नासा ने 2 अप्रैल 2026 को आर्टेमिस 2 मिशन लॉन्च किया, जिसमें चार अंतरिक्ष यात्री 10 दिनों में चंद्रमा का चक्कर लगाकर वापस लौटेंगे। आपको बता दें कि इस मिशन में कुल 189 तरह के खाने के सामान शामिल हैं, जिनमें 58 टॉर्टिला, 43 कप कॉफी और सबसे खास बात यह है कि 5 अलग-अलग हॉट सॉस शामिल हैं। अब आप सोच रहे होंगे कि आखिर इतने महंगे और गंभीर मिशन में हॉट सॉस क्यों भेजी गई? लेकिन यह सिर्फ स्वाद या मज़ाक के लिए नहीं है। वास्तव में, यह नासा की एक गंभीर समस्या का अस्थायी समाधान है, जिसे पिछले 60 वर्षों से पूरी तरह हल नहीं किया जा सका है।
“I’m the space plumber, I’m proud to call myself the space plumber.”
— NASA (@NASA) April 3, 2026
Mission specialists like @Astro_Christina train for all roles so they can jump in wherever they’re needed. Sometimes that means fixing vital machinery, like the spacecraft toilet. pic.twitter.com/RGBWkwRgX7
माइक्रोग्रैविटी का शरीर पर असर
पृथ्वी छोड़ते ही शरीर तुरंत यह महसूस नहीं करता कि वह अब गुरुत्वाकर्षण रहित वातावरण में है। लॉन्च के 6 से 10 घंटे के भीतर शरीर के तरल पदार्थ जैसे खून, लिम्फ और कोशिकाओं के बीच का पानी, ऊपर की ओर बढ़ने लगते हैं। पृथ्वी पर ग्रैविटी इन्हें नीचे खींचती है, लेकिन अंतरिक्ष में यह बल गायब हो जाता है। इसका परिणाम यह होता है कि चेहरे में सूजन आ जाती है, साइनस में तरल भर जाता है और नाक बंद हो जाती है। इसे ‘स्पेस कोल्ड’ कहा जाता है। अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन (ISS) के आंकड़ों के मुताबिक, लगभग 75% अंतरिक्ष यात्री इस स्थिति का अनुभव करते हैं। यह किसी वायरस की वजह से नहीं होता, बल्कि गुरुत्वाकर्षण की कमी का प्रत्यक्ष असर है। आर्टेमिस 2 के क्रू मेंबर्स को भी लॉन्च के कुछ घंटों बाद यही समस्या महसूस हुई, और यह तब तक बनी रहेगी जब तक वे वापस पृथ्वी पर नहीं लौटते।
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अंतरिक्ष में स्वाद क्यों फीका पड़ता है
जीभ सिर्फ पांच स्वाद पहचानती है, लेकिन असली स्वाद 80% नाक के जरिए आता है। माइक्रोग्रैविटी में नाक बंद हो जाने के कारण सुगंध नहीं पहुंच पाती, जिससे खाना बेस्वाद लगने लगता है। आर्टेमिस 2 के सदस्यों को भी यही समस्या होगी।

स्पेस फूड और उसके सीमित स्वाद
अंतरिक्ष में ताजा खाना लंबे समय तक नहीं रखा जा सकता। आर्टेमिस 2 मिशन में पहले 1-2 दिन के अलावा बाकी भोजन ड्राई, रीहाइड्रेटेबल, हाई-हीट प्रोसेस्ड या रेडिएशन-सुरक्षित तरीके से तैयार किया गया है। इन प्रक्रियाओं में खाने के सुगंधित तत्व पहले ही कम हो जाते हैं, और महीनों तक स्टोर करने पर स्वाद और भी घट जाता है। ऊपर से माइक्रोग्रैविटी की वजह से नाक बंद हो जाती है और कैप्सूल की मशीनों, रिसाइकल्ड हवा और अन्य गंधें भी स्वाद को प्रभावित करती हैं। परिणामस्वरूप, खाना केवल कैलोरी देता है, मज़ा नहीं।
स्वाद का कम होना खाने को सिर्फ एक ज़रूरी काम बना देता है, जिससे अंतरिक्ष यात्री धीरे-धीरे कम खाने लगते हैं। अध्ययन दिखाते हैं कि उनकी ऊर्जा खपत जरूरत से लगभग 25% कम हो जाती है, जिससे मांसपेशियां कमजोर होती हैं, इम्यून सिस्टम प्रभावित होता है और दिमाग की क्षमता घट जाती है। नासा इसे ‘रेड रिस्क’ मानता है, यानी अभी इसका कोई पूरी तरह समाधान नहीं है।
Written By - Namita Verma