यमन में हूतियों के खिलाफ वर्षों से सैन्य अभियान चल रहे हैं। अमेरिका, ब्रिटेन, सऊदी अरब और इजरायल जैसी सैन्य शक्तियां अलग-अलग समय पर हूती ठिकानों को निशाना बना चुकी हैं। मिसाइलें दागी गईं, ड्रोन हमले हुए और संगठन के कई महत्वपूर्ण लोगों को निशाना बनाया गया। इसके बावजूद हूती आंदोलन खत्म होने के बजाय अपनी सैन्य क्षमता बढ़ाता दिखाई देता है। 2015 में अपेक्षाकृत सीमित क्षमता वाला यह विद्रोही संगठन अगले कुछ वर्षों में हजारों लड़ाकों से बढ़कर एक बड़े सशस्त्र नेटवर्क में बदल गया।

सवाल यही है कि इतनी भारी सैन्य ताकत के सामने भी हूतियों की क्षमता क्यों बनी हुई है? इसका जवाब सिर्फ हथियारों में नहीं, बल्कि यमन के भूगोल, ईरान से संबंध, स्थानीय राजनीति और हूतियों की बदलती सैन्य रणनीति में छिपा है।

हूती आखिर हैं कौन?

हूती आंदोलन का आधिकारिक नाम अंसार अल्लाह है। इसकी जड़ें उत्तरी यमन के जैदी शिया समुदाय में हैं। संगठन की गतिविधियां 1990 के दशक में शुरू हुईं और समय के साथ यह एक प्रभावशाली राजनीतिक-सैन्य शक्ति बन गया।

2014 में हूतियों ने यमन की राजधानी सना पर कब्जा कर लिया। इसके बाद देश में सत्ता संघर्ष तेज हुआ और अगले साल सऊदी अरब के नेतृत्व में एक सैन्य गठबंधन ने हूतियों के खिलाफ अभियान शुरू किया।

उम्मीद थी कि सैन्य दबाव के जरिए संगठन को जल्दी पीछे धकेला जा सकेगा, लेकिन संघर्ष लंबा खिंचता गया और हूती अपनी सैन्य रणनीति को लगातार बदलते रहे।

यमन का पहाड़ी भूगोल हूतियों के लिए बड़ा फायदा

हूतियों की ताकत को समझने के लिए यमन का नक्शा देखना जरूरी है।

उत्तरी यमन का बड़ा हिस्सा पहाड़ी है। ऐसे इलाके में किसी विद्रोही संगठन के ठिकानों को हवाई हमलों से पूरी तरह नष्ट करना बेहद मुश्किल होता है। लड़ाकों को छोटे-छोटे समूहों में फैलाया जा सकता है और हथियारों तथा सैन्य उपकरणों को अलग-अलग स्थानों पर रखा जा सकता है।

यही वजह है कि किसी एक बड़े सैन्य अड्डे को तबाह कर देना और पूरे संगठन की सैन्य क्षमता खत्म कर देना दो अलग बातें हैं।

हवाई हमले कमांड सेंटर, हथियारों के भंडार, लॉन्च साइट और बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचा सकते हैं, लेकिन अगर संगठन के पास विकेंद्रीकृत नेटवर्क हो, तो उसके पास हमले के बाद दोबारा संगठित होने की गुंजाइश बनी रहती है।

अमेरिकी और इजरायली अभियानों ने हूती नेतृत्व तथा सैन्य ढांचे को नुकसान पहुंचाया है, लेकिन संगठन की पूरी लड़ाकू क्षमता को समाप्त नहीं किया जा सका।

ईरान से मिलने वाला समर्थन

हूतियों की सैन्य क्षमता के पीछे ईरान के समर्थन को भी महत्वपूर्ण कारक माना जाता है।

ईरान पर हूतियों को हथियार, तकनीकी जानकारी और सैन्य प्रशिक्षण उपलब्ध कराने के आरोप लंबे समय से लगते रहे हैं। तेहरान इन आरोपों से इनकार करता रहा है, लेकिन संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्टों में हूतियों और ईरान से जुड़े नेटवर्क के बीच सैन्य संबंधों का उल्लेख किया गया है।

मध्य-पूर्व मामलों के विशेषज्ञ माइकल नाइट्स ने हूतियों की सैन्य प्रगति की तुलना हिजबुल्लाह के विकास से करते हुए कहा है कि संगठन ने अपेक्षाकृत कम समय में काफी जटिल सैन्य क्षमताएं विकसित कर लीं।

जुलाई 2026 में एक रिपोर्ट ने दावा किया कि ईरान से जुड़े IRGC के कमांडर और सैन्य सलाहकार यमन पहुंचे थे। रिपोर्ट में मिसाइल और ड्रोन से संबंधित उपकरणों तथा हूती अभियानों के लिए वित्तीय सहायता का भी उल्लेख किया गया।

अगर इस तरह का बाहरी समर्थन लगातार उपलब्ध रहे, तो किसी संगठन के लिए हवाई हमलों के बाद अपनी क्षमताओं को दोबारा खड़ा करना आसान हो जाता है।

अब हूती सिर्फ हथियार हासिल नहीं करते, उन्हें विकसित भी करते हैं

हूतियों की सबसे महत्वपूर्ण सैन्य उपलब्धियों में से एक उनकी घरेलू हथियार क्षमता का विस्तार है।

संगठन के पास बैलिस्टिक मिसाइल, क्रूज मिसाइल, ड्रोन और समुद्री ड्रोन जैसी क्षमताएं हैं। लाल सागर में जहाजों को निशाना बनाने के लिए एंटी-शिप मिसाइलों और ड्रोन का इस्तेमाल भी किया गया है।

इस बदलाव का अर्थ यह है कि हूतियों की सैन्य ताकत पूरी तरह बाहरी सप्लाई पर निर्भर नहीं रह गई है। उपलब्ध तकनीक और विदेशी सहायता को स्थानीय उत्पादन तथा असेंबली क्षमता के साथ जोड़ने की कोशिश की गई है।

सितंबर 2026 में एक रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि हूती नेटवर्क से जुड़े लोगों ने निर्देशित हथियारों के विकास में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी तकनीकों का इस्तेमाल करने की कोशिश की है।

वहीं, एक और रिपोर्ट में भी उत्तरी यमन में हूतियों से जुड़े लोगों द्वारा AI टूल्स का इस्तेमाल निर्देशित रॉकेट विकसित करने और परीक्षण से संबंधित गतिविधियों में किए जाने का उल्लेख किया गया।

इससे यह संकेत मिलता है कि संगठन की चुनौती केवल पारंपरिक हथियारों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह नई तकनीकों को भी अपनी सैन्य क्षमताओं में शामिल करने की कोशिश कर रहा है।

हूतियों के विरोधी खुद एकजुट नहीं हैं

यमन की लड़ाई का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि हूतियों के खिलाफ खड़ी सभी ताकतों के लक्ष्य समान नहीं हैं।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त यमनी सरकार लंबे समय से राजनीतिक और सैन्य खींचतान से जूझती रही है। दूसरी तरफ दक्षिणी यमन में अलगाववादी ताकतें हैं, जिनके हित कई बार केंद्रीय सरकार और सऊदी समर्थित गुटों से अलग रहे हैं।

इनमें से कुछ गुटों को संयुक्त अरब अमीरात का समर्थन मिला है, जबकि दूसरे सऊदी अरब के करीब रहे हैं।

इस बिखराव का फायदा हूतियों को मिलता है। एक ऐसा संगठन जिसके सामने कई विरोधी गुट हों और जिनके बीच खुद राजनीतिक या सैन्य मतभेद हों, उसके लिए इलाके पर अपनी पकड़ बनाए रखना आसान हो सकता है।

एक विश्वविद्यालय के प्रोफेसर के अनुसार, हूतियों की ताकत को केवल ईरानी समर्थन से समझना अधूरा होगा। उनके मुताबिक यमन की सरकार और उसके सहयोगी गुटों की कमजोरी भी इस कहानी का बड़ा हिस्सा है।

बमबारी और जमीन पर कब्जा-दो अलग चीजें हैं

किसी विद्रोही संगठन के खिलाफ हवाई अभियान चलाना अपेक्षाकृत आसान है, लेकिन उसके बाद जमीन पर नियंत्रण स्थापित करना कहीं ज्यादा कठिन काम है।

मार्च-अप्रैल 2025 में अमेरिका ने हूतियों के खिलाफ बड़े पैमाने पर सैन्य अभियान चलाया, जिसे ऑपरेशन रफ राइडर कहा गया। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक इस दौरान 1,000 से ज्यादा ठिकानों को निशाना बनाया गया और करीब 2,000 हथियार इस्तेमाल किए गए। इन हथियारों की अनुमानित कीमत 750 मिलियन डॉलर से अधिक बताई गई।

हूतियों ने भी अमेरिकी सैन्य संपत्तियों को निशाना बनाया। सात MQ-9 रीपर ड्रोन गिराए जाने की बात सामने आई। इसके अलावा लगभग 60 मिलियन डॉलर मूल्य का एक F/A-18 विमान विमानवाहक पोत से समुद्र में गिर गया।

इन अभियानों ने हूतियों पर दबाव जरूर बनाया, लेकिन संगठन की पूरी सैन्य संरचना को समाप्त नहीं किया।

यही गुरिल्ला युद्ध की सबसे बड़ी चुनौती है। अगर किसी संगठन के पास जमीन पर मौजूद नेटवर्क, स्थानीय समर्थन और सुरक्षित ठिकाने हों, तो केवल हवाई शक्ति से उसके पूरे संगठन को खत्म करना मुश्किल हो सकता है।

लाल सागर और बाब-अल-मंदेब ने हूतियों की रणनीतिक अहमियत बढ़ाई

हूतियों की ताकत सिर्फ यमन तक सीमित नहीं है।

यमन की भौगोलिक स्थिति बेहद महत्वपूर्ण है। देश के पश्चिम में लाल सागर और दक्षिण-पश्चिम में बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य है। यह जलमार्ग लाल सागर को अदन की खाड़ी और आगे हिंद महासागर से जोड़ता है।

इसी वजह से हूतियों की समुद्री मिसाइल और ड्रोन क्षमता अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए भी चिंता का विषय बनी।

लाल सागर से गुजर ने वाले वाणिज्यिक जहाजों पर हमलों ने दुनिया का ध्यान हूतियों की ओर खींचा। संगठन ने समुद्री मार्ग को अपने सैन्य दबाव के एक साधन के रूप में इस्तेमाल किया।

सितंबर 2026 में संघर्ष फिर क्यों बढ़ा?

सितंबर 2026 में हूतियों और उनके विरोधी गुटों के बीच संघर्ष के फिर तेज होने की खबरें सामने आई हैं।

रिपोर्टों के मुताबिक हूतियों ने सऊदी समर्थित सरकारी बलों के खिलाफ अभियान चलाया और मोखा बंदरगाह तथा मयून द्वीप पर कब्जे का दावा किया। मयून द्वीप की स्थिति बाब-अल-मंदेब के बेहद करीब है, इसलिए इसका रणनीतिक महत्व काफी ज्यादा है।

इसके साथ ही सऊदी अरब की तेल अवसंरचना और सैन्य ठिकानों पर ड्रोन तथा बैलिस्टिक मिसाइल हमलों की भी खबरें आई हैं।

संयुक्त राष्ट्र ने य मन में बढ़ती हिंसा के बीच बड़े पैमाने पर विस्थापन और नागरिक हताहतों को लेकर चिंता जताई है।

इससे साफ है कि एक दशक से चल रहा संघर्ष अभी भी केवल स्थानीय सत्ता संघर्ष नहीं रहा, बल्कि इसका असर क्षेत्रीय सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार तक पहुंच चुका है।

तो क्या हूतियों को सैन्य तरीके से खत्म किया जा सकता है?

यह सवाल आसान नहीं है।

हवाई शक्ति हूती ठिकानों,हथियारों और कमांड संरचनाओं को नुकसान पहुंचा सकती है, लेकिन किसी संगठन को पूरी तरह समाप्त करने के लिए केवल उसके सैन्य ढांचे पर हमला करना पर्याप्त नहीं होता।

इसके लिए जमीन पर लगातार नियंत्रण,स्थानीय प्रशासन और प्रभावी सुरक्षा व्यवस्था भी चाहिए।

यही वह क्षेत्र है जहां हूतियों के विरोधियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती आती है। यमन में मौजूद अलग-अलग सैन्य और राजनीतिक गुटों के बीच मतभेद हैं और उनका एक साझा कमांड ढांचा नहीं है।

दूसरी तरफ सऊदी अरब के लिए भी लंबे समय तक चलने वाला जमीनी युद्ध महंगा और जोखिम भरा हो सकता है। अमेरिका भी यमन में बड़े पैमाने पर जमीनी सैन्य अभियान से बचने की कोशिश करता रहा है।

कूटनीतिक विकल्प भी आसान नहीं हैं। हूती अपनी राजनीतिक और आर्थिक मांगों पर जोर देते हैं, जबकि उनके विरोधियों के लिए उन मांगों को स्वीकार करना क्षेत्रीय शक्ति संतुलन और सुरक्षा से जुड़ा सवाल है।

असली समस्या क्या है?

हूत ियों की कहानी को सिर्फ यह कहकर नहीं समझा जा सकता कि उन्हें ईरान हथियार देता है या वे पहाड़ों में छिपे रहते हैं।

उनकी ताकत कई चीजों के मेल से बनी है, मुश्किल भूगोल, विकेंद्रीकृत सैन्य ढांचा, बाहरी समर्थन, स्थानीय हथियार निर्माण, मिसाइल और ड्रोन क्षमता, विरोधी गुटों की आपसी कमजोरी और राजनीतिक वैक्यूम।

इसीलिए भारी बमबारी के बावजूद उनकी सैन्य संरचना पूरी तरह खत्म नहीं हुई।

यमन का अनुभव यह भी दिखाता है कि किसी विद्रोही संगठन के खिलाफ सैन्य कार्रवाई और उसके राजनीतिक प्रभाव को समाप्त करना एक ही बात नहीं है। जब तक जमीन पर प्रभावी और एकजुट वैकल्पिक शक्ति मौजूद नहीं होती, तब तक हवाई हमले किसी संगठन की क्षमता को कमजोर तो कर सकते हैं, लेकिन उसे पूरी तरह खत्म करना कहीं अधिक कठिन बना रहता है।

 

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