नई दिल्ली। कांग्रेस की राजनीति में वामपंथी नेताओं का हमेशा से नजदीकी रिश्ता रहा है। सीएए-एनआरसी आंदोलन से लेकर किसान आंदोलन तक में कांग्रेस के साथ वाम दल सहयोगी दल की भूमिका में रहे हैं। चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR के विरोध में चल रहे आंदोलन में भी इंडिया गठबंधन में वामदल प्रमुख भूमिका में है। लेकिन अब राहुल गांधी के आं दोलनों में वाम दलों से जुड़ें छात्र संगठनों की बढ़ती भूमिका से कांग्रेस के साथ सत्ताधारी बीजेपी भी सकते में है। 

विभिन्न आंदोलनों में वाम छात्र दलों की बढ़ती मौजूदगी को लेकर सत्ता के गलियारों में बहस तेज हो गयी है। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा के साथ सुप्रीम कोर्ट तक विपक्षी मार्च में ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा की मौजूदगी को लेकर कांग्रेस-बीजेपी के छात्र युवा संगठन में एक तरह का भय भर गया है।

कांग्रेस के कुछ नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच इस बात को लेकर चर्चा है कि पार्टी के अपने छात्र एवं युवा संगठन मौजूद होने के बावजूद वामपंथी संगठनों से जुड़े कार्यकर्ताओं को शीर्ष नेतृत्व के साथ प्रमुखता क्यों मिल रही है।

नेहा बोरा भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) लिबरेशन से संबद्ध छात्र संगठन AISA की राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ चल रहे विरोध प्रदर्शनों के दौरान वह प्रमुख चेहरों में शामिल रही हैं।

विपक्षी एकजुटता या कांग्रेस के अपने संगठन की अनदेखी?

12 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट की ओर निकाले गए विपक्षी मार्च में नेहा बोरा की राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा के साथ मौजूदगी को राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कांग्रेस के कुछ नेताओं और NSUI से जुड़े लोगों को यह लग सकता है पार्टी के अपने छात्र संगठन को अपेक्षित प्रमुखता नहीं मिली। लेकिन यहां पर यह भी सवाल है कि क्या राहुल गांधी या कांग्रेस ने युवा कांग्रेस और छात्र कांग्रेस के नेताओं को इस मार्च में आने से मना किया था?

हालांकि, कांग्रेस नेतृत्व की रणनीति के पीछे एक व्यापक राजनीतिक उद्देश्य भी बताया जा रहा है। पार्टी छात्र संगठनों, युवा कार्यकर्ताओं और नागरिक समूहों को एक मंच पर लाकर विरोध प्रदर्शन को व्यापक जनसमर्थन दिलाना चाहती है।

राहुल गांधी ने भी सोशल मीडिया पर छात्रों, युवाओं, पत्रकारों और INDIA गठबंधन को एक साझा उद्देश्य से जुड़ा बताया था। उनका संदेश था कि अलग-अलग संगठनों के बावजूद सभी संवैधानिक अधिकारों की मांग को लेकर एकजुट हैं।

कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता के अनुसार, नेहा बोरा को प्रमुखता मिलने से CJP को आंदोलन का केंद्रीय चेहरा बनने से रोकने में भी मदद मिली। 

वाम पृष्ठभूमि के नेताओं को कांग्रेस में मिलती रही है जगह

कांग्रेस में वामपंथी छात्र राजनीति से निकले नेताओं की मौजूदगी नई नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में ऐसे कई कार्यकर्ता पार्टी में महत्वपूर्ण भूमिकाओं तक पहुंचे हैं।

इनमें जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्रसंघ (JNUSU) के पूर्व अध्यक्ष रहे संदीप सिंह, मोहित पांडे और अकबर चौधरी के नाम शामिल हैं। संदीप सिंह बाद में प्रियंका गांधी वाड्रा की टीम से भी जुड़े।

स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) से जुड़े रहे प्रसेनजीत बोस भी कांग्रेस में शामिल हुए। वहीं, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से संबद्ध ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन (AISF) की पृष्ठभूमि वाले कन्हैया कुमार भी कांग्रेस में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

इन नेताओं के पास छात्र राजनीति, जन आंदोलनों, भाषण और संगठनात्मक गतिविधियों का अनुभव है। कांग्रेस के लिए यह अनुभव युवाओं तक पहुंच बनाने में उपयोगी हो सकता है।  

कांग्रेस और वामपंथी संगठनों के बीच वैचारिक अंतर

इस बहस का एक महत्वपूर्ण पहलू कांग्रेस और वामपंथी संगठनों के बीच वैचारिक अंतर भी है। कांग्रेस खुद को विभिन्न सामाजिक समूहों और विचारधाराओं को साथ लेकर चलने वाली पार्टी के रूप में प्रस्तुत करती रही है, जबकि वामपंथी संगठनों की अपनी अलग राजनीतिक और वैचारिक परंपराएं हैं।

AISA की ओर से NSUI और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से संबद्ध अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) की आलोचना भी की जाती रही है। ऐसे में AISA की राष्ट्रीय अध्यक्ष का कांग्रेस के नेतृत्व वाले प्रदर्शन में प्रमुखता से शामिल होना राजनीतिक चर्चा का विषय बन गया है।

कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेताओं का तर्क है कि पार्टी को अपने संगठनात्मक ढांचे और जमीनी कार्यकर्ताओं को प्राथमिकता देनी चाहिए। दूसरी ओर, व्यापक विपक्षी एकजुटता के समर्थकों का तर्क है कि विभिन्न विचारधाराओं और संगठनों के लोगों को साथ लाने से आंदोलन का सामाजिक आधार मजबूत हो सकता है।

NSUI की भूमिका और युवा नेतृत्व पर सवाल

कांग्रेस के छात्र संगठन NSUI की भूमिका भी इस बहस के केंद्र में है। रिपोर्ट में दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रसंघ चुनावों में संगठन के प्रदर्शन और विरोध प्रदर्शनों में उसकी दृश्यता को लेकर उठे सवालों का उल्लेख किया गया है।

कन्हैया कुमार की भूमिका और आंदोलन के दौरान NSUI की मौजूदगी को लेकर भी चर्चा हुई है। नेहा बोरा को मिल रही प्रमुखता ने इस बहस को और हवा दी है कि कांग्रेस अपने संगठन के भीतर नेतृत्व विकसित करने और बाहर के राजनीतिक कार्यकर्ताओं को अवसर देने के बीच संतुलन कैसे बनाएगी।

किसी भी राजनीतिक दल के लिए छात्र और युवा संगठन नए नेताओं को तैयार करने, स्थानीय स्तर पर कार्यकर्ताओं को जोड़ने और भविष्य का नेतृत्व विकसित करने का माध्यम होते हैं। यदि पार्टी के बाहर से आए लोगों को अधिक पहचान मिलती है, तो संगठन के पुराने कार्यकर्ताओं में असंतोष पैदा हो सकता है। वहीं, बाहरी संगठनों के अनुभवी कार्यकर्ताओं को शामिल नहीं करना राजनीतिक विस्तार की संभावनाओं को सीमित भी कर सकता है।

कांग्रेस के सामने संगठन और गठबंधन के बीच संतुलन की चुनौती

नेहा बोरा की बढ़ती राजनीतिक दृश्यता ने कांग्रेस के सामने एक अहम सवाल खड़ा किया है-क्या पार्टी वामपंथी छात्र संगठनों के साथ सहयोग करके अपना जनाधार बढ़ा सकती है, बिना अपने छात्र एवं युवा संगठनों को कमजोर किए?

एक ओर कांग्रेस को अपने संगठन को मजबूत रखने की जरूरत है, तो दूसरी ओर उसे उन युवाओं और कार्यकर्ताओं तक पहुंच बनानी है जो पारंपरिक पार्टी ढांचे से बाहर रहकर आंदोलनों में सक्रिय हैं।

फिलहाल, नेहा बोरा की मौजूदगी को लेकर उठी बहस कांग्रेस की व्यापक राजनीतिक रणनीति, विपक्षी एकजुटता और आंतरिक संगठनात्मक संतुलन से जुड़ी है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि पार्टी इन तीनों मोर्चों पर किस तरह तालमेल बैठाती है।

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