Delhi News: दिल्ली के कृषि भवन परिसर में स्थित करीब 100 साल पुरानी कदीमी मस्जिद को लेकर विवाद गहरा गया है। केंद्र सरकार ने दिल्ली हाईकोर्ट में स्पष्ट किया है कि सेंट्रल विस्टा पुनर्विकास परियोजना के तहत इस मस्जिद को हटाना जरूरी है। सरकार का कहना है कि केंद्रीय सरकारी कार्यालय परिसर में स्थायी धार्मिक ढांचे को बनाए रखना सरकारी संपत्ति के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप के अनुकूल नहीं है। केंद्र के मुताबिक सेंट्रल विस्टा रीडेवलपमेंट प्रोजेक्ट को आसान बनाने के लिए इसे हटाने का फैसला लिया जा रहा है। केंद्र ने तर्क देते हुए कहा कि, दिल्ली हाई कोर्ट को ऑफिस कॉम्प्लेक्स के अंदर एक स्थायी धार्मिक ढांचा बनाए रखना "गंभीर और सरकारी संपत्ति के सेक्युलर चरित्र के साथ मेल नहीं खाता है।
Union Government has told the Delhi High Court that Qadeemi Masjid, located within the Krishi Bhawan premises in the national capital of Delhi, cannot be retained at its present site as the land is required for the redevelopment of Common Central Secretariat (CCS) Buildings 4 and 5 under the Central Vista project. In its status report, filed through the Land and Development Office (L&DO), the Centre has asserted that the property belongs to the government and the caretaking committee was permitted to occupy it under an agreement executed in 1940. It has maintained that the arrangement did not confer any ownership rights over the land. The government’s response comes in response in a petition filed by Qadeemi Masjid, Krishi Bhawan, through its caretaking committee, challenging the proposed action concerning the religious structure.
— ANI (@ANI) November 3, 2026
सरकारी संपत्ति के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप के अनुकूल नहीं
केंद्र सरकार ने न्यायालय में दिए गए अपने स्टेटस रिपोर्ट (27 अक्टूबर) में कहा कि सेंट्रल विस्टा पुनर्विकास परियोजना के तहत कॉमन सेंट्रल सचिवालय (CCS) की बिल्डिंग नंबर 4 और 5 (कर्तव्य भवन 4 और 5) का निर्माण होना है, जिसके चलते इस मस्जिद को हटाना जरूरी है। आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय के भूमि एवं विकास कार्यालय (L&DO) ने दलील दी है।
कि किसी केंद्रीय सरकारी कार्यालय परिसर के भीतर स्थायी धार्मिक संरचना का होना या उसकी मांग करना सरकारी संपत्ति के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप के अनुकूल नहीं है और यह अस्वीकार्य है। केंद्र ने यह भी कहा है कि इस मस्जिद को हटाने से संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत किसी के मौलिक अधिकारों का हनन नहीं होता है, क्योंकि सरकारी जमीन पर किसी खास स्थान पर नमाज अदा करने का अधिकार नहीं बनता है।
केंद्र के अनुसार, इंडिया गेट के पास स्थित शाही मस्जिद ज़ब्ता गंज कृषि भवन से 2 किलोमीटर के दायरे में है, जहां नमाज अदा की जा सकती है। जस्टिस अनीश दयाल की बेंच ने इस मामले की सुनवाई करते हुए केंद्र के वकील से यह स्पष्ट करने को कहा है कि क्या कोई ऐसा नियम है जो सरकारी परिसरों में किसी भी धर्म के लिए प्रार्थना स्थल पर रोक लगाता है। अदालत ने मस्जिद की देखरेख करने वाली कमेटी को जवाब दाखिल करने के लिए समय दिया है।
मस्जिद को हटाना आवश्यक क्यों?
केंद्र सरकार की ओर से भूमि एवं विकास कार्यालय (L&DO) ने अदालत में स्टेटस रिपोर्ट दाखिल की है। इसमें कहा गया है कि कृषि भवन की जमीन केंद्र सरकार की है और मस्जिद की देखरेख करने वाली समिति को 1940 के एक समझौते के तहत केवल सीमित उपयोग की अनुमति दी गई थी। सरकार के मुताबिक, कॉमन सेंट्रल सेक्रेटेरिएट (CCS) की नई इमारतों 4 और 5 के निर्माण के लिए मस्जिद को हटाना आवश्यक है।
यह बात हाउसिंग और अर्बन अफेयर्स मिनिस्ट्री के तहत लैंड एंड डेवलपमेंट ऑफिस की फाइल की गई स्टेटस रिपोर्ट में कही गई थी। केंद्र ने अपनी रिपोर्ट में कहा, “केंद्र सरकार के ऑफिस कॉम्प्लेक्स के अंदर कोई पक्का धार्मिक ढांचा बनाना या बनाए रखना, या उसकी मांग करना, सरकारी प्रॉपर्टी के सेक्युलर नेचर के खिलाफ है और यह गलत है। इसमें आगे तर्क दिया गया कि “सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ज़ोन में मौजूद पब्लिक ज़मीन पर किसी भी परमानेंट धार्मिक रिज़र्वेशन का बोझ नहीं डाला जा सकता है।
मस्जिद कमेटी ने क्या दलील दी?
कदीमी मस्जिद की देखरेख करने वाली समिति का कहना है कि यह मस्जिद 100 साल से अधिक पुरानी है और कई दशकों से कृषि भवन तथा आसपास के सरकारी कार्यालयों में काम करने वाले कर्मचारी यहां नमाज अदा करते रहे हैं। समिति ने हाईकोर्ट से मांग की है कि मस्जिद को मौजूदा स्थान पर सुरक्षित रखा जाए। अगर ऐसा करना संभव नहीं है, तो पास में नमाज पढ़ने के लिए उचित वैकल्पिक जगह उपलब्ध कराई जाए।
दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र से क्या पूछा?
केंद्र की दलीलों पर सुनवाई करते हुए जस्टिस अनिश दयाल ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए। अदालत ने पूछा कि क्या सरकारी परिसरों में किसी भी धर्म के लोगों के लिए प्रार्थना स्थल उपलब्ध कराने पर रोक लगाने वाले कोई स्पष्ट नियम हैं? कोर्ट ने यह भी जानना चाहा कि यदि सरकार धार्मिक ढांचे को सरकारी परिसर में रखने के खिलाफ है, तो वैकल्पिक प्रार्थना स्थल उपलब्ध कराने के लिए क्या व्यवस्था है। अदालत ने मस्जिद कमेटी को केंद्र की स्टेटस रिपोर्ट पर जवाब दाखिल करने का समय दिया है। मामले की अगली सुनवाई 23 नवंबर 2026 को होगी।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने क्या कहा?
साल 2021 के दिसंबर महीने में दिल्ली वक्फ बोर्ड ने दिल्ली हाई कोर्ट में एक अर्जी दी थी। जिसमें इस प्रोजेक्ट से प्रभावित होने वाली 6 मस्जिदों की सुरक्षा की मांग के मुद्दे को उठाया गया था। इसके तहत कृषि भवन के ओपन कोर्ट में बनी कदीमी मस्जिद भी शामिल है। इस पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट से कहा था। इन प्रॉपर्टीज़ का कुछ नहीं हो रहा है। हम आपके सामने हैं। यह (प्रोजेक्ट) एक बहुत लंबा प्लान है और हम अभी तक इसके आस-पास भी नहीं पहुंचे हैं। सरकार का कहना है कि कृषि भवन और उससे सटे शास्त्री भवन की जगहों पर बन रहे कॉमन सेंट्रल सेक्रेटेरिएट (CCS) बिल्डिंग 4 और 5 का रीडेवलपमेंट “सबसे ज़्यादा राष्ट्रीय महत्व” का प्रोजेक्ट है।
धार्मिक आज़ादी के अधिकार का उल्लंघन
सरकार ने यह भी तर्क दिया कि रीडेवलपमेंट साइट के किसी भी हिस्से को धार्मिक स्ट्रक्चर के लिए रिज़र्व करना मंज़ूर सेंट्रल विस्टा मास्टर प्लान के खिलाफ होगा। केंद्र ने इस दलील को भी खारिज कर दिया है। मस्जिद हटाने से संविधान के आर्टिकल 25 के तहत धार्मिक आज़ादी के अधिकार का उल्लंघन होगा। इसके मुताबिक, सरकारी ज़मीन पर किसी खास जगह पर नमाज़ पढ़ने पर ज़ोर देना कोई बुनियादी अधिकार नहीं है। जो किसी मंज़ूरी वाले इंतज़ाम के तहत हो। एक विकल्प के तौर पर सरकार ने इंडिया गेट के पास शाही मस्जिद ज़ब्ता गंज का ज़िक्र किया। जिसके बारे में उसने कहा कि यह कृषि भवन के 2 किलोमीटर के दायरे में है और पास में नमाज़ पढ़ने की जगह के तौर पर काम आ सकती है।
धर्म के लिए कोई अन्य जगह नहीं
सोमवार को दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा क्या ऐसे कोई नियम हैं जो सरकारी कॉम्प्लेक्स के अंदर धार्मिक स्ट्रक्चर बनाने पर रोक लगाते हैं। जस्टिस अनीश दयाल ने कहा, हमें यह समझने की ज़रूरत है कि दूसरी जगह देने के नियम क्या हैं? क्या आपका कहना है कि धर्म के लिए कोई अन्य जगह नहीं दी जानी चाहिए?
यह कहने के लिए कुछ नियम होने चाहिए। किसी भी सरकार में किसी भी समुदाय के लिए प्रार्थना करने की जगह नहीं हो सकती। यह बस एक बात है जो हम कह रहे हैं। आप ASG को बता सकते हैं। हम यह समझने के लिए उत्सुक हैं कि आपने क्या रुख अपनाया है। अगर यही रुख है, तो कुछ नियम ज़रूर होने चाहिए।
अगली सुनवाई 23 नवंबर
केंद्र के वकील निशांत गौतम से बात करते हुए जस्टिस दयाल ने यह भी कहा। एक बार जब हम समझ जाएंगे कि उस बयान (केंद्र सरकार के कॉम्प्लेक्स में धार्मिक ढांचे की इजाज़त नहीं है) का असल मतलब क्या है और इसका क्या असर होगा। तो हम कानूनी स्थिति को समझ सकते हैं। कोर्ट ने मस्जिद कमेटी को अगली सुनवाई 23 नवंबर तक सरकार की बात का जवाब देने के लिए समय दिया।
डर तब पैदा हुआ जब 19 जनवरी को केंद्रीय आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय (MoHUA) के तहत सेंट्रल पब्लिक वर्क्स डिपार्टमेंट (CPWD) ने कृषि भवन और शास्त्री भवन की जगह पर कॉमन सेंट्रल सेक्रेटेरिएट (CCS) बिल्डिंग 4 और 5 बनाने के लिए एक टेंडर निकाला।
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