नई दिल्ली: सोशल मीडिया पर किसी व्यक्ति को जाति के आधार पर अपमानित करना अब सिर्फ ऑनलाइन बदसलूकी का मामला नहीं रह सकता। कलकत्ता हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के व्यक्ति के खिलाफ सोशल मीडिया पर की गई जातिगत टिप्पणी भी SC/ST (Prevention of Atrocities) Act, 1989 के दायरे में आ सकती है। कोर्ट ने साफ किया कि कानून में इस्तेमाल किया गया ‘public view’ यानी सार्वजनिक दृष्टि का मतलब केवल कोई भौतिक जगह नहीं है, बल्कि डिजिटल दुनिया भी इसके दायरे में आ सकती है।
क्या है पूरा मामला?
मामला पश्चिम बंगाल के बेहाला इलाके का है। एक अनुसूचित जाति के व्यक्ति ने आरोप लगाया था कि फेसबुक पर दो लोगों ने उसकी जातिगत पहचान, धर्म, भगवान और परिवार को लेकर कथित तौर पर आपत्तिजनक और जातिगत टिप्पणियां कीं। शिकायत के बाद पुलिस ने जांच शुरू की थी। जांच के दौरान शिकायतकर्ता का बयान दर्ज किया गया और कथित फेसबुक पोस्ट से जुड़े स्क्रीनशॉट और डिजिटल लिंक भी जब्त किए गए थे।
हालांकि, पुलिस ने बाद में ‘Final Report True, No Clue’ दाखिल कर दी। पुलिस का कहना था कि फेसबुक से संपर्क करने के बावजूद कथित पोस्ट करने वाले यूजर्स की जानकारी हासिल नहीं हो सकी। निचली अदालत ने भी इस रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया था। इसके बाद शिकायतकर्ता ने हाई कोर्ट का रुख किया।
हाई कोर्ट ने क्या कहा?
जस्टिस उदय कुमार की एकल पीठ ने निचली अदालत के आदेश को रद्द करते हुए मामले में आगे जांच के निर्देश दिए। कोर्ट ने कहा कि केवल इसलिए किसी शिकायत को खारिज नहीं किया जा सकता कि स्थानीय साइबर जांच से आरोपी की पहचान नहीं हो पाई।
कोर्ट ने खास तौर पर SC/ST Act की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) में इस्तेमाल ‘public view’ की व्याख्या की। अदालत के मुताबिक, ‘public view’ की अवधारणा केवल किसी सड़क, सार्वजनिक स्थान या भौतिक जगह तक सीमित नहीं है। यह डिजिटल डोमेन यानी सोशल मीडिया तक भी विस्तारित हो सकती है।
SC/ST Act में ‘Public View’ क्यों जरूरी है?
SC/ST Act की इन धाराओं के तहत किसी SC/ST व्यक्ति को उसकी जाति के आधार पर जानबूझकर अपमानित या डराने की कोशिश करना अपराध हो सकता है, बशर्ते कानून में तय अन्य शर्तें भी पूरी हों और घटना ‘public view’ में हुई हो।
सुप्रीम कोर्ट पहले स्पष्ट कर चुका है कि हर जातिगत टिप्पणी अपने आप SC/ST Act के तहत अपराध नहीं बन जाती। यह भी देखा जाता है कि कथित अपमान पीड़ित की जाति के कारण किया गया था या नहीं और घटना सार्वजनिक दृष्टि में हुई थी या नहीं।
अब मामले में क्या होगा?
हाई कोर्ट ने मामले की आगे जांच के आदेश दिए हैं। अदालत ने कहा कि उपलब्ध डिजिटल सबूतों के आधार पर विशेष साइबर-फॉरेंसिक माध्यमों, डिजिटल फुटप्रिंट और IP लॉग जैसी तकनीकी जांच की संभावनाएं तलाशनी चाहिए। यानी सिर्फ सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से यूजर की जानकारी नहीं मिलने के आधार पर जांच बंद नहीं की जा सकती।
इस फैसले का सीधा मतलब यह नहीं है कि सोशल मीडिया पर लिखी हर गाली अपने आप SC/ST Act का अपराध बन जाएगी। आरोप की प्रकृति, जातिगत उद्देश्य, सार्वजनिक पहुंच और मामले की अन्य कानूनी शर्तों की जांच जरूरी रहेगी। लेकिन फैसला यह संकेत जरूर देता है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म को ‘public view’ से पूरी तरह बाहर नहीं माना जा सकता।
यह भी पढ़ें: अशुतोष दीक्षित होंगे नए वायुसेना प्रमुख, 31 अक्टूबर को संभालेंगे भारतीय वायुसेना की कमान