त्वचा का रंग बदलने का दावा करने वाले विज्ञापन वर्षों से लोगों को आकर्षित करते रहे हैं। क्रीम, इंजेक्शन, केमिकल पील और लेजर ट्रीटमेंट्स को अक्सर स्थायी गोरेपन का आसान तरीका बताया जाता है, लेकिन वैज्ञानिक तथ्य बताते हैं कि किसी व्यक्ति की प्राकृतिक त्वचा का रंग स्थायी रूप से बदलना संभव नहीं है।
त्वचा का रंग कैसे होता है तय ?
हमारी त्वचा का रंग मुख्य रूप से मेलेनिन नामक पिगमेंट पर निर्भर करता है। शरीर में मेलेनिन की मात्रा, उसका वितरण और व्यक्ति की आनुवंशिक बनावट (जेनेटिक्स) मिलकर यह तय करते हैं कि त्वचा गोरी, गेहुंआ या सांवली होगी। इसलिए किसी क्रीम या कॉस्मेटिक ट्रीटमेंट से प्राकृतिक स्किन टोन को पूरी तरह बदलना संभव नहीं है।
किन मामलों में त्वचा दिख सकती है बेहतर?
धूप से होने वाली टैनिंग, पिग्मेंटेशन, मुंहासों के दाग, मेलाज्मा या डलनेस जैसी समस्याओं के कारण त्वचा सामान्य से अधिक काली या असमान दिखाई दे सकती है। ऐसे मामलों में उचित स्किनकेयर, सनस्क्रीन और त्वचा विशेषज्ञ की सलाह पर किए गए उपचार त्वचा को अधिक साफ, चमकदार और समान रंगत वाला बना सकते हैं। हालांकि, इससे व्यक्ति की मूल त्वचा का रंग नहीं बदलता।
कौन-से उपचार कर सकते हैं मदद?
त्वचा विशेषज्ञों के अनुसार, केमिकल पील, माइक्रोडर्माब्रेशन, लेजर टोनिंग, रेटिनॉल और विटामिन C जैसे उपचार पिग्मेंटेशन और दाग-धब्बों को कम करने में सहायक हो सकते हैं। इनका उद्देश्य त्वचा की गुणवत्ता और रंगत में सुधार करना है, न कि किसी को स्थायी रूप से गोरा बनाना।
फेयरनेस प्रोडक्ट्स के दावों से रहें सावधान
बाजार में उपलब्ध कई फेयरनेस प्रोडक्ट्स कुछ दिनों में कई शेड्स तक गोरा बनाने का दावा करते हैं, लेकिन ऐसे दावों का वैज्ञानिक आधार अक्सर कमजोर होता है। कुछ उत्पादों में ऐसे तत्व भी हो सकते हैं जो लंबे समय तक इस्तेमाल करने पर त्वचा को नुकसान पहुंचा सकते हैं। इनके कारण त्वचा पतली होना, एलर्जी, जलन, दाग-धब्बे बढ़ना, धूप के प्रति अधिक संवेदनशीलता और दोबारा पिग्मेंटेशन जैसी समस्याएं हो सकती हैं।
Written By Toshi Shah