों ने भी इस प्रस्तुति को सनातन परंपरा के खिलाफ बताया है।

कृति सेनन के विज्ञापन से क्यों उठा विवाद?

बता दें, ज्वैलरी ब्रांड के विज्ञापन में कृति सेनन को एक कुत्ते को राखी बांधते हुए दिखाया गया है। विज्ञापन का उद्देश्य पालतू पशु के साथ भावनात्मक लगाव और परिवार के सदस्य के रूप में उसके महत्व को सामने रखना है। लेकिन इस विज्ञापन को लेकर कुछ लोगों ने नाराजगी जाहिर की। एक तरफ लोगों का कहना है कि जब पालतू जानवर परिवार का हिस्सा बन चुके हैं तो उनके प्रति प्रेम व्यक्त करने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। तो वहीं दूसरी ओर, विरोध करने वालों का कहना है कि रक्षाबंधन के धार्मिक स्वरूप और राखी के पारंपरिक अर्थ को बदलकर प्रस्तुत करना सही नहीं है।

काशी के विद्वानों ने क्या कहा?

विवाद के बीच काशी के कुछ विद्वानों ने इस विज्ञापन पर आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि रक्षाबंधन की मूल परंपरा रक्षा सूत्र और मानवीय संबंधों से जुड़ी रही है। उनके अनुसार, किसी पशु को राखी बांधने की परंपरा को सनातन धर्म की स्थापित धार्मिक विधि के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए।

रक्षाबंधन की परंपरा क्या है?

रक्षाबंधन को सामान्य रूप से भाई-बहन के स्नेह और रक्षा के संकल्प से जुड़े पर्व के रूप में जाना जाता है। हालांकि इसका धार्मिक इतिहास केवल भाई-बहन के संबंध तक सीमित नहीं रहा है। भारतीय परंपरा में रक्षा सूत्र बांधने का उल्लेख विभिन्न धार्मिक और सामाजिक संदर्भों में मिलता है। पुरोहितों द्वारा यजमान को रक्षा सूत्र बांधने की परंपरा भी रही है। इसी तरह गुरु-शिष्य संबंध में भी रक्षा और मंगलकामना के प्रतीक के रूप में सूत्र का प्रयोग विभिन्न परंपराओं में देखने को मिलता है।

क्या शास्त्रों में कुत्ते को राखी बांधने की विधि है?

वहीं हिंदू धार्मिक परंपराओं में कुत्ते को रक्षाबंधन की राखी बांधने की कोई शास्त्रीय विधि नहीं दिखाई देती। इसका अर्थ यह नहीं है कि पशु के प्रति प्रेम या उसकी रक्षा करना धार्मिक रूप से गलत है। बल्कि दोनों बातों को अलग-अलग समझना जरूरी है।

कुत्ते की सेवा और धार्मिक राखी बांधना दो अलग विषय हैं। पशु को भोजन देना, उसकी देखभाल करना, उसे चोट से बचाना और उसके प्रति करुणा रखना भारतीय धार्मिक और नैतिक विचारों के अनुरूप माना जा सकता है। लेकिन इसे रक्षाबंधन की पारंपरिक धार्मिक विधि कहना अलग दावा होगा, जिसके लिए स्पष्ट और शास्त्रीय आधार आवश्यक है।

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क्या कुत्ते को राखी बांधना गलत माना जाएगा?

कहा जाता है कि यदि कोई व्यक्ति अपने पालतू कुत्ते को परिवार का सदस्य मानकर प्रेम और स्नेह के प्रतीक के रूप में राखी बांधता है, तो यह एक व्यक्तिगत या आधुनिक सांस्कृतिक अभिव्यक्ति हो सकती है। इसे अनिवार्य धार्मिक अनुष्ठान बताना अलग बात होगी। दूसरी ओर, यदि कोई यह दावा करे कि कुत्ते को रक्षाबंधन पर राखी बांधना हिंदू धर्म की अनिवार्य परंपरा है, तो इसके समर्थन में स्पष्ट तौर प्रमाण जरूर होंगे। यही अंतर इस पूरे विवाद को समझने में महत्वपूर्ण है।

विज्ञापन और धार्मिक परंपरा के बीच अंतर समझना जरूरी

विज्ञापन का उद्देश्य अक्सर भावनात्मक संदेश को आकर्षक तरीके से प्रस्तुत करना होता है। आज पालतू कुत्तों को परिवार का हिस्सा मानने वाले लोगों की संख्या काफी बढ़ी है। ऐसे में किसी विज्ञापन में कुत्ते को राखी बांधना एक भावनात्मक और मार्केटिंग संदेश हो सकता है। लेकिन धार्मिक प्रतीकों के इस्तेमाल से जुड़े विज्ञापनों में संवेदनशीलता आवश्यक है। किसी पर्व की धार्मिक पहचान को आधुनिक सामाजिक संदेश के साथ जोड़ते समय अलग-अलग समुदायों की मान्यताओं का ध्यान रखना महत्वपूर्ण है। इस मामले में भी एक पक्ष इसे पशु प्रेम के रूप में देख रहा है, जबकि दूसरा पक्ष इसे धार्मिक परंपरा के बदलाव के रूप में देख रहा है।